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PTC India Vs IEX: पावर मार्केट एक, फिर बिज़नेस इतने अलग क्यों?

एक कंपनी बिजली का कारोबार करती है, दूसरी पावर एक्सचेंज चलाती है. दोनों की कमाई का फ़र्क़ दिखाता है कि एक ही मौक़े से दो कंपनियां कितने अलग ढंग से मुनाफ़ा कमा सकती हैं.

एक कंपनी बिजली का कारोबार करती है, दूसरी पावर एक्सचेंज चलाती है. दोनों की कमाई का फ़र्क़ दिखाता है कि एक ही मौक़े से दो कंपनियां कितने अलग ढंग से मुनाफ़ा कमा सकती हैं.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः राज्यों की पावर डिस्ट्रब्यूशन कंपनियों की सेहत सुधरना, उन्हें बिजली बेचने वाली कंपनी के लिए अच्छी ख़बर होनी चाहिए. पर PTC India के लिए इसने कमाई का एक ऐसा ज़रिया भी घटा दिया है, जिसका फ़ायदा वो लंबे समय से उठा रही थी. वहीं पावर एक्सचेंज चलाने वाली IEX के सामने एक अलग ख़तरा है और वो रेगुलेटर की तरफ़ से आ रहा है.

किसी राज्य की पावर डिस्ट्रब्यूशन कंपनी (डिस्कॉम) को अचानक ज़्यादा पावर चाहिए. वो PTC India से कह सकती है कि सीधे समझौते या एक्सचेंज के ज़रिये बिजली का इंतज़ाम करे. या फिर ख़रीदार और बेचने वाले, इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) पर मिल सकते हैं, जहां बोलियों का मिलान होता है और प्राइस तय होता है.

बिजली आख़िर में उसी ख़रीदार तक पहुंचती है. पर उसे वहां तक पहुंचाने में मदद करने वाली ये दोनों कंपनियां, बिल्कुल अलग ढंग से कमाती हैं.

PTC बिकने वाली बिजली पर अपना मार्जिन कमाती है. IEX अपना एक्सचेंज इस्तेमाल करने पर टोल वसूलती है. यही एक फ़र्क़ दोनों के मार्जिन और कैपिटल के इस्तेमाल से लेकर लगभग सब कुछ समझा देता है. इससे यह भी पता चलता है कि भारत के बदलते पावर मार्केट से दोनों को कैसे फ़ायदा मिलता है.

एक ट्रेडर, दूसरा एक्सचेंज

PTC अलग-अलग अवधि के समझौतों के ज़रिये बिजली बनाने वालों को पावर डिस्ट्रब्यूशन कंपनियों और दूसरे ग्राहकों से जोड़ती है. इसलिए उसकी कमाई दो चीज़ों पर टिकी है: कितनी बिजली का कारोबार हुआ और हर यूनिट पर उसे कितना मार्जिन मिला.

IEX आमतौर पर बिजली ख़रीदकर दोबारा नहीं बेचती. वो एक प्लेटफ़ॉर्म देती है, जिस पर लोग बिजली ख़रीदते-बेचते हैं और हर लेन-देन पर फ़ीस लेती है.

पैमाना PTC India IEX
भूमिका बिजली की ट्रेडर या बिचौलिया बिजली का एक्सचेंज
कमाई का तरीक़ा कारोबार की मात्रा × ट्रेडिंग मार्जिन कारोबार की मात्रा × ट्रांज़ैक्शन फ़ीस
आसान मिसाल मंडी का होलसेलर ख़ुद मंडी का मालिक
वर्किंग कैपिटल की ज़रूरत अच्छी-ख़ासी कम
ऑपरेटिंग लेवरेज मध्यम ज़्यादा
सबसे बड़ा जोखिम ट्रेडिंग मार्जिन और भुगतान से जुड़ी कमाई रेगुलेशन और मार्केट कपलिंग
सोर्स: वैल्यू रिसर्च एनालेसिस. ऑपरेटिंग लेवरेज यानी बिक्री बढ़ने पर मुनाफ़े का उससे तेज़ बढ़ना.

यह फ़र्क़ दोनों के आंकड़ों में साफ़ दिखता है.

पांच साल बताते हैं असली फ़र्क़

FY21 से FY26 PTC India IEX
बिजली का कारोबार: FY21 80.0 BU 74.0 BU
बिजली का कारोबार: FY26 92.8 BU 141.1 BU
5 साल में कारोबार की सालाना ग्रोथ 3.00% 13.80%
5 साल में मुनाफ़े (PAT) की सालाना ग्रोथ -0.70% 17.30%
5 साल का औसत EBITDA मार्जिन* 2.60% 84.70%
5 साल का औसत ROCE** 13.60% 47.10%
कारोबार के मेल में अहम बदलाव एक्सचेंज वाला कारोबार: 43.1% से 56.3% रियल-टाइम मार्केट का हिस्सा: 12.8% से 38.9%
हर यूनिट की कमाई में बदलाव ट्रेडिंग मार्जिन: 4.19 से 3.35 पैसे प्रति यूनिट, 20% कम लचीले, रियल-टाइम कारोबार का बढ़ता हिस्सा
सोर्स: कंपनियों के नतीजे. BU यानी अरब यूनिट. 
*PTC ख़रीदी और बेची गई बिजली की पूरी रक़म को रेवेन्यू में दिखाती है, जबकि IEX मुख्य रूप से सिर्फ़ फ़ीस को. इसलिए दोनों के मार्जिन की सीधी तुलना नहीं हो सकती. फिर भी यह बड़ा अंतर दिखाता है कि दोनों के कारोबार कितने अलग हैं. **ग्रुप स्तर पर बताए गए ROCE का 5 साल का औसत. PTC के आंकड़े पर उसकी फ़ाइनेंस सब्सिडियरी और FY25 में संपत्ति बेचने से हुए फ़ायदे का असर है.

PTC का कारोबार FY21 के क़रीब 80 BU से बढ़कर FY26 में 93 BU हुआ, जबकि IEX पर बिजली का कारोबार लगभग दोगुना हो गया. और सबसे अहम बात, IEX ने इस बढ़त को कहीं तेज़ी से मुनाफ़े में बदला.

PTC के कारोबार का बदलता मेल भी मायने रखता है. उसके कुल कारोबार में एक्सचेंज के ज़रिये होने वाला हिस्सा FY21 के क़रीब 43% से बढ़कर FY26 में 56% हो गया. इसी दौरान उसका ट्रेडिंग मार्जिन क़रीब 20% घट गया. पहले कई बार PTC ने एक्सचेंज के कम मार्जिन वाले कारोबार को जानबूझकर छोड़ भी दिया था, जब उसमें कोई फ़ायदा नहीं बच रहा था.

IEX के साथ उल्टा हुआ. उसका रियल-टाइम मार्केट, जो पांच साल पहले लगभग था ही नहीं, अब उसके बिजली के कारोबार का क़रीब 40% है. कारोबार के ज़्यादा मौक़ों से ज़्यादा लेन-देन होते हैं और इसके लिए उतनी ही ज़्यादा पूंजी नहीं लगानी पड़ती.

और इनका पावर मार्केट बड़ा होता जा रहा है

यह कहानी सिर्फ़ भारत में बिजली की खपत बढ़ने की नहीं है.

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) का अनुमान है कि FY22 से FY32 के बीच बिजली की ज़रूरत हर साल क़रीब 6.5% बढ़ेगी. पर संगठित पावर मार्केट इससे भी तेज़ बढ़ रहे हैं. पावर एक्सचेंज पर बिजली का कारोबार FY21 के क़रीब 80 BU से बढ़कर FY25 में लगभग 144 BU हो गया, यानी हर साल क़रीब 16% की बढ़त. FY25 तक भारत में होने वाले बिजली के कुल लेन-देन का 8.5% हिस्सा एक्सचेंज पर हो रहा था.

रिन्यूएबल एनर्जी इसमें एक और परत जोड़ती है. मार्च 2026 तक भारत की रिन्यूएबल क्षमता क़रीब 275 GW थी और FY26 में बिजली उत्पादन का 29% हिस्सा ग़ैर-जीवाश्म ईंधन से आया. सोलर और विंड से बनने वाली बिजली मौसम और दिन के वक़्त के साथ बदलती है. इससे बिजली बनने के वक़्त और ग्राहकों को उसकी ज़रूरत के वक़्त में अंतर पैदा होता है.

इसी अंतर से रियल-टाइम और कम अवधि के कारोबार की मांग बढ़ती है.

इसका फ़ायदा दोनों को मिलता है, पर अलग-अलग ढंग से. PTC किसी डिस्कॉम को कम पड़ रही बिजली ढूंढकर दे सकती है. और अगर वो डिस्कॉम यह बिजली ढूंढने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा एक्सचेंज पर जाती है, तो फ़ायदा IEX को होता है.

पर PTC की कमाई में एक और पेच है

PTC ने हमेशा सिर्फ़ अपने ट्रेडिंग मार्जिन से ज़्यादा कमाया है.

मान लीजिए कोई डिस्कॉम PTC से बिजली ख़रीदती है, पर भुगतान देर से करती है. तब PTC देर से भुगतान का सरचार्ज वसूल सकती है. और अगर उसी वक़्त PTC बिजली बनाने वालों को जल्दी भुगतान कर देती है, तो उसे छूट भी मिल सकती है.

भुगतान से जुड़ी यह कमाई कई बार अच्छी-ख़ासी रही है.

अब डिस्कॉम की आर्थिक हालत सुधर रही है और भुगतान जल्दी आने लगे हैं. इससे PTC का बकाया, उसकी वर्किंग कैपिटल की ज़रूरत और कर्ज़ डूबने का जोखिम, तीनों घटते हैं. पर इसका मतलब यह भी है कि देर से भुगतान का सरचार्ज कम मिलेगा.

Q1 FY27 में इसका असर साफ़ दिखा. कारोबार 12% बढ़ा, फिर भी सरचार्ज से कमाई 92% घट गई, छूट से कमाई 32% घटी और स्टैंडअलोन मुनाफ़ा 33% गिर गया.

यानी डिस्कॉम की सुधरती सेहत, PTC के कारोबार की क्वालिटी के लिए तो अच्छी है, पर कमाई के उस ज़रिये के लिए बुरी, जिसका फ़ायदा वो लंबे समय से उठा रही थी.

अलग जोखिम, अलग दांव

इसलिए PTC की चिंता यह है कि वो हर यूनिट पर कितना कमाती है. IEX की चिंता इससे बड़ी है: क्या उसका दबदबे वाला एक्सचेंज उतना ही क़ीमती बना रहेगा.

IEX पर ख़रीदार और बेचने वाले, दोनों बड़ी संख्या में हैं और इससे एक नेटवर्क का फ़ायदा बनता है. ख़रीदार वहीं जाते हैं जहां बेचने वाले पहले से हैं और बेचने वाले वहां, जहां ख़रीदार हैं. मार्केट कपलिंग इस फ़ायदे को कमज़ोर कर सकती है. इसमें सभी एक्सचेंजों की बोलियां एक साथ मिलाकर एक साझा प्राइस तय होता है, जिससे किसी एक एक्सचेंज पर ख़रीदार-बेचने वालों के जमावड़े की अहमियत घट जाती है. CERC इस व्यवस्था को आगे बढ़ा रहा है, इसलिए IEX में निवेश के फ़ैसले के केंद्र में रेगुलेशन है.

इससे निवेशकों के सामने दो बिल्कुल अलग विकल्प बचते हैं. कारोबार के मॉडल के लिहाज़ से IEX साफ़ तौर पर बेहतर है. पर निवेश के लिहाज़ से PTC सस्ती साबित हो सकती है.

दोनों को भारत के तेज़ी से मार्केट की तरफ़ बढ़ते पावर सिस्टम का फ़ायदा मिलता है. पर एक बिजली पर मार्जिन कमाती है, तो दूसरी एक्सचेंज पर टोल वसूलती है. निवेशक के लिए सवाल यह है कि क्या PTC की कमज़ोर कमाई पहले से उसके वैल्यूएशन में दिख रही है या रेगुलेशन के जोखिम के बाद भी IEX की बेहतरीन कमाई उतनी ही क़ीमती बनी रहती है.

यह भी पढ़ें: Ola Electric vs Ather Energy: एक की फ़ैक्ट्री ख़ाली, दूसरे के पास ख़रीदारों की कतार

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