
आजकल अर्थव्यवस्था सुस्त चाल से आगे बढ़ रही है। ऐसे में ऊंची ब्याज दरों का दौर जल्द ही फिर से लौट कर आता हुआ नहीं दिख रहा है। इसका मतलब है कि बचत करने वालों को नियमित आय के लिए FD की मानसिकता से बाहर निकल कर इक्विटी बेस्ड म्यूचुअल फ़ंड के बारे में सोचना होगा। नियमित आय हासिल करने के लिए बैंक FD सही विकल्प नहीं है। यह बात रातों-रात नहीं पता चली है। अगर आप महंगाई को ध्यान में रखें तो FD और ब्याज देने वाले दूसरे विकल्प निवेश के लिहाज से कभी भी अच्छे नहीं रहे हैं। आप गौर करें तो पाएंगे कि नियमित आय हासिल करने के लिए, खास कर रिटायरमेंट के बाद लंबी अवधि तक अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए इक्विटी फंड या बैलेंस्ड फंड बेहतर विकल्प हैं।
इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में आपको FD की तुलना में कम टैक्स देना होता है। दूसरी बात इसमें टैक्स रक़म निकालने पर ही लगता है और तीसरी बात व सबसे अहम बात इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड ऊंचा रिटर्न देता है। अगर इन तीनों बातों को मिला दिया जाए तो आगे फिर किसी तर्क की गुंजाइश ही नहीं रह जाती है कि नियमित आय के लिए FD की तुलना में इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड बेहतर विकल्प हैं। अब यह बात हम उदाहरण के जरिए समझते हैं।
पहले FD का उदाहरण लेते हैं। मान लेते हैं कि आपके पास 1 करोड़ रु. हैं और इससे आपको नियमित आय हासिल करनी है। बैंक FD से सालाना सात फीसदी ब्याज मान लें तो आपकी कुल रकम 1.07 करोड़ रु. हो जाएगी। इस तरह से आपने एक साल में 7 लाख रु. कमाए। यानी 50,000 रु. महीना। यह बात कागज पर सही है। अगर आप 5 फीसदी महंगाई दर मान लें और अगर आप अपने 1 करोड़ रु. की वास्तविक कीमत बनाए रखते हुए आने वाले सालों में नियमित आय हासिल करना चाहते हैं तो आपको 1.05 करोड़ रु. बैंक में छोड़ना होगा। इसका मतलब है कि आप एक साल में सिर्फ़ 2 लाख रु. खर्च कर सकते हैं। यानी 16,666 रु. महीना। तो, अगर आपको हर महीने 50,000 रु. की जरूरत है तो आपके पास 3 करोड़ रु. होने चाहिए। ऐसे आपकी टैक्स देनदारी भी बढ़ जाएगी और आपको सालाना लगभग 30,000 रु. टैक्स चुकाना होगा। यह तो और भी खराब बात होगी क्योंकि आपको हर साल टैक्स देना ही होगा भले ही आप ब्याज की रकम निकालें या न निकालें।
लेकिन अगर आप हाइब्रिड यानी बैलेंस्ड फंड में किए गए निवेश से रकम निकाल रहे हैं तो यहां स्थिति पूरी तरह से बदल जाती है। डिपॉजिट के विपरीत बैलेंस्ड फंड ऊंचा रिटर्न देने वाले लेकिन उतार-चढ़ाव से भरे हुए हैं। किसी साल आपको ज्यादा रिटर्न मिलेगा और किसी साल कम रिटर्न। लेकिन पांच से सात साल या इससे अधिक अवधि में बैलेंस्ड फंड का रिटर्न महंगाई दर से छह या सात फीसदी ज्यादा होने की अच्छी संभावना रहती है। उदाहरण के तौर पर पिछले पांच सालों में ज्यादातर इक्विटी फंडों ने सालाना 12 से 14% या इससे अधिक रिटर्न दिया है। फंड के रिटर्न में किसी साल उतार-चढ़ाव आ सकता है और निवेशक को इसका सामना करना पड़ेगा। लेकिन बुढापे में गरीबी के खतरे को मिटाने के लिए यह बहुत कारगर तरीका है।
ऐसे फंडों में निवेश करके आप कुल रकम का 4% हर साल निकाल कर अपनी जरूरतें पूरी कर सकते हैं और फिर भी आपकी पूंजी बढ़ती रहेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें टैक्स बहुत कम है। ब्याज के तौर पर होने वाली आय जहां आपकी कुल आय में जुड़ती जाती है वहीं इन फ़ंड्स में निवेश करने पर आपको कैपिटल गेन्स टैक्स तभी देना होता है जब आप रकम निकालते हैं। एक साल से अधिक के निवेश पर इक्विटी फ़ंडों के रिटर्न पर 10 फीसदी टैक्स लगता है। तो ऐसे में 50,000 रु. मासिक आय के लिए 1.5 करोड़ रु. काफी होंगे। जबकि FD के मामले में आपको 50,000 रु. की मासिक आय के लिए 3 करोड़ रु. की जरूरत होगी। आपकी बचत चाहे जितनी हो और आपका खर्च कुछ भी हो फिर भी आपको टैक्स 10% ही देना होगा।
टैक्स के मोर्च पर यहां एक और वजह है जो निवेश के लिए फायदेमंद है। मान लेते हैं कि आपने म्यूचुअल फ़ंड में 10,000 रु. निवेश किए। एक साल के बाद निवेश की वैल्यू बढ़ कर 10.80 लाख रु. हो जाती है। अब आप एक साल में हुए मुनाफ़े की रकम यानी 80,000 रुपए निकालना चाहते हैं। आपकी कुल रकम में 7.4% मुनाफा यानी रिटर्न है और बाकी यानी 92.6% मूल रकम है, जो आपने निवेश की है। ऐसे में जब आप रकम निकालेंगे तो निकाली जाने वाली रकम पर टैक्स भी मुनाफ़े और मूल रकम के इसी अनुपात के हिसाब से लगेगा। यानी 80,000 रु. में से सिर्फ 5,926 रु.मुनाफ़ा यानी गेन माना जाएगा और आपकी टैक्सेबल आय में जुड़ेगा। साफ है कि इससे आपकी टैक्स देनदारी बहुत कम हो जाएगी।
किसी भी तरह से देखें तो एक बात तो साफ है कि ब्याज से आय हासिल करने की तुलना में इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश से नियमित तौर पर रकम निकाल कर आय हासिल करना बेहतर है। हर ओपेन एंडेड फंड से नियमित तौर पर रकम निकालने के लिए सिस्टमेटिक विद्ड्रॉअल प्लान यानी SWP की सुविधा उपलब्ध है। म्यूचुअल फ़ंड में कम अवधि का उतार-चढ़ाव आपको थोड़ी चिंता दे सकता है लेकिन लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न पर कोई सवाल नहीं है।

