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सारांशः इंडेक्स फ़ंड और ETF, दोनों किसी बेंचमार्क को ट्रैक करते हैं, पर टैक्स डिपार्टमेंट इन्हें हमेशा एक जैसा नहीं मानता, ख़ासकर जब आप सामान्य इक्विटी निवेश से आगे बढ़ते हैं. इस स्टोरी में समझिए कि इक्विटी, डेट और (ETF के मामले में) सोने-चांदी हरेक पर टैक्स कैसे लगता है.
इंडेक्स फ़ंड और ETF पर लगने वाले टैक्स में क्या फ़र्क़ है? – रमेश कृष्णमूर्ति
इंडेक्स फ़ंड और ETF (एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड) को अक्सर एक साथ 'पैसिव निवेश' कह दिया जाता है. दोनों किसी इंडेक्स को मात देने की कोशिश करने के बजाय, बस उसकी नक़ल करते हैं. इसी समानता की वजह से, कई निवेशक मान लेते हैं कि इनका टैक्स भी एक जैसा होगा. काफ़ी हद तक यह एक जैसा है ही, पर पूरी तरह नहीं और ये फ़र्क़ पूरे बोर्ड पर नहीं, बल्कि कुछ ख़ास कैटेगरी में दिखते हैं. इन फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है, क्योंकि सोच में एक ग़लतफ़हमी आपके रिटर्न का हिसाब बिगाड़ सकती है, या टैक्स भरते वक़्त एक बुरा झटका दे सकती है.
इंडेक्स फ़ंड पर टैक्स कैसे लगता है
इक्विटी इंडेक्स फ़ंड (जिनमें कम से कम 65% हिस्सा घरेलू इक्विटी में हो) के लिए, नियम बाक़ी किसी भी इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड जैसे ही हैं.
अगर आप 12 महीने के भीतर बेचते हैं
अगर आप अपनी इंडेक्स फ़ंड यूनिट ख़रीदने के एक साल से कम में बेच देते हैं, तो मुनाफ़े को शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन माना जाता है और उस पर 20% टैक्स लगता है.
अगर आप 12 महीने के बाद बेचते हैं
यूनिट को 12 महीने से ज़्यादा रखिए, तो लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर 12.5% टैक्स लगता है और एक वित्त वर्ष में ₹1.25 लाख तक का फ़ायदा टैक्स-फ़्री रहता है. यह फ़ायदा सिर्फ़ तभी मिलता है जब सिक्योरिटीज़ ट्रांज़ैक्शन टैक्स (STT) चुकाया गया हो, जो इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड बेचने पर आमतौर पर चुकाया ही जाता है.
डेट इंडेक्स फ़ंड
डेट इंडेक्स फ़ंड के मामले में टैक्स कम अच्छा है. 1 अप्रैल 2023 से लागू बदलावों के बाद, किसी भी डेट वाले फ़ंड (मोटे तौर पर, वो जो 65% से ज़्यादा हिस्सा डेट और मनी-मार्केट में लगाता हो) के पूरे मुनाफ़े पर आपकी इनकम स्लैब दर से टैक्स लगता है. न कोई इंडेक्सेशन का फ़ायदा, न लॉन्ग-टर्म वाली कोई छूट, एक ऐसा बदलाव जिसने कई निवेशकों के लिए डेट फ़ंड की चमक काफ़ी कम कर दी.
ETF पर टैक्स कैसे लगता है
इक्विटी ETF वही नियम मानते हैं जो इक्विटी इंडेक्स फ़ंड मानते हैं: शॉर्ट-टर्म मुनाफ़े पर 20% टैक्स और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर 12.5%, और ₹1.25 लाख की सालाना छूट भी लागू होती है. हर एक्सचेंज लेन-देन पर STT चुकाया जाता है, इसलिए कम दरें आमतौर पर बिना किसी उलझन के लागू हो जाती हैं.
इसी तरह डेट ETF भी डेट इंडेक्स फ़ंड जैसे ही हैं: 1 अप्रैल 2023 को या उसके बाद ख़रीदी गई यूनिट के मुनाफ़े को शॉर्ट-टर्म माना जाता है और बिना किसी इंडेक्सेशन के स्लैब दरों पर टैक्स लगता है.
गोल्ड और सिल्वर ETF
जहां फ़र्क़ ज़्यादा साफ़ दिखता है, वो है गोल्ड और सिल्वर ETF. चूंकि ये एक्सचेंज पर लिस्टेड होते हैं, इन्हें लिस्टेड नॉन-इक्विटी संपत्ति माना जाता है, जिससे लॉन्ग-टर्म होल्डिंग की सीमा घटकर सिर्फ़ 12 महीने रह जाती है (जबकि इनके गोल्ड फ़ंड-ऑफ़-फ़ंड जैसे ग़ैर-लिस्टेड रूपों के लिए यह 24 महीने है).
12 महीने से कम रखे गए मुनाफ़े पर आपकी लागू इनकम टैक्स स्लैब दर से टैक्स लगता है; उसके बाद, बिना इंडेक्सेशन के लॉन्ग-टर्म मुनाफ़े पर 12.5% टैक्स लगता है. एक अहम बात, इक्विटी संपत्ति पर मिलने वाली ₹1.25 लाख की छूट गोल्ड या सिल्वर ETF पर लागू नहीं होती और इन लेन-देन पर आमतौर पर STT नहीं लगता, हालांकि इससे लगने वाली टैक्स दर पर कोई असर नहीं पड़ता.
कम शब्दों में कहें, तो इक्विटी के मामले में इंडेक्स फ़ंड और ETF का टैक्स लगभग एक-दूसरे की हूबहू नक़ल है, और डेट के मामले में भी अप्रैल 2023 के बदलावों के बाद अब यह वैसे ही एक जैसा हो गया है. असली फ़र्क़ सोने और चांदी में है, जहां ETF का लिस्टेड होना, लॉन्ग-टर्म बर्ताव पाने के लिए ज़रूरी होल्डिंग समय को घटा देता है, एक ऐसी बात जो उन्हीं कमोडिटी में FoF (फ़ंड ऑफ़ फ़ंड) रखने वाले निवेशकों को नहीं मिलती.
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ये लेख पहली बार अगस्त 04, 2026 को पब्लिश हुआ.





