
कार्यकुशलता का नुकसान
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महामारी ने हमें बताया है कि इंडीविजुअल्स और कंपनी दोनों के लिए कार्यकुशलता नुकसान का सबब भी बन सकती है
मेरे पंसदीदा ब्लॉगर्स में से एक शेन पैरिस ने एफीशिएंसी इन इनेमी शीर्षक से एक पोस्ट लिखा है। कार्यकुशल होना सुनने में अच्छा लगता है लेकिन इसका मतलब है कि गलती की कोइ गुंजाइश नहीं है और आप अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं। कोरोना महामारी के शुरूआती दिनों में जब करोबारी गतिविधियां पूरी तरह से शुरू नहीं हुईं थी उस समय मैंने वेल्थ इनसाइट मैगजीन में संपादकीय लिखा था। उसका शीर्षक था इन प्रेज ऑफ इनएफिशिएंसी। यह संपादकीय कंपनियों और वायरस के बारे में था। लेकिन यह सिद्धांत पर्सनल फाइनेंस सहित कई दूसरी चीजों पर लागू होता है।
पैरिस एक सफल सीईओ के आउटर ऑफिस की काल्पनिक यात्रा के बारे में लिखते हैं जहां वे पाते हैं कि सीईओ का सेक्रेटेरियट स्टॉफ ज्यादातर समय कुछ नहीं करता है। यह कार्यकुशलता में कमी दिखाता है लेकिन क्या सच में ऐसा है। सीईओ के पर्सनल स्टॉफ का काम है कि वे जब भी जरूरत हो तो काम के लिए उपलब्ध रहें। उनका काम व्यस्त रहना नहीं है बल्कि सीईओ जरूरत के हिसाब से व्यस्त रहे। इसका मतलब है कि उनको किसी भी चीज के लिए खाली रहना चाहिए जिससे किसी भी चीज की जरूरत होने पर बिना देरी के यह जरूरत पूरी कर सकें। यानी कि ज्यादातर समय उनको खाली रहना चाहिए। कार्यकुशलता के आम विचार के लिहाज से यह बात अक्षमता दिखाती है। लेकिन वास्तव में यह काफी अधिक कार्यकुशलता का परिचय देती है।
पैरिस ने अपने विचार का आधार मैनेजमेंट एक्सपर्ट टॉम डेमार्को द्वारा लिखी गई किताब स्लैक: गेटिंग पास्ट बर्नआउट, बिजीवर्क, एंड द मिथ ऑफ टोटल एफिशिएंसी को बनाया था। यह कहने की जरूरत नहीं है कि सुस्ती अच्छी है यह बात कॉरपोरेट लाइफ में ज्यादा जगह नहीं बना पाई। हालांकि महामारी वास्तव में इस बात की ओर इशारा करती है कि सुस्ती अच्छी चीज है और कार्यकुशलता अक्षमता है। मैं पहले इस बात पर गौर किया था कि महामामारी ने इस बात को उजागर किया है कि कार्यकुशलता और उत्पादकता आधुनिक कंपनियों के कमजोर बिंदु है और पिछले साल जुलाई में इसके बारे में लिखा था।
मैं इसे पहली बार तब जब समझा जब प्राइवेट हेल्थकेयर की अच्छी समझ रखने वाले मेरे एक दोस्त ने फरवरी की शुरूआत में कहा था कि बड़े हॉस्पिटल में खाली आईसीयू बेड की क्षमता बहुत कम है क्योंकि कारोबार के नजरिए यह बेकार था। हालांकि यह सिर्फ हेल्थकेयर के बारे में नहीं है।
महामारी के दौर में नुकसान उठाने वाली कंपनियों में ज्यादातर वे कंपनियां है जो संसाधनों का इस्तेमाल बहुत कुशलता से कर रहीं थी। महामारी के पहले इनका सब काम बहुत अच्छी तरह से चल रहा था। कंपनियों का राजस्व, लागत और मुनाफा उनके बढ़ने और रकम बनाने के लिए सटीक था। हालांकि लॉगकाउन और आने वाले समय में पैष्दा होने वाली सुस्ती ने उनको बुरी तरह से नुकसान पहुंचाया। बिक्री में बड़े पैमाने पर आई गिरावट ने उनके लिए कारोबार करना मुश्किल कर दिया। उनके पास किसी तरह का कोई रिजर्व नहीं था। वैश्विक बाजार पर निर्भर समय से आने वाली सप्लाई चेक सक्षम थी। अतिरिक्त इन्वेंट्री बेकार थी। ये ऐसी बातें थींकोई चुनौती नहीं दे सकता था लेकिन आज ये सब बातें टाइम बम साबित हो रहीं हैं।
यह बात पर्सनल फाइनेंस के लिए भी उतनी ही सही है। बहुत से ऐसे लोग हैं खास कर युवा उनकी पूरी आय सिर्फ ईएमआई और बेसिक जरूरतों में चली जाती है। उनके पास न कोई बफर है न इमरजेंसी फंड और न ही इमरजेंसी फंड बनाने का आसान रास्ता है। आय में थोड़ी बाधा आने ही उनकी पर्सनल फाइनेंस की स्थिति बहुत खराब हो गई। महामारी में ऐसा बहुत से लोगों के साथ हुआ है। एक बार फिर मैं इसके लिए किसी एक व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा हूं। बहुत से लोगों के पास इससे बेहतर करने की गुंजाइश ही नहीं है। हालांकि इसके बावजूद कुछ लोग बेहतर कर पाते हैं और बहुत से लोग नहीं कर पाते हैं।
नुकसान और मुश्किलों के बीच विपरीत हालात बहुत बड़ी सीख देते हैं। निश्चित तौर पर व्यक्ति विशेष के लिए भी ऐसा है। शायद लोग कम खर्च करेंगे और सिर्फ बहुत जरूरी चीजों पर खर्च करेंगे। या शायद नहीं, कौन जानता है ? उन देशों में जहां महामारी का दौर थम चुका है वहां ऐसा नहीं हुआ है और भारत में बहुत कम समय के लिए जब महामारी का प्रकोप कम हो गया था तब यहां भी ऐसा नहीं हुआ।






