Anand Kumar/AI-Generated Image
रिटायर होने के बाद आपके पोर्टफ़ोलियो के लिए सबसे बड़ा जोख़िम आपका अपना ख़ाली वक़्त होता है.
30 या 35 साल तक पैसा एक ऐसी फ़िक्र थी जिससे आप छुटकारा चाहते थे. फिर वो फ़िक्र ख़त्म हो जाती है. अब आपके पास वो दोनों चीज़ें हैं जो आप हमेशा से चाहते थे: वक़्त और एक बड़ा कॉर्पस. साथ में एक फ़ोन भी, जिससे इन पर कुछ भी करना चुटकियों का काम है. और बस, यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है.
हमारे पास आने वाले सवालों में मैं ये हर हफ़्ते देखता हूं. कोई अच्छा फ़ंड एक साल, कभी-कभी दो साल पिछड़ जाता है और सवाल आ जाता है: क्या अब फ़ंड बदलने का वक़्त आ गया है? ज़्यादातर मामलों में फ़ंड ठीक ही होता है. एक-दो ख़राब साल तो अच्छे फ़ंड में निवेश की क़ीमत हैं. असल में सवाल फ़ंड का नहीं होता. सवाल होता है कुछ करने की बेचैनी का. नौकरी करने वाला व्यक्ति भी वही गिरावट देखता है, उसकी अनदेखी करता है और अपने काम पर लौट जाता है. लेकिन जिस रिटायर्ड व्यक्ति के पास पूरी दोपहर ख़ाली है, वो कुछ न कुछ कर बैठता है.
इसकी क़ीमत छिपी रहती है, क्योंकि ये कभी बिल की शक्ल में सामने नहीं आती. मान लीजिए एक दंपति 2 करोड़ रुपये के साथ रिटायर होता है और हर साल 4 प्रतिशत निकालता है. यानी उनके पास गुज़ारे के लिए 8 लाख रुपये हैं. अगर बार-बार फ़ंड बदलने और कैश में बैठकर इंतज़ार करने से 2 प्रतिशत पॉइंट का नुक़सान हो, तो हर साल 4 लाख रुपये चुपचाप हाथ से निकल जाते हैं.
इसलिए बोरियत की तैयारी करके चलिए. रिटायरमेंट तक एक ऐसा प्रोजेक्ट लेकर पहुंचिए जिस पर आप ज़िंदगी भर काम कर सकें, न कि ‘कभी देख लेंगे’ वाला कोई ख़याल. और, ऐसा पोर्टफ़ोलियो लेकर पहुंचिए जिसमें आपके करने के लिए कुछ बचा ही न हो:
- 20 नहीं, बस चार या पांच फ़ंड
- पैसे निकालने की व्यवस्था ऑटोमेटेड
- एलोकेशन पहले से तय
जिन रिटायर्ड निवेशकों को मैं जानता हूं और जो मुसीबतों से बचे रहे, वो सबसे बड़े कॉर्पस वाले लोग नहीं थे. वो ऐसे लोग थे जिनके पास करने को कुछ था.
यह भी पढ़ेंः वे पॉइंट, जो आपके हैं ही नहीं





