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आपका पैसा और आपकी ज़िंदग़ी

हाल ही में हुई घटनाओं से हर किसी को ग्लोबल फ़ाईनेंशियल सिस्टम की मूल प्रकृति पर विचार करना चाहिए और इस बात पर भी सोचना चाहिए कि कैसे उनका पैसा उनसे छीन लिया जा सकता है।

हाल ही में हुई घटनाओं से हर किसी को ग्लोबल फ़ाईनेंशियल सिस्टम की मूल प्रकृति पर विचार करना चाहिए और इस बात पर भी सोचना चाहिए कि कैसे उनका पैसा उनसे छीन लिया जा सकता है।

विदेशी इक्विटी निवेश जब से भारतीय निवेशकों के लिए उपलब्ध हुआ है, मैंने यही कहा है कि ये निवेश हमारे लिए कारगर है। मगर इस एसेट क्लास का इस्तेमाल कम ही हुआ है। जहां विदेशों में सीधे इक्विटी निवेश करना मुश्किल है, वहीं विदेशी-निवेश वाले फ़ंड्स में भारतीय म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों के ज़रिए निवेश काफ़ी आसान है। भारतीय निवेशक के लिए इस तरह का डाईवर्सिफ़िकेशन अच्छा होता है। हालांकि, पिछले कुछ दिनों में इसे लेकर मुझे कुछ संदेह हो चला है और इसकी वजह है-यूक्रेन में युद्ध।
पिछले दिनों, कुछ चौंकाने वाली घटनाएं हुई हैं जिनपर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। मसला है, फ़ाईनेंशियल सिस्टम को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की पश्चिमी देशों की इच्छा-यहां तक कि ऐसा करने की उनकी आतुरता। ख़बरों से पता चल रहा है कि न सिर्फ़ स्विफ़्ट (SWIFT) जैसे बड़े इंटरनेशनल इंटरबैंकिंग सिस्टम ने रूस में काम करना बंद कर दिया है, बल्कि वीज़ा (VISA) और मास्टरकार्ड (Mastercard) जैसे कनज़्यूमर सिस्टम और एप्पल, गूगल के मोबाईल-फ़ोन पेमेंट सिस्टम भी ठप्प पड़ गए हैं। इन वजहों से रूसी सेंट्रल बैंक रिज़र्व के बड़े हिस्से बेक़ार दिखाई दे रहे हैं।
ऐसे किसी भी विषय पर मुझे अपना नज़रिया पेश करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, जो मेरे काम के दायरे में नहीं आता, इसीलिए इस विषय पर मैं अपने शब्दों का चुनाव सावधानी से करूंगा। जिस विषय पर हम बात कर रहे हैं उसकी बुनियादी समस्या का इससे कोई लेना-देना नहीं है कि रूस क्या कर रहा है या क्या नहीं कर रहा है या फिर पश्चिमी देश रूस के ख़िलाफ़ कितनी सख़्त कार्यवाही करना चाहते हैं। इसके बजाए, ये एकतरफ़ा आर्थिक प्रतिबंधों का हथियार लगता है, जो किसी भी ग़लती पर झट से इस्तेमाल किया जा सकता है। जिन लोगों के पास ये हथियार है वो जज, जूरी और जल्लाद सभी कुछ ख़ुद हैं। जैसा की अनगिनत बार हमने ख़ुद देखा है, इस तरह के उपाय एक बार इस्तेमाल होने के बाद, एक मिसाल बन जाते हैं। फिर उनका इस्तेमाल कम गंभीर मामलों में होने लगता है और धीरे-धीरे, और भी कम संगीन मामलों ऐसे उपाय इस्तेमाल किए जाने लगते हैं।
ये एक फिसलन से भरी ढ़लान जैसा ख़तरनाक़ है। युद्ध को भूल जाइए, आप देखिए कि पिछले महीने कनाडा में क्या हुआ। वैक्सीन अनिवार्य किए जाने के ख़िलाफ़ ट्रक चालकों ने बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन किए। क़रीब एक महीने तक, जस्टिन ट्रूडो सरकार ने मीडिया के भरपूर सहयोग से एक कैंपेन चलाई, जिसमें विरोध-प्रदर्शन करने वालों को निशाना बनाया गया। अंत में उन्होंने, उन सभी लोगों के बैंक अकाउंट फ़्रीज़ कर दिए जिन्होंने प्रदर्शनकारियों को डोनेशन दिया था-फिर चाहे इस डोनेशन की ये राशि कितनी ही छोटी क्यों न रही हो। डोनेट करने वालों ने जब ये पैसा दिया था तब ये पूरी तरह से क़ानूनी दायरे होने वाला विरोध था, फिर भी लोगों का पूरा बैंक अकाउंट फ़्रीज़ कर दिया गया। ये कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है बल्कि अब भी जारी है।
ये घटनाएं बेचैन करने वाली लगती हैं। आर्थिक आज़ादी, बे-रोक-टोक लेन-देन कर पाना, ये पक्का होना कि आपका धन यूं ही ज़ब्त नहीं कर लिया जाएगा, से सारी चिंताएं ग्लोबल फ़ाईनेंशियल सिस्टम को लेकर हैं। जब हम विदेशों में निवेश करते हैं, तो हम ऐसा इस भरोसे के साथ करते हैं कि इसके लिए एक क़ानूनी दायरे वाला सिस्टम मौजूद है जो अपना काम करेगा। मगर अब साफ़ दिखाई दे रहा है कि हाल ही में हुई घटनाओं ने इस भरोसे को कम किया है। अगर आप एक विदेशी कंपनी की इक्विटी ख़रीदते हैं, और कुछ साल बाद, कोई तय कर लेता है कि आपका देश या आपकी कंपनी एक क्लाईमेट क्रिमिनल है (ये असल की टर्म है), और ब़ड़े हितों के नाम पर उस पर रोक लगनी चाहिए, तो क्या आपका पैसा आपको वापस मिलेगा? अचानक, दुनिया भर में कई लोग अब इस तरह के सवाल पूछ रहे हैं।
राहत की बात ये है कि भारत के पास UPI और Rupay जैसे सिस्टम मौजूद हैं। ये कम-से-कम उस फ़ाईनेंशियल सिस्टम की बुनियाद हैं जिसे आज़ादी की बुनियाद भी कहा जा सकता है। हालांकि, हमारे बचत और निवेश के सिस्टम बाक़ी दुनिया के साथ गुंथे हुए हैं। 1980 की शुरुआत तक तो हम भारतीय, एक ऐसे फ़ाईनेशियल सिस्टम में जी रहे थे जो आसानी से ज़ब्ती की जा सकती थी। हम सभी जानते थे कि सरकार कभी भी, कुछ भी ज़ब्त कर सकती थी और इसलिए सोने, ज़मीन और कैश पर हमारा गहरा भरोसा था। आर्थिक सुधारों के बाद, हम मानने लगे कि अब हम ग्लोबल (असल में, पश्चिमी) फ़ाईनेंशियल सिस्टम का हिस्सा हो गए हैं, जिसमें मनमर्ज़ी नहीं चल सकती। ये विश्वास अब हिल गया है और बहुत गहरे से।

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