
इस महीने की कवर स्टोरी है, 'युद्ध के समय में निवेश’। मगर फिर ये सही नहीं लगता क्योंकि सिर्फ़ हेडलाईन ही युद्ध की है; स्टोरी नहीं। तो क्या ये स्टोरी आपको पढ़वाने के लिए हम ग़लत हेडलाईन इस्तेमाल कर रहे हैं? अगर उसी भाषा में कहूं जो चलन में है, तो क्या कवर की हेडलाईन क्लिकबेट है? नहीं, ऐसा कहना सच से दूर जाना होगा। मैं इस बात को विस्तार से आपके सामने रखता हूं।
अगर आप सोच रहे हैं, कि ये कवर स्टोरी हमने प्लान की थी तो ऐसा नहीं है। मगर, कई दूसरी चीज़ों की तरह, रूस-यूक्रेन ने हमारी ओरिजनल कवर स्टोरी के प्लान को भी ध्वस्त कर दिया। मैं ये नहीं बताऊंगा कि वो कौन सी स्टोरी थी क्योंकि आने वाले वक़्त में हमारा प्लान उस स्टोरी को आपके सामने लाने का है।
हालांकि, जब आप इस स्टोरी को पढ़ेंगे, तो आपको एहसास होगा कि ये सिर्फ युद्ध के समय निवेश के सवाल पर ही फ़िट नहीं बैठती बल्कि किसी भी तरह की अनिश्चितता और उथल-पुथल के दौर के लिए सही है। ये ठीक वैसा ही है जैसा हमने तब किया होता (एक अलग शुरुआत के साथ) जब कोविड-19 दुनिया भर में फैलना शुरु हुआ था। जो भी हमने यहां लिखा है वो सब एक टेंपलेट की तरह भविष्य में किसी भी ऐसे मौक़े पर इस्तेमाल किया जा सकता है जब अचानक और अनिश्तता की कोई 'बाहरी' वजह सामने आ जाए और आप के निवेश को प्रभावित करने लगे।
इसे नोट करें कि मैंने बाहरी वजह कहा। इससे मेरा मतलब है, बिज़नस और अर्थव्यवस्था से बाहर के कारण। जहां युद्ध और वायरस बिज़नस और अर्थव्यवस्था को प्रभावित तो करते हैं, पर वो बाहरी घटना के तौर पर शुरुआत करते हैं। कुछ और तरीक़े के संकट भी होते हैं जो मार्केट या वित्तीय कारण होते हैं और बिज़नस के भीतर से शुरु होते हैं-और इनके लिए अलग क़िस्म के टेम्पलेट की ज़रूरत होती है। इसी की मिसाल होगी 2007-09 का ग्लोबल फ़ाईनेंशियल क्राईसिस।
हमारी कवर स्टोरी में, आप नोटिस करेंगे कि यूक्रेन या रूस या ऐसी किसी चीज़ पर हमारा अपना कोई फ़िक्स्ड नज़रिया नहीं है, और मुझे भरोसा है कि आप इसके लिए वैल्यू रिसर्च को धन्यवाद देंगे। क्या आपने नोटिस किया है कि सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया दोनों पर ही मौजूद, वो हर शख़्स जो एक महीने पहले तक छूत के रोगों का एक्सपर्ट हुआ करता था, अचानक जिओपॉलिटिक्स और मिलिट्री टैक्टिक्स का एक्सपर्ट हो गया है? और बता रहा है कि रूस का S-400 डिफ़ेंस सिस्टम, नाटो के लड़ाकू जहाज़ों के ख़िलाफ़ कितना असरदार होगा। ये वही लोग थे जो पिछले महीने आपको बता रहे थे कि क्यों mRNA वैक्सीन ज़्यादा असरदार होंगी बजाए एडेनोवायरस-बेस्ड वैक्सीन के।
वैल्यू रिसर्च में इस तरह का कोई दिखावा आप नहीं पाएंगे। हमारा फ़ोकस पूरी तरह से निवेश और बचत और इस बात पर है कि अगर कुछ करने की ज़रूरत है, तो हमें क्या करना चाहिए। हम यहां इसलिए हैं कि आपको बता सकें कि एक निवेशक के तौर पर आपका अगला क़दम क्या होना चाहिए। मैं तो यही कहूंगा कि आप ख़बरे पढ़ना तो जारी रखें, मगर निवेश के अपने नज़रिए पर उसका असर न पड़ने दें। मेरे और आपके पास भविष्य में झांकने और ये पता लगाने का कोई तरीक़ा नहीं है कि ग्लोबल लीक्विडिटी का क्या होगा या युद्ध में क्या होने वाला है या ब्लादिमीर पुतिन की या जो बाइडेन की मनःस्थिति कैसी है। हालांकि, याद रखने वाली बात ये है कि हमें अपने निवेश के संदर्भ में इस सबके बारे में कुछ भी जानने की ज़रूरत नहीं है, जब तक हम पंटर न हों, जो कुछ दिनों या कुछ हफ़्तों के लिए ही निवेश करते हैं।
अच्छी बात ये है कि हमारी मैगज़ीन पढ़ने वाले ज़्यादातर लोग पंटर नहीं बल्कि असल निवेशक हैं। इतनी बड़ी-बड़ी घटनाओं से फैली अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव के चलते, कोई शक़ नहीं है कि हमारे निवेश में बड़ी कमी आए, जिसमें बीच-बीच में बढ़त का उत्साह भी शामिल हो। मगर सच तो ये है कि ऐसे झटके का सामना करने के लिए भारतीय बाज़ार पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं। इक्विटी में बड़ी मात्रा में हुए घरेलू निवेश, ख़ासतौर पर इक्विटी की SIP और EPFO के निवेश, अब सुरक्षा की ऐसी परत बना रहे हैं जो पहले नहीं थी। कुछ रुकावटें तो आएंगी, मगर जो निवेशक अपने निवेश की क्वालिटी पर फ़ोकस बनाए रखते हैं और निवेश करने से पीछे नहीं हटते वो बेहतर नतीजे पाते रहेंगे।
अंत में, अगर आप अपने निवेश फ़ंड पर अपना फ़ोकस बनाए रखते हैं, और वो आपके फ़ाईनेंशियल गोल से मेल खाता है, तो आने वाले हफ़्ते और महीने असल में आपके एक मौक़ा होंगे, बहुत अच्छी वैल्यू पर निवेश करते रहने के लिए, बाक़ी और कुछ भी होता रहे।