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साइज़ बढ़ा लेकिन कम हुआ रिटर्न, स्मॉल-कैप फ़ंड्स के साथ ऐसा क्यों हुआ?

भारत के सबसे बड़े स्मॉल-कैप फ़ंड्स के सबसे अच्छे साल शायद पीछे छूट गए हैं

भारत के सबसे बड़े स्मॉल-कैप फ़ंड्स के सबसे अच्छे साल शायद पीछे छूट गए हैंAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः स्मॉल-कैप निवेश में बड़े होने की सज़ा असली है और बढ़ती जा रही है. कड़वी सच्चाई यह है कि आज के ज़्यादातर दिग्गज फ़ंड ने अपने सबसे अच्छे रिटर्न तब कमाए जब वो दिग्गज नहीं थे.

जब SBI Small Cap Fund का AUM क़रीब ₹792 करोड़ था तब इसने अपने बेंचमार्क को तीन साल के आधार पर सालाना क़रीब 17% से पीछे छोड़ा. आज यह उससे क़रीब 47 गुना बड़ा हो चुका है और बेंचमार्क के साथ चलना मुश्किल हो रहा है. वही फ़ंड मैनेजर, बदला सिर्फ़ फ़ंड का साइज़. और बस यही काफ़ी था.

SBI का स्मॉल-कैप फ़ंड अकेला नहीं है. पिछले एक दशक में किसी भी स्मॉल-कैप फ़ंड को उसके AUM के साथ देखें तो एक ही बात बार-बार दिखती है: जब तक फ़ंड छोटा था अल्फ़ा बना रहा, यानी Nifty Smallcap 250 से ऊपर रिटर्न दे रहा था. जैसे-जैसे साइज़ बढ़ा, अल्फ़ा सिकुड़ता गया. Nippon, DSP, Kotak और Axis सबने अपने सबसे अच्छे साल छोटे रहते हुए दिए और सबसे कमज़ोर प्रदर्शन बड़े होने के बाद किया.

Quant एक अपवाद जैसा लगता है. ₹1 करोड़ की शुरुआत से देखें तो इसका अल्फ़ा बढ़ता दिखता है. लेकिन असल में यह क़रीब ₹3,000 करोड़ AUM पर चरम पर था और उसके बाद AUM के 10 गुना बढ़ने के साथ अल्फ़ा गिरता गया. पैटर्न वही है, बस शुरुआती बिंदु हमें भ्रमित करता है.

साइज बढ़ने के साथ टॉप 5 स्मॉल-कैप फ़ंड

एक को छोड़कर बाक़ी सभी दिग्गजों का अल्फ़ा एक दशक में काफ़ी घट गया.

फ़ंड
AUM तब → अब (करोड़ ₹) अल्फ़ा पहले → अल्फ़ा बाद में
Nippon India 6,542 → 72,673 17.7 → 0.2
HDFC 951 → 38,168 -1.1 → -4.5
SBI 792 → 37,141 17.5 → -6.9
Quant 1 → 30,373 -9.2 → -0.6
Axis 304 → 27,364 2.8 → -2.8
जनवरी 2016 से अप्रैल 2026 का डेटा. अल्फ़ा तीन साल की अवधि में Nifty Smallcap 250 के मुक़ाबले फ़ंड का अतिरिक्त रिटर्न दर्शाता है.

यह स्मॉल-कैप निवेश का कड़वा सच है. जो तरीक़ा एक छोटे फ़ंड को शानदार बनाता है वही तरीक़ा एक बड़ा फ़ंड कभी नहीं अपना सकता. इसलिए किसी फ़ंड की साख पर भरोसा करने से पहले एक सवाल पूछें: जिन रिटर्न ने इस फ़ंड का नाम बनाया, क्या वो रिटर्न आज भी मिल रहा है?

पहली वजह: पोज़ीशन जो बेची नहीं जा सकती

साइज़ रिटर्न को क्यों खा जाती है? पहली वजह वो है जिससे स्मॉल-कैप मैनेजर हर रोज़ जूझता है: पैसे की मौजूदगी.

SEBI ने अब हर स्मॉल-कैप और मिड-कैप फ़ंड के लिए बताना ज़रूरी कर दिया है कि दबाव में पोर्टफ़ोलियो बेचने में कितने दिन लगेंगे. ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं. SBI को अपनी आधी होल्डिंग बेचने में क़रीब 65 दिन लगेंगे. DSP को 52 और HDFC को 51 दिन लगेंगे. ITI जैसे छोटे फ़ंड को सिर्फ़ एक दिन.

65 दिन ट्रेडिंग साल का एक चौथाई है. तेज़ गिरावट में इतने समय में आधी होल्डिंग बेचने वाला फ़ंड रास्ते से हट नहीं सकता. जब तक बेच पाए, क़ीमतें पहले ही गिर चुकी होती हैं. निवेशक पूरी गिरावट झेलता है.

AMFI का स्ट्रेस टेस्ट डेटा

ज़्यादा स्मॉल-कैप हिस्सेदारी वाले बड़े फ़ंड पोर्टफ़ोलियो के लिए जोख़िम बन सकते हैं.

फ़ंड
AUM (करोड़ ₹) स्मॉल-कैप हिस्सेदारी (%) आधा पोर्टफ़ोलियो बेचने में दिन
Nippon India 72,673 73 29
HDFC 38,168 83 51
SBI 37,141 95 65
Quant 30,374 71 65
Axis 27,364 78 23
Bandhan 25,346 78 14
DSP 17,906 95 52
Kotak 17,417 81 39
Tata 11,330 92 48
Invesco 11,038 67 12
ITI 2,937 71 1
AMFI स्ट्रेस टेस्ट, अप्रैल 2026 के आधार पर.

वजह सीधी है. एक छोटी कंपनी के शेयर थोड़े-थोड़े ट्रेड होते हैं. कुछ सौ करोड़ का फ़ंड बिना निशान छोड़े आ-जा सकता है. ₹37,000 करोड़ का फ़ंड ख़रीदते वक़्त क़ीमत ऊपर धकेलता है और बेचते वक़्त नीचे. फ़ंड जितना बड़ा, उससे निकलना उतना मुश्किल. चढ़ते बाज़ार में यह धीरे-धीरे रिटर्न कम करता है. गिरते बाज़ार में होल्डिंग पिंजरा बन जाती है. निवेशक स्मॉल-कैप गिरावट का पूरा झटका झेलता है लेकिन वो फ़ुर्ती नहीं मिलती जो इस जोख़िम का इनाम देती है.

लेकिन साइज़ आधी कहानी है. Nippon सबसे बड़ा फ़ंड है फिर भी 29 दिनों में आधी होल्डिंग बेच सकता है. SBI, DSP या Tata से तेज़, जो इसके आधे साइज के भी नहीं हैं. AUM के साथ स्मॉल-कैप हिस्सेदारी मिलकर पूरी तस्वीर दिखाती है और वहीं असली जाल है.

दूसरी वजह: तालाब बहुत छोटा है

दूसरी वजह बुनियादी है. भारत में सिर्फ़ इतनी ही स्मॉल कंपनियां हैं जिनमें निवेश करना सही है और एक बड़ा फ़ंड उन्हें जल्दी ख़त्म कर देता है.

₹500 करोड़ की कंपनी में एक ऐसी पोज़ीशन रखने के लिए जो मायने रखे, यानी फ़ंड का 1%, एक ₹40,000 करोड़ का फ़ंड उस पूरी कंपनी को ख़रीद ले. ऐसा नहीं हो सकता. तो समझौता करना पड़ता है और हर समझौते की क़ीमत होती है. Nippon और Bandhan की तरह 247 और 251 शेयरों में पैसा बिखेरो और लिक्विड रहो, लेकिन तब वो मुट्ठी भर ऊंचे भरोसे के दांव कमज़ोर पड़ जाते हैं जो असल में फ़र्क़ डालते हैं. या कम शेयरों में टिके रहो और उन्हें ट्रेड करने की क्षमता गंवा दो.

साइज़ रिटर्न से ज़्यादा टिके रहने की क्षमता को सीमित करती है

यह ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए कि दिग्गज पैसा नहीं बनाते. Nippon, Quant और Bandhan तीन और पांच साल के रिटर्न पर पॉज़िटिव हैं और Bandhan पूरी कैटेगरी में सबसे ऊपर है. साइज़ संभावनाएं कम करती है लेकिन नतीजा तय नहीं करती: यह सिर्फ़ वो दायरा सिकोड़ती है जिसमें फ़ंड काम कर सकता है. एक सच में काबिल मैनेजर बड़े बेस से भी जीत सकता है. Nippon ने कन्संट्रेशन घटाकर ऐसा किया है; वहीं Bandhan ने 251 स्टॉक्स को शामिल करने के लिए बेहतरीन स्टॉक-पिकिंग के ज़रिए ऐसा किया है.

एक ज़रूरी सच्चाई यह भी है. जब ये फ़ंड छोटे थे उन्हीं सालों में स्मॉल-कैप बहुत तेज़ दौड़ा था और तब से ठंडा पड़ा है. इसलिए घटते अल्फ़ा का कुछ हिस्सा बाज़ार के उस दौर से भी आता है. लेकिन जो बात साइज़ पर दोष डालती है वो यह है कि सबसे बड़े फ़ंड सबसे ज़्यादा फीके पड़े जबकि छोटे रहने वाले कई फ़ंड ने अपनी बढ़त बनाए रखी.

आपके पैसे के लिए इसका मतलब

बड़े स्मॉल-कैप फ़ंड में साइज़ का जोख़िम है, लेकिन जोख़िम अकेला इन्हें नकारने की वजह नहीं है. एक अच्छे फ़ंड और एक फंसे हुए फ़ंड में फ़र्क़ यह है कि वो इस जोख़िम को कैसे संभालता है. इसका जवाब तीन नंबरों में है.

फ़ंड मैनेजर की स्मॉल-कैप हिस्सेदारी देखें: क्या वो इसे ऊपरी सीमा की तरफ़ जाने दे रहा है या वहां रख रहा है जहां पोर्टफ़ोलियो अभी भी ट्रेड हो सके?

AMFI स्ट्रेस टेस्ट से पोर्टफ़ोलियो बेचने में लगने वाले दिन देखें. यह नंबर जितना लंबा, अगली गिरावट का उतना बड़ा हिस्सा फ़ंड को झेलना होगा.

वहीं, सिर्फ़ आज का नहीं बल्कि AUM बढ़ने के साथ Nifty Smallcap 250 के मुक़ाबले तीन और पांच साल के अल्फ़ा को देखें. एक मीडियम साइज़ का फ़ंड जो तीनों पर खरा उतरे, वही अभी भी रखने लायक़ है.

यह भी पढ़ें: स्मॉल-कैप फ़ंड्स फिर से खुल गए हैं. इसे ख़रीद का संकेत न समझें!

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