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एक बुरा साइड-इफ़ेक्ट

देश नई टैक्स रिज़ीम (new tax regime) की तरफ़ बढ़ रहा है, मगर बचत करने के फ़ायदे हटाना एक बेहद बुरा साइड-इफ़ेक्ट कहलाएगा

देश नई टैक्स रिज़ीम (new tax regime) की तरफ़ बढ़ रहा है, मगर बचत करने के फ़ायदे हटाना एक बेहद बुरा साइड-इफ़ेक्ट कहलाएगा


कोविड के दौरान आए बजट (budget) के दो साल बाद, इस बार का बजट क़रीब-क़रीब सामान्य बजट माना जाएगा. जब दुनिया महामारी से ग्रस्त थी, तब दुनिया भर के ज़्यादातर देशों का लक्ष्य था कि वित्तीय स्थिति को बिना बहुत बिगाड़े, वो बस ख़र्च-ख़र्च-ख़र्च कर पाएं. कुछ देश इसमें सफल हुए, बहुत से नहीं हुए, पर हां, भारत ज़रूर सफल रहा.

एक सामान्य बजट में हमेशा अपेक्षा की जाती है कि टैक्स को घटाया-बढ़ाया जाएगा. ख़ासतौर पर एक बात पर मैं हमेशा ही सबसे ज़्यादा फ़ोकस करता हूं, और वो है, टैक्स का बचत और निवेश पर असर. इसे लेकर ये बजट पिछले कई साल में सबसे ज़्यादा भ्रमित करने वाला बजट रहा. वहीं, हम तेज़ी से नए और आसान टैक्स सिस्टम की तरफ़ बढ़ रहे हैं. बजट में कई प्रावधानों का मक़सद है, पुरानी टैक्स रिज़ीम के मुक़ाबले, नई टैक्स रिज़ीम को ज़्यादा लुभावना बनाना. साफ़ है कि ये तब तक चलता रहेगा जब तक हम पुरानी टैक्स रिज़ीम को देर-सबेर पूरी तरह से अलविदा नहीं कह देते.

बुनियादी तौर पर, इसमें कुछ ग़लत नहीं. जो कोशिश, पुराने डायरेक्ट टैक्स कोड (Direct Tax Code) में एक दशक पहले फ़ेल हो गई थी; नई टैक्स रिज़ीम ने उसे अमली जामा पहना दिया है. एक आसान सिस्टम, जिसमें टैक्स रेट (tax rates) कम होंगे और बहुत ही कम छूट (exemptions) होगी. ये बात सोच और अमल करने के स्तर पर अच्छी लगती है. असल में कोई भी छूट, सिस्टम को साधन संपन्न लोगों के पक्ष में कर देती है और वो जितना टैक्स चुकाना चाहिए उससे कम टैक्स देते हैं. उससे भी बड़ी बात है कि एक समानांतर व्यवस्था, जिसमें दो सिस्टम कई साल साथ-साथ चलते रहते हैं, ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीक़ा होता है.

हालांकि, लोगों की बचत और उनके निवेश की आदतों पर नए बदलावों का क्या असर होगा, इसे लेकर मैं काफ़ी भ्रम में हूं. सिद्धांत के तौर पर तो ये अच्छा है कि बिना छूट के प्रावधानों के कम टैक्स दिया जाए. मगर इससे टैक्स देने वालों के लिए बचत करने के लिए प्रोत्साहन कम रह जाता है. छूट अच्छी और बुरी दोनों होती हैं, पर छूट की वजह से बचत की आदत, बिना शक़ हमेशा अच्छी होती है. इस पर मेरी राय साफ़ है-नए वैकल्पिक टैक्स सिस्टम में बचत के फ़ायदे कम कर देने से बचत कम की जाएगी, और जीवन में बाद के सालों में, ज़्यादातर लोग तंगी का सामना करेंगे.

टैक्स-बचत वाले निवेश न हों, तो कई लोग, ख़ासतौर पर युवा और जिनकी आमदनी कम है, वो बिल्कुल बचत नहीं करेंगे. हमारी सोसायटी कंज़्यूमर आधारित है और ख़र्च करने के लिए ही बनाई गई है, बचत करने के लिए नहीं. बचत करने पर मिलने वाली टैक्स की छूट असल में बचत से आगे की बात है. टैक्स की बचत तो एक शुरुआत होती है, जो बचत करने वालों को ज़्यादा पैसे बचाने के लिए प्रेरित करती है. मैंने अपने जानने वाले युवाओं के साथ इसे अनगिनत बार होते हुए देखा है. आप इससे बचत की शुरुआत करते हैं और आपको अच्छे रिटर्न मिलते हैं क्योंकि इसमें लॉक-इन पीरियड होता है. कई लोगों के लिए, ये बचत और आर्थिक सुरक्षा की ऐसी आदत बन जाती है जो ज़िंदगी भर क़ायम रहती है.

टैक्स बचाने वाले निवेशों को पूरी तरह ख़त्म कर देना नई टैक्स रिज़ीम का निराश करने वाला साइड-इफ़ेक्ट है, और ऐसा साइड-इफ़ेक्ट जिस पर मेरी समझ से वित्तमंत्री ज़रूर ध्यान देंगी.

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