Illustration: Anand Kumar
पिछले तीन से चार दशकों तक ये दौर अच्छा चला, पर अब ख़त्म हो गया है. मैं बात कर रहा हूं भारत में एक्टिव तरीक़े से मैनेज किए जाने वाले (actively-managed) लार्ज कैप इक्विटी डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड्स की. लंबे अर्से तक ये कैटेगरी सबकी पसंदीदा रही, और ज़्यादातर म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो का मुख्य हिस्सा (core holding) हुआ करती थी. इन्हें लेकर कई फ़ंड्स का लंबा ट्रैक रिकॉर्ड रहा और जिन कंपनियों में उनका निवेश था वो भी उनके लिए जानी-पहचानी थीं. पर अब वो दिन बीत गए हैं, शायद हमेशा के लिए. अब एक्टिव तरीक़े से मैनेज किए जाने वाले लार्ज-कैप फ़ंड, किसी भी तरह से सेंसेक्स और निफ़्टी के सामने टिकने में सक्षम नहीं रह गए हैं.
हाल ही में, वैल्यू रिसर्च में हमारी टीम ने एक स्टडी की, जिसमें हमने लंबे-चौड़े इतिहास वाले 25 एक्टिवली-मैनेज्ड लार्ज-कैप फ़ंड्स पर ग़ौर किया और उनकी तुलना सेंसेक्स TRI इंडेक्स के पांच साल के रोलिंग रिटर्न से की. हमने पाया कि 2/3 से ज़्यादा फ़ंड (17) इंडेक्स को 25 प्रतिशत या उससे कम बार हरा पाए. बाक़ी के चार के लिए ये नंबर 50 प्रतिशत से कम था. ज़ाहिर तौर पर ये नंबर चौंकाने वाले हैं.
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बेशक़, इस बदलाव के कई कारण रहे. बदलते परिदृश्य में, बाज़ार की बढ़ी हुई दक्षता और पारदर्शिता ने फ़ंड मैनेजरों के लिए किसी छिपी हुई वैल्यू को खोजने, और अल्फ़ा तलाशने का काम पहले से कहीं ज़्यादा चुनौती भरा बना दिया है. अब हर छोटे-बड़े निवेशक के पास जानकारियों का डेटा रियल टाइम में पहुंच जाता है, जिसने सूचनाओं के अंतर को कम कर दिया है. ये वही आयाम था जिसका पेशेवर लोग फ़ायदा उठाते थे. इसके अलावा लार्ज-कैप कंपनियां को लेकर कोई रहस्य नहीं होते और इसलिए यहां कोई ढके-छुपे रत्न नहीं मिलते.
दिलचस्प है कि सोशल मीडिया में, ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो कह रहे हैं कि लार्ज-कैप इन्वेस्टिंग ख़त्म हो चुकी है. ये सच नहीं. समस्या इतनी बड़ी भी नहीं है: दरअसल एक्टिव मैनेजरों के लिए अब ये संभव नहीं रह गया है कि वो मैनेजमेंट फ़ीस भी लें और उसके साथ इतना मुनाफ़ा भी खड़ा कर सकें कि सेंसेक्स और निफ़्टी के रिटर्न से ज़्यादा रिटर्न दिया जा सके. मगर लार्जकैप को लेकर इस तरह के भ्रम इतने बड़े पैमाने पर क्यों फैले? इसकी एक वजह तो सोशल मीडिया है, जो हर बात पर तिल का ताड़ बना देता है. और मीडिया में मुश्किल मगर यथार्थवादी नज़रिए के बजाए, अतिरेक ही ध्यान खींचता है और इसलिए बातों का कम, बल्कि बतंगड़ का बोलबाला ज़्यादा है.
लार्ज-कैप स्टॉक (और इन स्टॉक में निवेश करने वाले इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड) का पूरा मुद्दा ये है कि लार्ज-कैप, एक बिज़नस और एक स्टॉक के तौर पर ज़्यादा स्थिर यानी स्टेबल होते हैं. बिज़नस के तौर पर, वो काफ़ी गतिशील भी होते हैं. यानी, उनमें किसी भी तरह का उलटफेर होने में काफ़ी लंबा समय लगता है. लार्ज-कैप कंपनियों के पास एक बड़ा फ़्लोटिंग स्टॉक होता है और उनमें निवेश करने वाले निवेशकों का एक बड़ा समूह भी मौजूद रहता है. इससे उन पर लोगों की बड़े पैमाने पर नज़र रहती है और बारीक़ी से विश्लेषण किया जाता है. इससे ये संभावना कम हो जाती है कि उनकी कोई ख़बर या कोई ज़रूरी तथ्य छिपा रहे. बड़े फ़्लोटिंग स्टॉक का मतलब ये भी है कि अगर आप बुरे दौर में भी इन शेयरों को बेचने की कोशिश करते हैं, तो ये आसान होता है और छोटी कंपनियों की तुलना में इंपैक्ट कॉस्ट (impact cost) कम होती है. ये सब सामान्य नियम हैं, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं, पर कुल मिला कर यही सच है. अक्सर डाइवर्स प्रोडक्ट पोर्टफ़ोलियो (diverse product portfolio) में लार्जकैप, अपने जैसी मिड और स्मॉल-कैप कंपनियों की तुलना में कम उतार-चढ़ाव वाले होते हैं. संक्षेप में कहूं, तो लार्ज-कैप कंपनियों में इन्वेस्टमेंट की इंट्रिंसिक वैल्यू (intrinsic value) बनी रहती है.
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इन बातों में से कुछ भी नहीं बदला है. बात सिर्फ़ इतनी है कि जो निवेशक अब तक इस एक्टिव-पैसिव वाली कहानी से बचते रहे हैं, उन्हें ये समझना होगा कि कौन सी चीज़ कैसी है. एक्टिवली-मैनेज्ड म्यूचुअल फ़ंड एक मार्केट इंडेक्स से ज़्यादा रिटर्न का लक्ष्य रखने के साथ-साथ मार्केट से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद करते हैं. वहीं, इंडेक्स फ़ंड, जिन्हें अक्सर पैसिवली-मैनेज्ड फ़ंड के तौर पर जाना जाता है, यानी ऐसे फ़ंड जो बस मार्केट के इंडेक्स को दोहारने का प्रयास करते हैं. मिसाल के तौर पर, BSE सेंसेक्स के प्रदर्शन को दोहराने वाला एक इंडेक्स फ़ंड, सेंसेक्स की तरह 30 कंपनियों के शेयरों को ठीक उसी अनुपात में अपने पोर्टफ़ोलियो में रखेगा. नतीजा, ऐसे फ़ंड में निवेशकों को BSE सेंसेक्स जैसे रिटर्न मिलेंगे. इंडेक्स फ़ंड के पीछे की फ़िलॉसफ़ी इसी विश्वास पर आधारित होती है. अब होता ये है कि ख़र्चों के हिसाब-क़िताब के बाद, ज़्यादातर फ़ंड मैनेजर लगातार बाज़ार से आगे नहीं रह पाते और जो ऐसा करते हैं उन फ़ंड्स को लगातार खोज निकालना संभव नहीं होता. असल में दशकों तक भारत में ऐसा नहीं हुआ करता था. पर, वो वक़्त कम से कम ऐसे फ़ंड्स के लिए तो गुज़र गया है.