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Atlanta Electricals का शेयर किन वजहों से एक साल में हुआ दोगुना?

70 गुना सब्सक्राइब हुए IPO के बाद, इस कम चर्चित ट्रांसफ़ॉर्मर कंपनी का शेयर एक साल में दोगुने से ज़्यादा हो गया है. इस सफ़र में कंपनी ने जो खड़ा किया, असली बात वही है

70 गुना सब्सक्राइब हुए IPO के बाद, इस कम चर्चित ट्रांसफ़ॉर्मर कंपनी का शेयर एक साल में दोगुने से ज़्यादा हो गया है. इस सफ़र में कंपनी ने जो खड़ा किया, असली बात वही हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः लिस्टिंग के एक साल बाद Atlanta Electricals का शेयर दोगुने से ज़्यादा चढ़ चुका है. इस दौरान प्रमोटर्स ने अपनी हिस्सेदारी नहीं घटाई और मुनाफ़ा बढ़ता रहा, जबकि वैल्यूएशन मल्टीपल में सिर्फ़ क़रीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. ये स्टोरी इसके पीछे की वजहें बता रही है, जिनमें लगभग दोगुनी हुई ऑर्डर बुक से लेकर 19 साल तक मंज़ूरियों की वो सीढ़ी चढ़ना, जो इसका असली सुरक्षा कवच है, शामिल हैं.

एक साल पहले तक Atlanta Electricals ट्रांसफ़ॉर्मर बनाने वाली 37 साल पुरानी एक ऐसी कंपनी थी, जिसका नाम ज़्यादातर निवेशकों ने सुना तक नहीं था. इसका IPO ₹754 प्रति शेयर के मामूली भाव पर आया, 70 गुना सब्सक्राइब हुआ और फिर सिर्फ़ 9 प्रतिशत प्रीमियम पर लिस्ट हुआ.

लेकिन धीरे-धीरे शेयर ने रफ़्तार पकड़ी. आज, अलॉटमेंट के बाद से होल्ड किया गया ₹1 लाख का निवेश बढ़कर क़रीब ₹2.25 लाख हो चुका है. अगर आपने यही ₹1 लाख Nifty 50 इंडेक्स फ़ंड में लगाए होते, तो आपका पैसा आज सिर्फ़ ₹96,000 का होता.

तीन निवेशक, तीन नतीजे

वही ₹1 लाख, तीन अलग-अलग एंट्री पॉइंट और उन्हीं दिनों में Nifty 50 इंडेक्स फ़ंड से तुलना

रास्ता आज की वैल्यू (₹) रिटर्न (%)
लिस्टिंग के दिन बेच दिया 1.1 लाख 9
अलॉटमेंट से होल्ड किया 2.2 लाख 125
लिस्टिंग के दिन क्लोज़िंग भाव पर ख़रीदा 2.1 लाख 106
आंकड़े 21 सितंबर 2026 तक के हैं. लिस्टिंग के बाद से कोई डिविडेंड, बोनस या स्प्लिट नहीं हुआ, इसलिए प्राइस रिटर्न ही टोटल रिटर्न है.

बड़े फ़ंड्स ने अपने कोटे से क़रीब 200 गुना ज़्यादा बोली लगाई, जबकि आम निवेशकों ने क़रीब 10 गुना. पहले ही दिन शेयर बेच देने वालों को ₹1 लाख से ज़्यादा की कमाई से हाथ धोना पड़ा. तो आख़िर कंपनी ने ऐसा क्या किया कि निवेशकों का ये सब्र सही साबित हुआ?

बेच कौन रहा था

जुटाए गए ₹687 करोड़ में से ₹400 करोड़ नया पैसा था. बाक़ी रक़म कंपनी की ओनर फैमिली ने क़रीब 5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर जुटाई. नया पैसा नई फ़ैक्ट्रियां लगाने में नहीं, बल्कि वर्किंग कैपिटल और कर्ज़ चुकाने में लगा. प्लांट पहले ही बन चुके थे और उनके लिए पैसा कर्ज़ लेकर जुटाया गया था.

Atlanta आख़िर बनाती क्या है

ट्रांसफ़ॉर्मर बिजली का वोल्टेज बदलते हैं, ताकि बिजली लंबी दूरी तय कर सके और फिर सुरक्षित तरीक़े से इस्तेमाल हो सके. Atlanta पावर यूटिलिटी कंपनियों और रिन्यूएबल एनर्जी प्लांट्स के लिए छोटे और बड़े ट्रांसफ़ॉर्मर बनाती है. पिछली तिमाही की बिक्री में पावर ट्रांसफ़ॉर्मर्स की हिस्सेदारी क़रीब 80 प्रतिशत थी और 2022 के बाद से कंपनी के ग्राहकों की संख्या तीन गुना से ज़्यादा हो गई है.

वो साल, जब नई क्षमता स्थापित हुई

फ़ाइनेंशियल ईयर 26 पहला पूरा साल था जब Atlanta का सबसे नया प्लांट चालू रहा, और रेवेन्यू व मुनाफ़ा दोनों रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे. पिछले पांच साल में दोनों 30 प्रतिशत सालाना से ज़्यादा की दर से बढ़े हैं.

क्षमता से ग्रोथ को मिली रफ़्तार

Atlanta की बढ़ती क्षमता ने पिछले दो साल में रेवेन्यू और मुनाफ़े की मज़बूत ग्रोथ को सहारा दिया है

मेट्रिक FY22 FY23 FY24 FY25 FY26 5 साल का CAGR (%)
रेवेन्यू (₹ करोड़) 625.7 873.9 867.6 1,244.20 1,851.50 31.2
EBITDA (₹ करोड़) 89.4 143.1 118.7 193.6 344.4 40.1
EBITDA मार्जिन (%) 14.3 16.4 13.7 15.6 18.6 -
टैक्स के बाद मुनाफ़ा (₹ करोड़) 55.3 87.5 63.5 118.7 201.8 38.2
PAT मार्जिन (%) 8.8 10 7.3 9.5 10.9 -
रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (%) 55 58 42.3 39.4 34.1 -
रिटर्न ऑन इक्विटी (%) 71.2 53.1 27.8 33.9 21.7 -
डेट-इक्विटी (गुना) 0.97 0.44 0.21 0.4 0.05 -

फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में कारोबार ठहरा रहा और मुनाफ़ा तो असल में घट गया. मुनाफ़ा बढ़ने के बावजूद कंपनी का रिटर्न ऑन कैपिटल भी धीरे-धीरे नीचे खिसकता गया, क्योंकि कंपनी ने पहले कर्ज़ लेकर और फिर IPO के ज़रिए मुनाफ़े से तेज़ रफ़्तार में पूंजी जोड़ी. नए प्लांट्स के पूरी क्षमता से चलने पर इसमें से कुछ गिरावट पलट जाएगी. कुछ हिस्सा बस विस्तार की क़ीमत है. सबसे साफ़ संकेत ऑर्डर बुक से मिलता है, जो एक साल में लगभग दोगुनी होकर क़रीब ₹3,100 करोड़ पर पहुंच गई है.

यहां तक पहुंचना आसान क्यों नहीं

कोई ट्रांसफ़ॉर्मर कंपनी सिर्फ़ ठान लेने से ऊंची वोल्टेज क्लास में नहीं पहुंच जाती. वो तभी आगे बढ़ती है, जब उसे इसकी इजाज़त मिलती है. यूटिलिटी कंपनियां सप्लायर्स को इस आधार पर प्री-क्वालिफ़ाई करती हैं कि उन्होंने अब तक क्या बनाया है और वो बिना किसी ख़राबी के कैसा चला है. ये सफ़र एक-एक पायदान करके तय होता है, और हर पायदान के बीच उसे सालों तक परखा जाता है.

Atlanta इस नियम की क़ीमत साफ़ दिखाती है. इसने 2007 में 132 kV मशीनें सप्लाई करनी शुरू कीं, 2014 में 220 kV तक पहुंची और 400 kV की मंज़ूरी 2026 में जाकर मिली. दो पायदान चढ़ने में 19 साल लग गए. यही रुकावट इसका सुरक्षा कवच भी है: नई फ़ैक्ट्रियां लगाने वाली प्रतिस्पर्धी कंपनियां रातोंरात उसी काम के लिए बोली नहीं लगा सकतीं.

किसी ने साथ नहीं छोड़ा

आम तौर पर लिस्टिंग की पहली सालगिरह की कहानी यही होती है कि लॉक-इन ख़त्म होते ही अंदरूनी लोग शेयर बेचने लगते हैं. यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ. लॉक-इन ख़त्म होने से पहले और बाद में भी प्रमोटर्स के पास क़रीब 87 प्रतिशत हिस्सेदारी बनी रही, वो भी तब, जब शेयर तेज़ी से ऊपर निकल रहा था.

इसकी वजह से फ़्री फ़्लोट 13 प्रतिशत से भी कम रह गया. कम फ़्री फ़्लोट ने शायद शेयर के उतार-चढ़ाव को और बढ़ाया, लेकिन ये स्थिति हमेशा नहीं रहेगी. प्रमोटर्स को लिस्टिंग के तीन साल के भीतर अपनी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत या उससे नीचे लानी होगी, जिससे अगले दो साल में फ़्री फ़्लोट बढ़ सकता है.

सस्ता नहीं, सारी उम्मीदें क़ीमत में शामिल

आज के भाव पर Atlanta की वैल्यू क़रीब ₹13,000 करोड़ है, जो इसकी लिस्टिंग वैल्यू के दोगुने से भी ज़्यादा है. इस बढ़त का ज़्यादातर हिस्सा कमाई बढ़ने से आया है, सिर्फ़ बाज़ार के ऊंचे मल्टीपल से नहीं. फिर भी, शेयर लिस्टिंग के वक़्त से महंगा हो गया है. ये क़रीब 60 गुना P/E पर ट्रेड कर रहा है, जो IPO के वक़्त 49 गुना था.

2025 में लिस्ट हुई 103 कंपनियों में से आधी से ज़्यादा आज अपने इश्यू प्राइस से नीचे ट्रेड कर रही हैं, जबकि सिर्फ़ दर्जन भर कंपनियों का भाव दोगुना हुआ है. Atlanta का प्रदर्शन सबसे अलग नज़र आता है, लेकिन ये मान लेने का जोख़िम भी उतना ही बड़ा है कि हर नई लिस्टिंग इसी राह पर चलेगी.

हमारी राय

ये ऐसा मामला है जहां कारोबार ने नतीजे दिए और शेयर ने उसका साथ दिया. प्लांट बने, कर्ज़ चुका, ऑर्डर बुक लगभग दोगुनी हुई और बढ़ते पैमाने के साथ मार्जिन सुधरे.

Atlanta ने अभी तक बहुत ऊंचे वोल्टेज वाले ट्रांसफ़ॉर्मर नहीं बेचे हैं, किसी टॉप-टियर पार्टनर के साथ क़रार नहीं किया है और एक्सपोर्ट भी शुरू नहीं किया है, जबकि कंपनी का गाइडेंस इन तीनों पर और प्लांट्स को दोगुनी रफ़्तार से चलाने पर टिका है. बीता साल कंपनी ने अपने दम पर कमाया. अगली कुछ तिमाहियां पहले ही क़ीमत में शामिल हैं.

अगली बार कोई IPO आपको लुभाए, तो उससे पहले तीन सवाल ज़रूर पूछें: पैसा असल में कहां जा रहा है, ग्रोथ ज़्यादा वॉल्यूम से आ रही है या ऊंची क़ीमतों से, और IPO के मुक़ाबले आप कितना वैल्यूएशन चुका रहे हैं. कोई कंपनी अपने वादे पूरे करके भी ग़लत क़ीमत पर ख़राब निवेश साबित हो सकती है.

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