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KYC का हिंदी में मतलब होगा 'कस्टमर को जानिए' पर लगता है इसका असली मतलब 'अपने कस्टमर को सताइए' हो गया है

KYC का हिंदी में मतलब होगा 'कस्टमर को जानिए' पर लगता है इसका असली मतलब 'अपने कस्टमर को सताइए' हो गया हैAnand Kumar

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अगर KYC अच्छा है, तो ज़्यादा KYC और भी अच्छा होना चाहिए, नहीं? म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के लिए KYC होने से काले धन और बेनामी निवेशकों के म्यूचुअल फ़ंड निवेश पर रोक लग सकती है. इसलिए अगर हम KYC करने को दोगुना कर दें जिससे एक ही निवेशक को बार-बार KYC कराना पड़े, तो पक्का ही ये ज़्यादा बेहतर होगा, है न? खैर, कम-से-कम सिद्धांत तो यही है जिस तरीक़े से KYC किया जाता है.

जब मैं अलग-अलग समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और अपने ख़ुद के वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन के लिए लिखे लेखों को देखता हूं, तो सबसे पहला लेख मुझे 23 मार्च 2014 का मिलता है, जो एक दशक से कुछ पहले का है. अगले दशक में, मुझे कम-से-कम सात और लेख मिले. बुनियादी तौर पर, ये सभी एक जैसे हैं. मैं नया लिखने के झंझट में पड़ने के बजाय आज उनमें से किसी एक को दोबारा छाप सकता था. उन सभी को इन प्वाइंट्स में समेटा जा सकता है:

1. KYC करने की बहुत ज़्यादा और दोहराव वाली प्रकृति छोटे निवेशकों पर बोझ है और कई लोगों को म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने से रोकती है.
2. reKYC की बार-बार मांग करना सही नहीं है और इसका कोई तर्क नहीं है.
3. यहां तक कि अगर कोई इस प्रक्रिया को ईमानदारी से पूरा करता है, तो भी reKYC की मांग किसी भी समय फिर से प्रकट हो सकती है और म्यूचुअल फ़ंड ट्रांज़ैक्शन के लिए अचानक रुकावट पैदा कर सकती है.
4. reKYC कैसे की जानी है, इस पर गाइडेंस असल में जो होता है उससे मेल नहीं खाती.

दरअसल, आज समस्या दशक पहले से भी बदतर है. उन दिनों, निवेशकों का एक बड़ा अनुपात एक ऐसे डिस्ट्रीब्यूटर के ज़रिए निवेश करता था जो व्यक्तिगत रूप से दी गई सर्विस होती थी. और नए निवेशक तो इसी तरह से करते थे. ये डिस्ट्रीब्यूटर जानता था कि सिस्टम कैसे काम करता है और ये पक्का करता था कि KYC पूरा हो जाए क्योंकि उन्हें अपना कमीशन पाने के लिए ट्रांज़ैक्शन ज़रूरी होता था. आजकल, हम पूरी तरह से डिजिटल होने के आधे रास्ते में हैं. आमने-सामने वाली व्यक्तिगत सर्विस डायरेक्ट डिजिटल निवेशक के लिए या ज़्यादतर निवेशकों के लिए मौजूद ही नहीं. है. इसके अलावा, सोशल मीडिया से ये स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में - कई लाख - निवेशकों को चुपचाप 'होल्ड पर' KYC स्थिति में डाल दिया गया है और उनके म्यूचुअल फ़ंड ट्रांज़ैक्शन ब्लॉक कर दिए गए हैं. ये प्रक्रिया उस तरह से काम नहीं कर रही है जैसी करनी चाहिए. मिसाल के तौर पर, KYC पर आधिकारिक FAQ में सात तरह के पहचान और पते के दस्तावेजों की लिस्ट दी गई है. जिनका इस्तेमाल KYC के लिए किया जा सकता है. मगर, अनगिनत लोगों की शिकायत है कि सात में से केवल आधार ही असल में स्वीकार किया जाता है. ऐसा क्यों है? किसी को पता नहीं?

आजकल लोग 'शिर्की प्रिंसिपल' की मिसाल देते हैं. ये सिद्धांत कहता है कि "संस्थाएं उस समस्या को बनाए रखने की कोशिश करेंगी जिसका वो समाधान हैं". जब मैं एक दशक से चली आ रही KYC गड़बड़ी को देखता हूं, तो मुझे यहां भी यही स्थिति लगती है, कम से कम कुछ हद तक तो ऐसा ही लगता है. जब आप KYC से गुज़रते हैं, तो कोई पैसा कमाता है. अगर आपको अनावश्यक रूप से दोबारा इससे गुज़रना पड़ता है, तो किसी का रेवेन्यू दोगुना हो जाता है. KYC इंडस्ट्री के लिए reKYC एक अच्छा बिज़नस है.

क्या आपको याद है फ़ास्टैग आने से पहले टोल रोड कैसी हुआ करती थीं? आप एक अद्भुत नए राजमार्ग पर यात्रा कर रहे होंगे और फिर अचानक असली कैश के साथ टोल का भुगतान करने के लिए एक किलोमीटर की लाइन में लगना होगा! म्यूचुअल फ़ंड निवेश यहीं तक पहुंच गया है. हमारे देश में ये शानदार नई डिजिटल फ़ाइनेंशियल और बैंकिंग सिस्टम और एक राष्ट्रीय डिजिटल आईडी सिस्टम है जिससे दुनिया ईर्ष्या की नज़र से देखती है. हालांकि, म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों को अपनी पहचान साबित करने के लिए ऑफ़िसों के चक्कर लगाने पड़ते हैं जैसे कि ये 20वीं सदी हो.

ये समस्या भारतीय म्यूचुअल फ़ंड निवेशक के लिए एक नासूर बन गई है. वास्तव में, हमें केवल नियमों/ क़ानूनों में संशोधन करने की ज़रूरत है कि जब तक KYC किए गए बैंक अकाउंट के ज़रिए पैसा आता है और जाता है, बस यही ज़रूरत है. ये पूरी म्यूचुअल फ़ंड KYC की गतिविधि केवल यूं ही बढ़ाया गया एक विशाल प्रोजेक्ट है जिसकी कोई ज़रूरत नहीं है.

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