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पराग पारिख को REITs पर इतना भरोसा क्यों है?

उनके दो फ़ंड्स ने डाइवर्सिफ़ाइड कैटेगरी में REITs में सबसे ज़्यादा निवेश किया है

उनके दो फ़ंड्स ने डाइवर्सिफ़ाइड कैटेगरी में REITs में सबसे ज़्यादा निवेश किया है
Vinayak Pathak/AI-Generated Image

सारांशः Parag Parikh के CIO को लगता है कि अगले तीन से पांच साल के लिए REITs एक भरोसेमंद एसेट हैं. उनके दो फ़ंड्स की क़रीब 9 प्रतिशत रक़म यहां लगी है. हमने रिटर्न, जोख़िम के साथ-साथ यह भी देखा कि REITs आपके लिए सही हैं या नहीं.

रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs) में सबसे ज़्यादा निवेश करने वाले डाइवर्सिफ़ाइड इक्विटी फ़ंड्स में पहले दो नाम पराग पारिख म्यूचुअल फ़ंड के हैं. डाइवर्सिफ़ाइड कैटेगरी में फ़्लेक्सी-कैप, मल्टी-कैप, लार्ज एंड मिड-कैप, ELSS और वैल्यू-ओरिएंटेड फ़ंड्स आते हैं.

अप्रैल 2026 के डेटा के मुताबिक़, फ़ंड हाउस की ELSS स्कीम और उसके प्रमुख फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड का REITs में सबसे ज़्यादा एलोकेशन क्रमशः 4.8 प्रतिशत और 4.1 प्रतिशत है.

Parag Parikh Flexi Cap ने पिछले महीने अपनी हिस्सेदारी और बढ़ाई. उसने Embassy Office Parks REIT की 35.5 लाख यूनिट और Brookfield India Real Estate Trust की 2.3 करोड़ यूनिट ख़रीदीं.

REITs में सबसे ज़्यादा एक्सपोज़र रखने वाले टॉप 5 डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड 

फ़ंड REITs में हिस्सेदारी (%)
Parag Parikh ELSS Tax Saver 4.8
Parag Parikh Flexi Cap 4.1
WhiteOak Capital Large & Mid Cap 2.8
WhiteOak Capital Multi Cap 2.6
Templeton India Value 2.6
अप्रैल 2026 तक

यह वक़्त ग़ौर करने वाला है. फ़ंड हाउस ऐसे समय रियल एस्टेट में निवेश बढ़ा रहा है जब इक्विटी मार्केट में उतार-चढ़ाव है और उनके पास कैश भी काफ़ी ज़्यादा है, जो एक ऐसा संकेत है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

राजीव ठक्कर की नज़र में REITs

1 Finance को दिए एक इंटरव्यू में, चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर राजीव ठक्कर ने बताया कि फ़ंड हाउस ने REITs में क़रीब 9 प्रतिशत निवेश क्यों किया है.

उनका मुख्य तर्क यह है: REITs, शुद्ध इक्विटी और फ़िक्स्ड इनकम के बीच कहीं आते हैं, हालांकि इनका व्यवहार इक्विटी जैसा ज़्यादा है. निवेशकों को इनसे दो तरह का फ़ायदा मिलता है: नियमित कैश पेआउट और कैपिटल अप्रिसिएशन.

ठक्कर का कहना है कि अगर मौजूदा क़रीब 6 प्रतिशत यील्ड के साथ 5-6 प्रतिशत कैपिटल एप्रिसिएशन जोड़ा जाए, तो निवेशकों को डबल डिजिट रिटर्न मिल सकता है. पत्रकार सोनिया शिनॉय से एक अलग बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि अगले तीन से पांच साल के लिए REITs से भरोसेमंद रिटर्न मिलने की उम्मीद है.

फ़ंड हाउस को इस एसेट क्लास में साफ़ संभावना दिखती है. लेकिन क्या उनका परफ़ॉर्मेंस इस भरोसे को सही साबित करता है?

REITs ने असल में कैसा परफ़ॉर्म किया

जो चार REITs एक साल से ज़्यादा समय से बाज़ार में ट्रेड हो रही हैं, उन्होंने लिस्टिंग के बाद से सालाना अच्छे रिटर्न दिए हैं. इन रिटर्न में क़ीमत में बढ़ोतरी और कैश डिस्ट्रीब्यूशन - दोनों शामिल हैं.

लिस्टिंग पर निवेश करते तो कितना मिलता

REITs लिस्टिंग की तारीख़ लिस्टिंग से अब तक कुल रिटर्न (%) पिछले साल की डिविडेंड यील्ड (%)*
Embassy Office Parks REIT 1 अप्रैल 2019 11.5 5.8
Mindspace Business Parks REIT 7 अगस्त 2020 20.7 12.7
Brookfield India Real Estate Trust 16 फ़रवरी 2021 9.1 6.7
Nexus Select Trust 19 मई 2023 22.3 5.8
*रिटर्न XIRR में सालाना आधार पर हैं और इनमें क़ीमत में बढ़ोतरी और कैश पेआउट - दोनों शामिल हैं; REIT की लिस्टिंग के दिन की ओपनिंग क़ीमत से 26 मई 2026 की क्लोज़िंग क़ीमत तक का हिसाब है. डिविडेंड यील्ड पिछले चार डिस्ट्रीब्यूशन के आधार पर है.

*रिटर्न XIRR में सालाना आधार पर हैं और इनमें क़ीमत में बढ़ोतरी और कैश पेआउट - दोनों शामिल हैं; REIT की लिस्टिंग के दिन की ओपनिंग क़ीमत से 26 मई 2026 की क्लोज़िंग क़ीमत तक का हिसाब है. डिविडेंड यील्ड पिछले चार डिस्ट्रीब्यूशन के आधार पर है.

ये आंकड़े प्रभावशाली हैं. Mindspace और Nexus Select ने लिस्टिंग के बाद से 20 प्रतिशत से ज़्यादा सालाना रिटर्न दिए हैं, जो एक अच्छे इक्विटी परफ़ॉर्मेंस जैसा है, लेकिन साथ में एक मज़बूत इनकम कंपोनेंट भी है. 

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म्यूचुअल फ़ंड्स REITs की तरफ़ क्यों आकर्षित हो रहे हैं

REITs में कुछ ऐसी ख़ूबियां हैं जो उन्हें पोर्टफ़ोलियो के लिए उपयोगी बनाती हैं.

नियमित इनकम: REITs, कमर्शियल ऑफ़िस बिल्डिंग या मॉल जैसी हाई-क्वालिटी प्रॉपर्टी से किराया कमाते हैं. उन्हें अपनी इनकम का कम से कम 90 प्रतिशत हिस्सा यूनिटहोल्डर्स को कैश पेआउट या डिविडेंड के रूप में देना होता है. इससे बाज़ार में उतार-चढ़ाव के बावजूद पैसिव इनकम का एक भरोसेमंद ज़रिया बना रहता है. हाल की डिविडेंड यील्ड्स 5.8 से 12.7 प्रतिशत के बीच रही हैं.

डाइवर्सिफ़िकेशन: REITs बिना सीधे प्रॉपर्टी ख़रीदने की झंझट के रियल एस्टेट में निवेश का मौक़ा देते हैं: न बड़ी रक़म की ज़रूरत, न कम लिक्विडिटी की समस्या, न काग़ज़ी कार्रवाई, न एक ही एसेट में सारा पैसा लगाने का जोख़िम. साथ ही, ये पोर्टफ़ोलियो को परंपरागत इक्विटी-डेट मिक्स से आगे भी डाइवर्सिफ़ाई करते हैं.

ख़राब एसेट का जोख़िम कम: REITs की एसेट क्वालिटी पर सख़्त नियम हैं. उनकी कुल एसेट का कम से कम 80 प्रतिशत, मूल्य के हिसाब से, पूरी बन चुकी और किराया देने वाली प्रॉपर्टी होनी चाहिए. सट्टेबाज़ी वाले या निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स में निवेश की गुंजाइश बहुत कम है.

इन्हीं वजहों से कुछ म्यूचुअल फ़ंड्स REITs को गंभीरता से लेने लगे हैं. जो निवेशक कुछ ग्रोथ के साथ इनकम भी चाहते हैं, उनके लिए REITs एक अहम भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन इनमें जोख़िम भी है.

जोख़िम जो याद रखें

पेआउट घट-बढ़ सकते हैं: REITs की सबसे आकर्षक बात उनका नियमित कैश पेआउट है. लेकिन निवेशकों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि भविष्य में पेआउट हमेशा पहले जैसे ही रहेंगे.

REIT डिस्ट्रीब्यूशन सिर्फ़ किराये की इनकम से नहीं आते. इनमें इंटरेस्ट इनकम, सब्सिडियरीज़ (special purpose vehicles) की ओर से भुगतान और कभी-कभी एसेट बिक्री से हुआ मुनाफ़ा भी शामिल होता है. इसलिए पेआउट की रक़म और उसकी बनावट दोनों अहम हैं. ऊंची यील्ड आकर्षक लग सकती है, लेकिन यह देखना ज़रूरी है कि वह स्थिर किराये की इनकम से आ रही है या किसी एकमुश्त चीज़ से.

लिक्विडिटी कम है: REIT यूनिट एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं, लेकिन ज़्यादातर स्टॉक्स की तुलना में इनकी रोज़ाना का ट्रेडिंग वॉल्यूम काफ़ी कम है. ख़ासकर मंदी के दौर में बड़ी पोज़िशन से जल्दी निकलना मुश्किल हो सकता है और क़ीमत भी आपके ख़िलाफ़ जा सकती है.

बाज़ार में गिरावट का असर पड़ता है: REITs, ब्रॉडर इक्विटी बाज़ार के उतार-चढ़ाव से अछूते नहीं हैं. ये शुद्ध इक्विटी से कम अस्थिर हो सकते हैं, लेकिन मंदी में इनकी यूनिट क़ीमतें गिरती ज़रूर हैं. इनकम इस झटके को थोड़ा कम करती है, पर पूरी तरह ख़त्म नहीं करती.

आपके लिए क्या मायने रखता है

असली एसेट एक्सपोज़र और नियमित इनकम डिस्ट्रीब्यूशन के साथ, REITs वाक़ई उपयोगी हैं. जो निवेशक मामूली ग्रोथ के साथ इनकम चाहते हैं, उनके पोर्टफ़ोलियो में इनकी जगह बन सकती है. लेकिन ये, दौलत बनाने में इक्विटी की जगह नहीं ले सकते - इसलिए इन्हें अपने पोर्टफ़ोलियो का 10 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा नहीं देना चाहिए.

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