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IRFC के इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बुरा दौर अभी आना बाक़ी है

समझिए कि क्या भारतीय रेलवे की अकेली फ़ाइनेंसर AUM में सुस्ती से बाहर निकलने के लिए खुद को डायवर्सिफ़ाई कर सकती है

समझिए कि क्या भारतीय रेलवे की अकेली फ़ाइनेंसर AUM में सुस्ती से बाहर निकलने के लिए खुद को डायवर्सिफ़ाई कर सकती हैAI-generated image

इंडियन रेलवे फ़ाइनांस कॉर्पोरेशन (IRFC) के निवेशकों ने अच्छे दिन देखे हैं. कई वर्षों तक शानदार मुनाफ़ा कमाने के बाद, शेयर मुश्किलों से जूझ रहा है. शेयर जुलाई 2024 के अपने पीक से लगभग 40 फ़ीसदी नीचे है. और फिर भी, इस बात की ख़ासी आशंका है कि सबसे बुरा दौर अभी खत्म नहीं हुआ है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पिछले एक साल से ज़्यादा समय से कंपनी जिस ग्रोथ से जुड़ी चुनौती का सामना कर रही है, उसका कोई अंत नहीं दिख रहा है. हालांकि, कंपनी सक्रियता के साथ काम कर रही है. ये खुद को मंदी से बाहर निकालने के लिए कदम उठा रही है. हम यहां इस बात का आकलन कर रहे हैं कि क्या ये कोशिशें कोई बदलाव ला पाएंगी.

लेकिन पहले, ग्रोथ से जुड़ी चुनौती क्या है?

पिछले कुछ साल IRFC के लिए असाधारण रहे हैं. इसने अपनी एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) को मज़बूती के साथ बढ़ते देखा (पांच साल की 18 फ़ीसदी की ग्रोथ), क्योंकि इसने भारतीय रेलवे के तेज़ी से बढ़ते पूंजीगत खर्च को वित्तपोषित किया और लीज़ रेंटल से स्थिर आय हासिल हुई. इसके अलावा, कोई टैक्स का भुगतान न करना (सरकारी आदेश के अनुसार छूट) और बैलेंस शीट पर कोई बैड लोन न होना, सॉवरेन-बैक्ड लेंडिंग के कारण (चूंकि य रेलवे को ऋण देता है), इसे कम जोखिम वाला बिज़नस बनाता है और ये डिविडेंड निवेशकों के लिए पसंदीदा रहा है.

हालांकि, भारी भरकम डिविडेंड भुगतान के साथ-साथ तेज़ ग्रोथ धीमी पड़ने वाली है. लेकिन, इसकी वजह क्या है? लेंडर ने लगातार पांच तिमाहियों से भारतीय रेलवे को कोई नया लोन नहीं दिया है. ऐतिहासिक रूप से, IRFC की ग्रोथ से भारतीय रेलवे के कैपेक्स साइकल की झलक मिलती थी, और वो इंजन अब थमता दिख रहा है.

कंपनी अभी भी लोन पर ब्याज जोड़कर अपने AUM को स्थिर रखे हुए है. इसका मतलब है कि इन लोन्स (जो इसके AUM का 46 फ़ीसदी है) पर अभी तक कोई भुगतान नहीं हुआ है और IRFC को वास्तविक ब्याज भुगतान पांच साल बाद (फ़ाइनेंशियल ईयर 28 के बाद) मिलना शुरू होगा.

इन ब्याज को लोन बुक में एडवांस से बुक करने से स्थिरता का एक अस्थायी भ्रम पैदा होता है. हालांकि, फ़ाइनेंशियल ईयर 28 के बाद रिपेमेंट शुरू होने के बाद, IRFC का AUM घटना शुरू हो जाएगा, जिससे रेवेन्यू और नेट प्रॉफ़िट दोनों में गिरावट आएगी.

तो, ये क्या कर रही है?

भविष्य में इस ठहराव से निपटने के लिए, IRFC गैर-रेलवे परियोजनाओं में विविधता ला रही है. इसने जिन नए क्षेत्रों में प्रवेश किया है, उनमें शामिल हैं:

  • ग्रीन एनर्जी फ़ाइनेंसिंग (इसने NTPC ग्रीन एनर्जी को लोन दिया है).
  • कोयला के लॉजिस्टिक और रेलवे से जुड़ी माइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (NTPC को लोन दिया गया).

मैनेजमेंट को भरोसा है कि इस बदलाव से ख़ासा फ़ायदा होगा. ये ऊंचे इंटरेस्ट स्प्रेड की उम्मीद करती है - IRFC वर्तमान में रेलवे के पारंपरिक लोन्स पर 40-45 आधार अंकों से तीन से पांच गुना कमाती है. अनुमानित रूप से, इसका मतलब ये होगा कि ₹10,000 करोड़ के नए लोन (गैर-रेलवे) वही फ़ायदा दे सकते हैं जो रेलवे के मौजूदा लोन्स से ₹30,000-40,000 करोड़ मिलते हैं. इसका मतलब है कि कम AUM के बावजूद प्रॉफ़िटेबिलिटी में कोई बदलाव नहीं होगा.

हालांकि, ये उतना अच्छा नहीं होगा क्योंकि डाइवर्सिफ़िकेशन की रणनीति पर अमल करना आसान नहीं है.

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IRFC की डाइवर्सिफ़िकेशन की रणनीति के लिए जोखिम

1) लंबी निष्पादन समयसीमा. वर्तमान में, कुल AUM में गैर-रेलवे AUM की हिस्सेदारी 1 फ़ीसदी से भी कम है. रेलवे AUM में गिरावट की आशंकाओं के साथ, इसे सार्थक रूप से बढ़ाना ख़ासा मुश्किल हो सकता है.

2) भारी प्रतिस्पर्धा. एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर को उधार देने के लक्ष्य में, IRFC ख़ासी भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में कदम रखता है. REC और PFC पहले से ही स्थापित खिलाड़ी हैं, जो 6.25 से 8.5 फ़ीसदी की समान उधारी दरों की पेशकश करते हैं. प्रतिस्पर्धा करने के लिए, IRFC को अपने नए बहीखाते की प्रॉफ़िटेबिलिटी को कम करने के लिए स्प्रेड को कम करने के लिए मज़बूर होना पड़ सकता है.

3) रेग्युलेट्री बाधाएं. भले ही कंपनी इसके आसपास एक रास्ता खोज रही है, लेकिन ये अभी भी अपने मूल कार्यक्षेत्र से बंधी हुई है: ये केवल रेलवे से जुड़े बुनियादी ढांचे को ही वित्तपोषित कर सकती है. इससे उसके लिए PFC और REC जैसी कंपनियों की तुलना में इसका डायवर्सिफ़िकेशन का दायरा काफी सीमित हो जाता है. वहीं, PFC और REC को लेंडिंग की ख़ासी आजादी है.

4) टैक्स और प्रोविजंस. अब तक, IRFC को टैक्स-फ़्री स्टेटस हासिल था. हालांकि, जैसे-जैसे ये सॉवरेन-बैक्ड रेलवे लेंडिंग से आगे बढ़ेगी, ये एक सामान्य NBFC जैसी दिखने लगेगी और संभवतः उसी की तरह टैक्स लगाया जाएगा.

इसके अलावा, रेलवे से जुड़े क्षेत्रों में भी सार्वजनिक उपक्रमों और निजी खिलाड़ियों को क़र्ज़ देने से क्रेडिट रिस्क पैदा होता है. इसका मतलब है कि IRFC को अंततः संभावित डिफ़ॉल्ट्स के लिए प्रोविजन करने की ज़रूरत हो सकती है, जिससे इसकी प्रॉफ़िटेबिलिटी प्रभावित हो सकती है. ये कुछ ऐसा है जिससे उसे अपने पहले के रिस्क-फ़्री मॉडल के तहत कभी जूझना नहीं पड़ा था.

बिना किसी सुरक्षा घेरे (moat) के प्रीमियम वैल्यूएशन

विपरीत परिस्थितियों और इसकी हालिया गिरावट के बावजूद, IRFC का शेयर 3 गुने के P/B रेशियो पर ट्रेड कर रहा है, जबकि REC और PFC दोनों 1.5 गुना से नीचे कारोबार कर रहे हैं. ये प्रीमियम एक समय इसके लगभग ज़ीरो रिस्क प्रोफ़ाइल, टैक्स-फ़्री स्टेटस और सॉवरेन-बैक्ड लेंडिंग मॉडल को दर्शाता था. लेकिन रेलवे को कोई नया डिस्बर्शमेंट नहीं होने, मोरेटोरियम लोन्स पर बढ़ती निर्भरता और प्रतिस्पर्धी, ऊंचे जोखिम वाले क्षेत्रों में बदलाव के साथ, IRFC उस अनूठी बढ़त को गंवा रही है.

इसकी डाइवर्सिफ़िकेशन की कोशिशें अभी भी शुरुआती दौर में हैं, लेकिन उधार लेने की कॉस्ट अपनी जैसी दूसरी कंपनियों के बराबर ही है और रेग्युलेट्री बाधाएं लचीलेपन को सीमित करती हैं. लोन बुक और प्रॉफ़िटेबिलिटी में अपरिहार्य मंदी को जोड़ दें तो मौजूदा स्तरों पर रिस्क-रिवार्ड सही नहीं लगता है. जब तक IRFC अपनी नई लोन बुक को एसेट क्वालिटी बनाए रखते हुए प्रॉफ़िट नहीं बढ़ा सकती, तब तक इसका प्रीमियम वैल्यूएशन बरकरार नहीं रह सकता.

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