Anand Kumar/AI-Generated Image
सारांशः शिपरॉकेट का कोर शिपिंग बिज़नेस मुनाफ़े में है. लगातार बेहतर होता जा रहा है और कैश भी जनरेट कर रहा है, लेकिन इसके नए बिज़नेस अभी भी इसी मुनाफ़े को खा रहे हैं. IPO की क़ीमत पर, निवेशकों से उस ग्रोथ के लिए पैसे मांगे जा रहे हैं जिसे ये नए दांव अभी साबित नहीं कर पाए हैं.
आज ज़्यादातर लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं. कपड़े, जूते, कॉस्मेटिक्स भी इसी में आते हैं. जैसे ही ऑर्डर पैक होकर भेजने के लिए तैयार होता है, आपके फ़ोन पर आमतौर पर किसी लॉजिस्टिक्स पार्टनर की तरफ़ से एक नोटिफ़िकेशन आता है: "आपका ऑर्डर डिलीवरी के लिए निकल चुका है!"
शिपरॉकेट भी उन प्लेटफ़ॉर्म्स में से एक है जो पर्दे के पीछे यह पूरा अनुभव संभव बनाते हैं. कंपनी का IPO कल (12 अगस्त, 2026) खुल गया है, जिसका इशू साइज़ लगभग ₹1,617 करोड़ है. इससे मिलने वाली रक़म मुख्य रूप से कंपनी की ग्रोथ की योजनाओं को फ़ंड करने में इस्तेमाल होगी.
यहां हम शिपरॉकेट के फ़ाइनेंशियल्स और ट्रैक रिकॉर्ड पर क़रीब से नज़र डाल रहे हैं, ताकि आप यह तय कर सकें कि यह IPO सब्सक्राइब करने लायक़ है या नहीं.
कंपनी के बारे में
जब कोई इंडिपेंडेंट मर्चेंट अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया या ऐप के ज़रिए सामान बेचता है, तो डिलीवरी, वेयरहाउसिंग और पेमेंट कलेक्शन की व्यवस्था करना एक बड़ी दिक़्क़त बन जाती है. यहीं पर शिपरॉकेट काम आती है. यह मर्चेंट्स के वॉल्यूम को एक ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर लाकर इस समस्या को हल करती है. सेलर्स लॉग-इन करते हैं, 42 एक्टिव कूरियर पार्टनर्स के रेट्स की तुलना करते हैं, शिपिंग लेबल प्रिंट करते हैं, पार्सल ट्रैक करते हैं और एक ही डैशबोर्ड से कैश-ऑन-डिलीवरी कलेक्शन भी संभालते हैं.
कंपनी की कमाई मुख्य रूप से एक कंज़म्प्शन-बेस्ड मॉडल से होती है, जहां मर्चेंट्स हर शिपमेंट या इस्तेमाल की गई सर्विस के लिए फ़ीस चुकाते हैं. रेवेन्यू को दो हिस्सों में बांटा गया है. कोर बिज़नेस, जिसमें डोमेस्टिक शिपिंग और वैल्यू-एडेड शिपिंग ऐप्स शामिल हैं, ने FY26 में कुल ऑपरेटिंग रेवेन्यू का 73 प्रतिशत हिस्सा दिया. बाक़ी हिस्सा एमर्जिंग बिज़नेस से आया, जिसमें ShiprocketX के ज़रिए क्रॉस-बॉर्डर लॉजिस्टिक्स, Shiprocket Quick के ज़रिए क्विक कॉमर्स, मार्केटिंग टूल्स और कैपिटल सॉल्यूशंस शामिल हैं. इस नए सेगमेंट में कार्गो और क्रॉस-बॉर्डर सॉल्यूशंस का सबसे बड़ा योगदान है.
क्या अच्छा है
#1 मर्चेंट जोड़ना अब सस्ता पड़ रहा है
शिपरॉकेट को हर महीने 23 लाख से ज़्यादा यूनीक विज़िटर्स मिलते हैं, जिनमें से क़रीब 43 प्रतिशत बिना किसी परफॉर्मेंस मार्केटिंग के, ऑर्गेनिक तरीक़े से आते हैं. इनमें से लगभग 97 प्रतिशत मर्चेंट्स बिना किसी सपोर्ट स्टाफ़ की मदद के, ख़ुद ही डिजिटली ऑनबोर्ड हो जाते हैं. इस सेल्फ़-सर्व मॉडल की वजह से कस्टमर एक्विज़िशन कॉस्ट लगातार घटी है, FY24 में ₹4,101 से ज़्यादा से घटकर FY26 में ₹2,829 रुपये रह गई. जितनी ज़्यादा सेल्स और ऑनबोर्डिंग सॉफ्टवेयर के ज़रिए होगी, हर मर्चेंट को जोड़ने पर शिपरॉकेट को उतना ही कम ख़र्च करना पड़ेगा.
#2 कोर बिज़नेस में ऑपरेटिंग लीवरेज है
दो साल में कोर रेवेन्यू 36.9 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कोर स्टाफ़ कॉस्ट सिर्फ़ 8.3 प्रतिशत और बाक़ी ख़र्च केवल 5.9 प्रतिशत बढ़े. एक और पार्सल भेजने के लिए मुख्य रूप से ज़्यादा कूरियर क्षमता चाहिए होती है, जिसे शिपरॉकेट ख़रीदकर आगे पास कर देता है, न कि ज़्यादा इंजीनियर, ऑफ़िस या सपोर्ट स्टाफ़ की ज़रूरत होती है. सॉफ्टवेयर पहले से ही तैयार है, इसलिए ज़्यादा वॉल्यूम आने पर एक्स्ट्रा ओवरहेड बहुत कम बढ़ता है. नतीजतन, FY24 के बाद से कोर एडजस्टेड EBITDA ढाई गुना बढ़ चुका है.
#3 कैश फ़्लो आख़िरकार पॉज़िटिव हुआ
नेट लॉस दिखाने के बावजूद, शिपरॉकेट का कैश जनरेशन तेज़ी से बेहतर हुआ है. ऑपरेटिंग कैश फ़्लो FY24 में ₹216 करोड़ के आउटफ़्लो से बढ़कर FY26 में ₹52.6 करोड़ पॉज़िटिव हो गया है. कंपनी अब ऑपरेटिंग कैश जनरेट कर रही है, जिससे उसे अपनी अगली ग्रोथ के लिए एक मज़बूत आधार मिल रहा है.
क्या बुरा है
#1 नए दांव मुनाफ़े वाले कोर बिज़नेस को खा रहे हैं
शिपरॉकेट का घरेलू शिपिंग बिज़नेस FY26 में 13 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा और इसने ₹187 करोड़ का एडजस्टेड EBITDA जनरेट किया. लेकिन मैनेजमेंट क्रॉस-बॉर्डर, हाइपरलोकल और दूसरे नए बिज़नेस में पैसा लगा रहा है, जो पहले से ही इस मुनाफ़े को खा रहे हैं. इमर्जिंग सेगमेंट को FY26 में एडजस्टेड EBITDA पर ₹169 करोड़ का घाटा हुआ और यह घाटा FY24 से लगातार बढ़ता जा रहा है. ज़्यादा फ़िक्स्ड कॉस्ट इसे और बिगाड़ती है, अकेले एम्प्लॉई कॉस्ट ही सेगमेंट रेवेन्यू के 32 प्रतिशत से ज़्यादा है.
#2 बीच का सहारा ही असुरक्षित है
शिपरॉकेट पूरी तरह थर्ड-पार्टी डिलीवरी फ़्लीट्स पर निर्भर है. यह 42 एक्टिव कूरियर्स के साथ काम करता है, लेकिन FY26 में सिर्फ़ पांच कूरियर्स ने 84.5 प्रतिशत शिपमेंट वॉल्यूम संभाला. किसी एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट के बिना, ये पार्टनर्स कभी भी टैरिफ़ बढ़ा सकते हैं या सरचार्ज लगा सकते हैं, जिससे शिपरॉकेट की सौदेबाज़ी की ताक़त बहुत सीमित रह जाती है. एक और बड़ा ख़तरा भी है: कूरियर्स के पास ख़ुद की फ़िज़िकल डिलीवरी नेटवर्क है और वे चाहें तो अपना ख़ुद का मर्चेंट-फ़ेसिंग प्लेटफ़ॉर्म बना सकते हैं. अगर वे शिपरॉकेट को दरकिनार कर देते हैं, तो बीच के सहारे के रूप में इसकी अहमियत काफ़ी कम हो जाएगी.
#3 इसके सबसे वैल्युएबल मर्चेंट्स की ग्रोथ रुक चुकी है
पावर मर्चेंट्स (हर महीने 100 से ज़्यादा ट्रांज़ैक्शन करने वाले सेलर्स) की संख्या पिछले तीन साल में 9,020 से बढ़कर 10,005 और फिर सिर्फ़ 10,090 तक पहुंची. ग्रोथ घटकर एक प्रतिशत से भी कम रह गई. फिर भी यह छोटा-सा समूह, जो कुल मर्चेंट्स का महज़ 4.7 प्रतिशत है, FY26 के रेवेन्यू में लगभग 89 प्रतिशत योगदान देता है, यानी प्रति मर्चेंट ₹17.8 लाख. दूसरे शब्दों में कहें तो, लगभग 90 प्रतिशत रेवेन्यू उस समूह पर निर्भर है जिसमें पिछले साल सिर्फ़ 85 नए मर्चेंट्स जुड़े.
शिपरॉकेट IPO की डिटेल्स
| विवरण | आंकड़ा |
|---|---|
| कुल IPO साइज़ (₹ करोड़) | 1,617 |
| ऑफ़र फ़ॉर सेल (₹ करोड़) | 732 |
| फ़्रेश इशू (₹ करोड़) | 885 |
| प्राइस बैंड (₹) | 92-97 |
| सब्सक्रिप्शन डेट्स | 12 - 14 अगस्त, 2026 |
| इशू का मक़सद | प्लेटफ़ॉर्म ग्रोथ (₹366 करोड़); मार्केटिंग (₹206 करोड़); टेक्नोलॉजी (₹160 करोड़); क़र्ज़ चुकाना (₹210 करोड़); एक्विज़िशन और सामान्य कॉर्पोरेट ज़रूरतें (₹941 करोड़) |
पोस्ट-IPO
| विवरण | आंकड़ा |
|---|---|
| एम-कैप (₹ करोड़) | 7,057 |
| नेट वर्थ (₹ करोड़) | 2,410 |
| प्रमोटर होल्डिंग (%) | - |
| प्राइस/अर्निंग रेशियो (P/E) | - |
| प्राइस/बुक रेशियो (P/B) | 2.9 |
फ़ाइनेंशियल हिस्ट्री
| मुख्य फ़ाइनेंशियल्स | FY26 | FY25 | FY24 |
|---|---|---|---|
| रेवेन्यू (₹ करोड़) | 2,024 | 1,632 | 1,316 |
| एडजस्टेड EBITDA | 18 | 7 | -128 |
| EBIT (₹ करोड़) | -103 | -95 | -369 |
| PAT (₹ करोड़) | -76 | -74 | -348 |
| नेट वर्थ (₹ करोड़) | 1,524 | 1,491 | 1,286 |
| कुल क़र्ज़ (₹ करोड़) | 345 | 335 | 316 |
| EBIT का मतलब है ब्याज़ और टैक्स से पहले की कमाई, इसमें दूसरी इनकम और एक्सेप्शनल आइटम शामिल नहीं हैं PAT का मतलब है टैक्स के बाद का मुनाफ़ा, इसमें एक्सेप्शनल आइटम शामिल नहीं हैं एडजस्टेड EBITDA में एक्सेप्शनल आइटम, अदर इनकम, शेयर-बेस्ड पेमेंट ख़र्च और लीज़ एडजस्टमेंट शामिल नहीं हैं |
|||
मुख्य रेशियो
| FY26 | FY25 | FY24 | |
|---|---|---|---|
| ROE (%) | -5 | -5.4 | -27.1 |
| ROCE (%) | -5.6 | -5.6 | -23.1 |
| EBIT मार्जिन (%) | -5.1 | -5.8 | -28.1 |
| डेट-टु-इक्विटी (गुना) | 0.2 | 0.2 | 0.2 |
| ROE का मतलब है रिटर्न ऑन इक्विटी, ROCE का मतलब है रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड | |||
ऑपरेटिंग मेट्रिक्स
| विवरण | FY26 | FY25 | FY24 |
|---|---|---|---|
| यूनीक ट्रांज़ैक्शन (मिलियन) | 202.1 | 164.4 | 132.3 |
| पावर मर्चेंट ARPU (₹ लाख) | 17.8 | 14.4 | 12.8 |
| एमर्जिंग बिज़नेस से जुड़े नए मर्चेंट्स | 23,683 | 8,204 | 3,758 |
| कस्टमर एक्विज़िशन कॉस्ट, कोर (₹) | 2,829 | 3,361 | 4,101 |
| कस्टमर एक्विज़िशन कॉस्ट, कुल (₹) | 5,830 | 5,742 | 6,384 |
| ARPU का मतलब है एवरेज रेवेन्यू पर यूज़र | |||
आंकड़े क्या बताते हैं
शिपरॉकेट के प्रॉस्पेक्टस पर नज़र डालें तो नतीजा साफ़ लगता है. कंपनी पिछले तीन सालों से लगातार घाटे में है और FY26 में ₹2,024 करोड़ के रेवेन्यू पर उसे ₹103 करोड़ का ऑपरेटिंग घाटा हुआ है. ऊपर से देखने पर यह ऐसा बिज़नेस लगता है जिसने अभी तक अपनी इकोनॉमिक्स नहीं समझी है.
लेकिन अंदर झांककर देखें तो तस्वीर बदल जाती है. शिपरॉकेट का कोर शिपिंग बिज़नेस पहले से ही मुनाफ़े में है, बढ़ने के साथ-साथ ज़्यादा एफ़िशिएंट होता जा रहा है, और अब कैश भी जनरेट कर रहा है. दिक़्क़त यह है कि इसी मुनाफ़े का इस्तेमाल उन बिज़नेस को फ़ंड करने में हो रहा है जिन्होंने अभी तक अपनी इकोनॉमिक्स साबित नहीं की है. तो असली सवाल यह नहीं है कि शिपरॉकेट पैसा कमा सकती है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या एक चलते हुए बिज़नेस का मुनाफ़ा उन बिज़नेस को खड़ा करने की लागत को जायज़ ठहरा सकता है, जो अभी काम नहीं कर रहे.
क़ीमत असल में आपसे क्या मानने को कह रही है
प्राइस-टू-अर्निंग का यहां कोई ख़ास मतलब नहीं है क्योंकि शिपरॉकेट अभी भी घाटे में है. प्राइस-टू-रेवेन्यू ज़्यादा सटीक पैमाना है. पोस्ट-IPO मार्केट कैप पर, शिपरॉकेट का शेयर FY26 के रेवेन्यू के लगभग 3.5 गुने पर ट्रेड करेगा. यूनीकॉमर्स, जो प्रॉस्पेक्टस में बताया गया इकलौता लिस्टेड इंडियन पीयर है, 4.6 गुने पर ट्रेड करता है. यूनीकॉमर्स आकार में बहुत छोटी है लेकिन पहले से मुनाफ़े में है, जबकि शिपरॉकेट तेज़ी से बढ़ रही है और उसका स्केल भी बड़ा है. इसलिए पहली नज़र में कम मल्टीपल ठीक लगता है, लेकिन जैसे ही आप इस रेवेन्यू की क्वालिटी पर ग़ौर करते हैं, यह तुलना बदल जाती है.
यूनीकॉमर्स मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर बेचती है और जो भी बिल करता है, उसका ज़्यादातर हिस्सा अपने पास रखती है. शिपरॉकेट मर्चेंट्स से पूरे शिपमेंट का बिल वसूलता है और फिर कूरियर को पेमेंट करता है. कूरियर पेमेंट के बाद, बिल किए गए हर रुपये में से सिर्फ़ लगभग 26 पैसे ही शिपरॉकेट के पास बचते हैं, वह भी अपने बाक़ी ख़र्च से पहले. इस बचे हुए रेवेन्यू पर, इसकी वैल्यूएशन क़रीब 14 गुने पर बैठती है, जबकि यूनीकॉमर्स की 4.7 गुने पर. यह कोई पूरी तरह बराबर तुलना का पैमाना नहीं है, लेकिन इससे यह ज़रूर पता चलता है कि हेडलाइन रेवेन्यू मल्टीपल शिपरॉकेट को असल से ज़्यादा सस्ता क्यों दिखा सकता है.
इस IPO से शिपरॉकेट को क़र्ज़ चुकाने के बाद लगभग ₹675 करोड़ की फ़्रेश पूंजी मिलेगी. सवाल यह है कि यह पैसा वैल्यू बनाएगा या सिर्फ़ और घाटे को फ़ंड करेगा. कोर बिज़नेस अपनी इकोनॉमिक्स साबित कर चुका है. इस क़ीमत पर, बाक़ी हिस्से को अभी अपनी क़ीमत साबित करनी बाक़ी है.
यह भी पढ़ेंः OYO मुनाफ़े में लौट आई, क्या IPO की वैल्यूएशन भी जायज़ है?






