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कभी-कभी मार्केट अपने ही नियम भूल जाता है. जिन स्टॉक्स की कमाई नहीं बढ़ रही है, पूंजी पर रिटर्न कमज़ोर है और ग्रोथ की कोई राह नज़र नहीं आती, उन्हें भी ऐसी वैल्यूएशन मिल जाती है जो तेज़ी से बढ़ने वाली कंपनियों के लिए होनी चाहिए. ये सिर्फ़ एक ग़लती नहीं, बल्कि एक बड़े खतरे का संकेत है. हमारे मार्केट में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं.
हमने कुछ ऐसे स्टॉक्स खोजने की कोशिश की, जिनमें निम्नलिखित विशेषताएं या कमियां हों:
- P/E रेशियो 70 से ज़्यादा हो
- पिछले पांच साल (फ़ाइनेंशियल ईयर 19-24) के दौरान टैक्स के बाद मुनाफ़े (PAT) में हर साल 10 प्रतिशत से कम ग्रोथ
- पिछले पांच साल में औसत ROE और ROCE 10 प्रतिशत से कम
नतीजा क्या रहा? हमें पांच ऐसे स्टॉक्स मिले जो आपके लिए संभावित ट्रैप हो सकते हैं. ये ऐसे स्टॉक्स हैं जिनकी वैल्यूएशन तो बहुत ऊंची है, लेकिन प्रदर्शन उसका साथ नहीं देता. देखें टेबल…
| कंपनी | P/E (गुना) | 5 साल का औसत ROE (%) | 5 साल में टैक्स के बाद के मुनाफ़े में ग्रोथ(% सालाना) | स्टॉक रेटिंग |
|---|---|---|---|---|
| कोकुयो कैमलिन | 92 | 4 | -21.6 | 1 |
| मैंगलोर रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स | 465.2 | 10 | -63.5 | 2 |
| राजेश एक्सपोर्ट्स | 96.6 | 8 | -51.8 | 2 |
| रिलायंस इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर | 116.9 | 3 | -11.4 | 3 |
| यूनिफोस एंटरप्राइजेज | 927.2 | 1 | -50 | 3 |
दो जाने-पहचाने नाम जो सबसे ज़्यादा ध्यान खींचते हैं: कोकुयो कैमलिन, जो स्कूल स्टेशनरी का एक पुराना पसंदीदा नाम है और रिलायंस इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर, जो भारत के सबसे बड़े समूह का एक छोटा-सा भाग है. आगे इनका एनालिसिस बताता है कि आपको ब्रांड के आकर्षण को नज़रअंदाज़ कर बैलेंस शीट पर ध्यान देना चाहिए.
कोकुयो कैमलिनः आइकॉनिक ब्रांड, लेकिन महंगा है शेयर
किस वजह से कम हो रहा है मुनाफ़ा
कैमलिन स्कूल स्टेशनरी का एक आइकॉनिक ब्रांड है. ये भारतीय छात्रों की कई पीढ़ियों की यादों में शामिल है. लेकिन इस भावनात्मक आकर्षण के पीछे इसके फंडामेंटल छिप गए हैं. फ़ाइनेंशियल ईयर 19 से 22 तक, कंपनी की कमाई में कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं हुई और कई बार तो ये घटी भी है. इसके दो मुख्य कारण हैं. पहला, कोविड महामारी ने स्कूल और ऑफिस सप्लाई की मांग को बुरी तरह प्रभावित किया. दूसरा, सामान्य वर्षों के दौरान भी, कैमलिन के पेंसिल, स्याही और स्केच पेन जैसे कम-मार्जिन वाले सामान्य उत्पाद कच्चे माल की अस्थिर कीमतों और प्राइसिंग की कोई ताकत न होने की वजह से जूझते रहे.
मार्जिन का ट्रैप
प्राइस के लिहाज़ से संवेदनशील मार्केट में कैमलिन कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकती. जब प्लास्टिक, स्याही या कागज की कॉस्ट बढ़ती है, तो कंपनी को ये नुक़सान खुद उठाना पड़ता है. और, जब कॉस्ट कम होती है, तो प्रतिस्पर्धी कंपनियां क़ीमतें और कम कर देती हैं. नतीजतन, इसका नेट प्रॉफ़िट मार्जिन बहुत कम (0.2-3 प्रतिशत के बीच) रहता है. टॉपलाइन में कोई भी ग्रोथ बॉटमलाइन तक पहुंचते-पहुंचे खत्म हो जाती है.
पूंजी की कम दक्षता
पिछले पांच साल में कैमलिन का ROE और ROCE सिंगल डिजिट में रहा, कई बार तो 5 प्रतिशत से भी नीचे आ गया. मज़बूत ब्रांड पहचान के बावजूद, कंपनी की एसेट-हैवी मैन्युफैक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का ढांचा बहुत कम रिटर्न देता है. ये मॉडल पूंजी के बड़े स्तर पर इस्तेमाल वाला है, लेकिन ये कॉस्ट में उतार-चढ़ाव और क़ीमतें बढ़ाने की कोई गुंजाइश न होने की वजह से दक्षता नहीं दे पाता.
वैल्यूएशन की पहेली
ये कमज़ोर बिज़नस 80 गुने से ज़्यादा के P/E पर क्यों ट्रेड कर रहा है? इसके कारणों में ब्रांड की पुरानी यादें, कम फ्लोट और फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में कमाई में तेज़ गिरावट शामिल है, जिसने P/E को मैकेनिकली बढ़ा दिया. लेकिन आंकड़ों में निवेशकों की उम्मीदों को सही ठहराने वाला कुछ नहीं है. जब तक कैमलिन अपने मार्जिन और ROE में अच्छा सुधार नहीं करती, ये स्टॉक ख़तरनाक रूप से महंगा दिखता है.
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रिलायंस इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर (RIIL): बड़ा नाम, लेकिन आंकड़ों में कमज़ोर
किस वजह से कम हो रहा है मुनाफ़ा
कोई ग्रोथ नहीं. कोई पैमाना नहीं. कोई कहानी नहीं. RIIL का अस्तित्व अपनी मूल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की सर्विस के लिए है, जो मुख्य रूप से लीजिंग, कंस्ट्रक्शन और पाइपलाइन सेवाओं से जुड़ी है. फ़ाइनेंशियल ईयर 19-24 में, रेवेन्यू हर साल 9 प्रतिशत की दर से कम हुआ और फ़ायदा ₹8-17 करोड़ की रेंज में स्थिर रहा. इसका कारण इसका सीमित, एकल-ग्राहक वाला बिज़नस है. कंपनी में ग्राहक डाइवर्सिफ़िकेशन, विस्तार की रणनीति या ग्रोथ बिल्कुल भी नज़र नहीं आती.
कमज़ोर ऑपरेशन
RIIL को मुख्य बिज़नस से नहीं, बल्कि ज़्यादातर कमाई इंटरेस्ट और इन्वेस्टमेंट इनकम से आती है. कोई क़र्ज़ न होने और कैश के बेकार पड़े होने से रिटर्न बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती. इसकी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी एसेट्स पुरानी और कम इस्तेमाल में हैं, फिर भी कंपनी की इनमें रीइन्वेस्टमेंट या नए इस्तेमाल की कोई योजना नहीं दिखती.
बेहद कम है रिटर्न
बड़े पूंजी आधार और मामूली मुनाफ़े के साथ, कंपनी का ROE और ROCE केवल 2-3 प्रतिशत के आसपास है, यानी RIIL अपनी पूंजी की कॉस्ट को भी पूरा नहीं कर पाती. पूंजी सुरक्षित है, लेकिन बढ़ नहीं रही है. परिचालन के लिहाज़ से कारोबार स्थिर है, जिसमें न तो रणनीतिक दिशा है और न ही वित्तीय गति.
तो फिर P/E तीन डिजिट में क्यों है?
ये स्टॉक 100 गुना से ज्यादा P/E पर ट्रेड करता है. इसकी वजह उसका मौजूदा प्रदर्शन नहीं, बल्कि इसलिए कि निवेशक इसे भविष्य में कुछ बनने की उम्मीद करते हैं. वे इसके एसेट बेस और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के साथ जुड़ाव को तरजीह दे रहे हैं. इसके अलावा, संभावित मर्जर, एसेट के मोनेटाइजेशन या कॉरपोरेट रिस्ट्रक्चरिंग की अटकलों ने क़ीमत को बढ़ाया है. लेकिन जब तक इन पर अमल नहीं होता, ये वैल्यूएशन केवल कमज़ोर उम्मीदों पर टिका है.
याद रखें
कोकुयो कैमलिन और RIIL दोनों दिखाती हैं कि बाज़ार की कहानियां बुनियादी आंकड़ों को कैसे पीछे छोड़ सकती हैं. लेकिन ऐसी उम्मीदें ज़्यादा समय तक नहीं टिकतीं. ऊंचे वैल्यूएशन को कमाई में ग्रोथ और मज़बूत रिटर्न रेशियो के रूप में ईंधन चाहिए. जब ये दोनों नहीं होते, तो आपके पास निवेशकों की उम्मीदों का एक टिक-टिक करता टाइम बम बचता है.
वैल्थ बनाने के लिए, चर्चित नामों या भविष्य के वादों से प्रभावित न हों. ऐसी कंपनियों की तलाश करें जो पूंजी को लगातार फ़ायदे में बदलें. ये खोज वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र के साथ खत्म हो सकती है. हमारी सर्विस सावधानीपूर्वक चुनी गईं स्टॉक रेकमंडेशन देती है, साथ ही हर महीने अपडेट होने वाले निवेश के लिहाज़ से तैयार पोर्टफ़ोलियो भी उपलब्ध कराती है, ताकि आप सोचे-समझे और आत्मविश्वास से भरे निवेश के फ़ैसले ले सकें. इस पर अभी ग़ौर करें!
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