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2019 की टेलीकॉम क्राइसिस के बाद से भारती एयरटेल की किस्मत ख़ासी बदल गई है. उस दौर में इंडस्ट्री का कंसोलिडेशन हुआ और कंपनी ने ब्रॉडबैंड, OTT एग्रीगेशन, DTH जैसी डिजिटल सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में विस्तार किया. इससे कंपनी को लेकर सेंटीमेंट को ख़ासी मज़बूती मिली.
ग्राहकों की संख्या बढ़ने और भारत का एवरेज रेवेन्यू पर यूजर (ARPU) वैश्विक स्तर से काफ़ी नीचे रहने के कारण, एयरटेल को एक हाई-ग्रोथ अवसर के रूप में देखा गया. इसके शेयर की वैल्यू आसमान छूने लगी और वैल्यूएशन भी उसी तरह बढ़ा. उस समय, स्टॉक का EV/EBITDA मल्टीपल (चूंकि मुनाफ़ा स्थिर नहीं होने के कारण P/E भरोसेमंद नहीं था) कई सालों के उच्चतम स्तर 12 गुना से ज़्यादा हो गया.
छह साल बाद, भले ही बिज़नस अब कैश जेनरेट करने वाली एक दमदार मशीन बन चुका है, लेकिन कहानी वही पुरानी है. स्टॉक अब 40 गुने P/E और लगभग 13 गुना EV/EBITDA पर ट्रेड कर रहा है. ये मल्टीपल्स अपने आप में बहुत ज़्यादा नहीं लग सकते, लेकिन इस आधार पर एयरटेल वैश्विक स्तर पर सबसे महंगा टेलीकॉम स्टॉक है.
सवाल अब ये नहीं है कि क्या एयरटेल एक अच्छी कंपनी है, जो स्पष्ट रूप से है. असली सवाल ये है: क्या ये अभी भी उस उत्साहजनक ग्रोथ स्टोरी की हकदार है? या हम उस ग्रोथ के लिए प्रीमियम चुका रहे हैं जो पहले ही हो चुकी है?
नहीं बची ARPU बढ़ाने की गुंजाइश
स्पष्ट रूप से, यूजर जोड़ने से होने वाली ग्रोथ अब लगभग खत्म हो चुकी है. खुद एयरटेल का मैनेजमेंट भी मान चुका है कि मोबाइल सब्सक्राइबर की ग्रोथ स्थिर हो गई है. रेवेन्यू में ग्रोथ का एकमात्र रास्ता अब ARPU बढ़ाना है.
हालांकि, ARPU बढ़ाना उतना आसान नहीं है जितना इसे बताया जाता है. कुछ लोग ये कहते हुए इसकी तुलना पेट्रोल की क़ीमतों से करते हैं कि छोटी-मोटी बढ़ोतरी को यूजर्स बिना ज़्यादा विरोध के स्वीकार कर लेंगे. लेकिन ये तुलना टेलीकॉम के बुनियादी नेचर को नज़रअंदाज़ करती है. असल में ये इस सर्विस पर रेगुलेटर की सख्ती बनी रहती है. बेहद ज़्यादा बढ़ोतरी न केवल उपभोक्ताओं के विरोध को जन्म देती है, बल्कि रेगुलेटर की जांच का डर बना रहता है. पेट्रोल के विपरीत, टेलीकॉम की क़ीमतों को मनमाने ढंग से नहीं बढ़ाया जा सकता.
ग्रोथ स्टोरी के पक्ष में एक आम तर्क ये है कि भारत का ARPU अभी भी विकसित बाज़ारों की तुलना में बहुत कम है. ये बात पूरी तरह सच है, लेकिन इसमें व्यापक संदर्भ की अनदेखी कर दी गई है. ARPU को प्रति व्यक्ति आय की तुलना में देखना चाहिए. इस आधार पर, भारत का आय के हिसाब से समायोजित ARPU विकसित देशों से बहुत अलग नहीं है. जब इसे किफायती होने के नज़रिए से देखा जाता है, तो “ARPU बढ़ाने की गुंजाइश” वाला तर्क उतना मज़बूत नहीं रह जाता.
क्या भारत का ARPU वाकई सबसे कम है?
इनकम के आधार पर ARPU की वैश्विक तुलना से एक अलग हकीकत सामने आती है
| देश | मंथली ARPU ($) | सालाना ARPU ($) | प्रति व्यक्ति आय ($) | PCI के % के तौर पर ARPU |
|---|---|---|---|---|
| भारत | 1.8 | 22 | 2,481 | 0.87 |
| इंडोनेशिया | 3.0 | 36 | 4,876 | 0.74 |
| थाईलैंड | 6.3 | 76 | 7,182 | 1.05 |
| चीन | 7.1 | 85 | 12,614 | 0.68 |
| मलेशिया | 10.7 | 128 | 11,379 | 1.13 |
| दक्षिण कोरिया | 20.3 | 244 | 33,121 | 0.74 |
| सिंगापुर | 30.1 | 361 | 84,734 | 0.43 |
| अमेरिका | 34.8 | 418 | 82,769 | 0.50 |
| कनाडा | 43.7 | 524 | 53,431 | 0.98 |
| स्रोत: भारती एयरटेल का इन्वेस्टर प्रिजेंटेशन, वर्ल्ड बैंक | ||||
क्या 5G से शुरू होगा ग्रोथ का नया दौर?
अगर क़ीमतों में बढ़ोतरी सीमित है, तो क्या 5G से ARPU ग्रोथ की नई लहर को दिशा मिल सकती है? वैश्विक प्रमाण इसके विपरीत संकेत देते हैं. दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे मैच्योर 5G बाज़ारों में, ARPU की ग्रोथ 5G की पहुंच के साथ तालमेल नहीं रख पाई है. भले ही कवरेज और इस्तेमाल बढ़ गया हो, लेकिन कंज्यूमर्स की अतिरिक्त भुगतान करने की इच्छा नहीं बढ़ी. भारत में भी यही रुझान दिख रहा है. 5G का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन सार्थक प्रीमियम प्राइसिंग या नए मोनेटाइजेशन मॉडल के बिना, 5G से ARPU में अच्छी ग्रोथ की संभावना कम है.
अमेरिका में 5G– कहां से ARPU का मिला बूस्ट?
5G की बढ़ती पहुंच के बावजूद अमेरिका में ARPU स्थिर बना हुआ है
| वर्ष | ARPU ($) | 5G की पहुंच (%) |
|---|---|---|
| 2020 | 31.8 | 3 |
| 2021 | 30.5 | 13 |
| 2022 | 30.9 | 39 |
| 2023 | 30.6 | 53 |
| स्रोत: ग्लोबल डेटा, मोबाइल इकोनॉमी पर GSMA रिपोर्ट | ||
हां, स्पीड, देरी (latency) और नेटवर्क दक्षता में 5G बढ़त प्रदान करता है. लेकिन यूजर के नज़रिये से, ये अभी तक ज़्यादा बिल को जायज नहीं ठहराता, ख़ासकर जब 4G अभी भी ज़्यादातर ज़रूरतों को पूरा करता है.
डुओपॉली कोई अनोखी बात नहीं
एक और तर्क ये है कि वोडाफोन आइडिया के पतन ने एक तरह से डुओपॉली (दो कंपनियों के एकाधिकार) की स्थिति बना दी है, जिससे एयरटेल (और जियो) को प्राइसिंग की पावर मिली है. इसमें कुछ हद तक सच्चाई है, लेकिन ऐसा कॉन्सट्रेशन भारत के लिए अनोखा नहीं है. दुनिया भर में टेलीकॉम एक कॉन्सट्रेटेड इंडस्ट्री है. ज़्यादातर प्रमुख बाज़ारों में दो या तीन कंपनियां हावी हैं, फिर भी ये ज़रूरी नहीं कि इससे ऊंची प्रॉफ़िटेबिलिटी या प्राइसिंग की ताकत मिले.
इंडस्ट्री कॉन्संट्रेशन का ऊंचा स्तर केवल भारत तक सीमित नहीं है; दुनिया भर में यही स्थिति है
दुनिया के ज़्यादातर देशों में गिनी-चुनी कंपनियों का है दबदबा
| देश | प्रमुख कंपनियां | टॉप 2–3 कंपनियों का कुल मार्केट शेयर (%) |
|---|---|---|
| भारत | रिलायंस जियो, भारती एयरटेल | 74 |
| इंडोनेशिया | टेल्कोमसेल, इंडोसैट ओरेडू हचिसन, XL एक्सियाटा | 95 |
| थाईलैंड | ट्रू कॉर्प, AIS, DTAC | 98 |
| चीन | चाइना मोबाइल, चाइना टेलीकॉम, चाइना यूनिकॉम | 100 |
| दक्षिण कोरिया | SK टेलीकॉम, केटी कॉर्प, LG यूप्लस | 100 |
| सिंगापुर | सिंगटेल, स्टारहब, M1 | 95 |
| अमेरिका | AT&T, वेरिजॉन, टी-मोबाइल | 90 |
| कनाडा | रोजर्स, बेल, टेलस | 90 |
इसलिए, भले ही बाज़ार का स्ट्रक्चर फेवर में हो, फिर भी इससे इंडस्ट्री में सबसे ज़्यादा रिटर्न की गारंटी नहीं मिलती.
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कैपेक्स में कमी: सीमित बूस्टर
रेवेन्यू में ग्रोथ की कम संभावनाएं होने के साथ, एक और उम्मीद भरा तर्क ये है कि कैपेक्स (पूंजीगत व्यय) में कमी आएगी, जिससे फ़्री कैश फ़्लो और प्रॉफ़िटेबिलिटी बढ़ेगी. एयरटेल ने संकेत दिया है कि फ़ाइनेंशियल ईयर 2024 में 5G में भारी निवेश के कारण कैपेक्स अपने चरम (₹40,000 करोड़) पर था. आगे चलकर, मैनेजमेंट को उम्मीद है कि कैपेक्स रेवेन्यू का 15–17 प्रतिशत रहेगा. ये अभी भी ₹25,000–30,000 करोड़ सालाना है, जो कोई छोटी रक़म नहीं है.
टेलीकॉम एक ज़्यादा पूंजी की ज़रूरत वाला बिज़नस बना हुआ है. निवेश का स्वरूप विस्तार से अनुकूलन और उद्यम-केंद्रित समाधानों की ओर बदल सकता है, लेकिन पूंजी की ज़रूरत हमेशा ज़्यादा रहती है. फ़्री कैश फ़्लो में सुधार हो सकता है, लेकिन ये ग्रोथ धीरे-धीरे होगी, न कि तेज़ी से.
कुछ लोग एयरटेल ब्लैक और एक्सट्रीम जैसी एयरटेल की बंडल्ड ऑफरिंग्स को रणनीतिक बढ़त मानते हैं. ये मोबाइल, ब्रॉडबैंड, DTH और OTT को एक प्लान में जोड़ते हैं, जिसका लक्ष्य ग्राहकों की वफादारी और ARPU बढ़ाना है. लेकिन बंडलिंग की भी अपनी कॉस्ट है:
- प्रीमियम कंटेंट (नेटफ्लिक्स, डिज्नी+ आदि) की लाइसेंसिंग से ख़र्च बढ़ता है.
- मल्टी-सर्विस डिलीवरी के प्रबंधन से जटिलता और परिचालन लागत बढ़ती है.
- इसके लक्षित दर्शक मुख्य रूप से शहरी और उच्च-मध्यम वर्ग हैं. इसलिए, इसके बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की संभावना सीमित है.
बंडलिंग एक उपयोगी रिटेंशन टूल है, लेकिन ये एयरटेल की ग्रोथ की रफ्तार के बड़े पैमाने पर बदलने की संभावना नहीं है.
रॉकेट जैसा नहीं है बिज़नस
ये कहना गलत नहीं होगा कि एयरटेल एक कमज़ोर बिज़नस नहीं है. इसके विपरीत, एक ज़्यादा पूंजी, सख्त रेगुलेशन वाली इंडस्ट्री में, जहां ज़्यादातर कंपनियां टिके रहने के लिए संघर्ष करती हैं, एयरटेल न केवल बची हुई है, बल्कि फल-फूल रही है. ये अब एक टिकाऊ फ़्री कैश फ़्लो जेनरेट करने वाली और भारतीय टेलीकॉम बाज़ार में एक प्रमुख कंपनी बनी हुई है.
लेकिन समस्या वैल्यूएशन में है. एयरटेल का मार्केट कैप 130 बिलियन डॉलर को पार कर चुका है, जिससे ये कई दिग्गज वैश्विक टेलीकॉम कंपनियों में गिनी जाती है, जिनके पास रेवेन्यू और मुनाफ़े का बड़ा पूल है. आइए, तुलना करते हैं:
- वेरिजॉन, ड्यूश टेलीकॉम और NTT जैसे दुनिया की दिग्गज कंपनियों का ARPU ज़्यादा है और ऑपरेशन बड़ा है, लेकिन वे काफ़ी कम P/E मल्टीपल्स पर ट्रेड करते हैं.
- मल्टीपल्स को छोड़कर, एब्सॉल्यूट वैल्यूएशन साइज़ को देखिए. अमेरिका की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी और दुनिया की सबसे वैल्युएबल टेलीकॉम कंपनी टी-मोबाइल यूएस का मार्केट कैप एयरटेल के मार्केट कैप का सिर्फ़ दोगुना है. इससे पता चलता है कि एयरटेल जैसे कंपनी के लिए ऊपर की ओर कितनी गुंजाइश बची है.
एयरटेल सबसे महंगा बड़ा टेलीकॉम स्टॉक है
दुनिया की दिग्गज टेलीकॉम कंपनियों के बीच मार्केट कैपिटलाइजेशन और P/E रेशियो की तुलना
| कंपनी | देश | मार्केट कैप (बिलियन $) | P/E रेशियो |
|---|---|---|---|
| टी-मोबाइल यूएस | अमेरिका | 276 | 23.7 |
| चाइना मोबाइल | चीन | 248 | 13.5 |
| AT&T इंक | अमेरिका | 197 | 18.9 |
| ड्यूश टेलीकॉम | जर्मनी | 186 | 25.9 |
| वेरिज़ोन | अमेरिका | 181 | 12.7 |
| भारती एयरटेल | भारत | 134 | 40.4 |
| चाइना टेलीकॉम | चीन | 95 | 22.6 |
| NTT (निप्पॉन टेलीग्राफ एंड टेलीफोन) | जापान | 88 | 9.3 |
| ऑरेंज एसए | फ्रांस | 39 | 13.1 |
| एसके टेलीकॉम | दक्षिण कोरिया | 8 | 7.3 |
इससे ये अहम सवाल खड़ा होता है: क्या हम उस ग्रोथ के लिए भुगतान कर रहे हैं जो पहले ही हो चुकी है या उस ग्रोथ के लिए जो आगे आने वाली है? अभी तक के प्रमाणों से पहले ही आ चुकी ग्रोथ के लिए भुगतान करने के संकेत मिलते हैं. ग्रोथ की मौजूदा संभावनाएं उस उत्साह से भरपूर स्टोरी से मेल नहीं खातीं. अगर वैल्यूएशन में भविष्य की स्टोरी को शामिल करते रहेंगे, तो आगे मिलने वाले रिटर्न निराश कर सकते हैं.
भारती एयरटेल अब वो नए बदलाव लाने वाली, अंडरडॉग चैलेंजर नहीं रही, जो कभी हुआ करती थी. ये एक लचीली, कैश जेनरेट करने वाली कंपनी के तौर पर मैच्योर हो चुकी है, जैसा कि अन्य बाजारों में मौजूद कंपनियां हैं. ये एक बड़ी उपलब्धि है. लेकिन किसी भी मैच्योर कंपनी की तरह, यहां से रिटर्न की गति धीमी और कठिन होने की संभावना है. कंपनी संभवतः प्रमुख और प्रॉफ़िटेबल बनी रहेगी, लेकिन उसका सुनहरा दौर शायद अब पीछे छूट चुका है.
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ये लेख पहली बार जून 02, 2025 को पब्लिश हुआ.
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