Sakshi/AI-Generated Image
बेंचमार्क को हराना आसान नहीं है. लेकिन कोई शेयर लगातार पांच साल तक उससे पीछे रहे? ये तो निवेशकों के लिए निराशाजनक है. ₹500 करोड़ से ज्यादा मार्केट कैप वाली सभी लिस्टेड कंपनियों में से हमने पांच ऐसी कंपनियों को चुना, जिनमें एक लार्ज-कैप कंपनी भी शामिल है. ये कंपनियां पिछले पांच कैलेंडर वर्षों में हर बार BSE सेंसेक्स से पीछे रही हैं. आइए समझते हैं कि ये कंपनियां क्यों आगे नहीं बढ़ पा रही हैं?
5 कंपनियां जो पिछड़ गईं
(रिटर्न % में)
| वर्ष | HDFC लाइफ़ इंश्योरेंस | बंधन बैंक | बाटा इंडिया | SIS | एंटरटेनमेंट नेटवर्क (इंडिया) | BSE सेंसेक्स |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 2024 | -4.8 | -34.9 | -16 | -22.5 | -3 | 8.1 |
| 2023 | 13.6 | 0.5 | -0.2 | 15.3 | 18.6 | 18.7 |
| 2022 | -13.1 | -7.4 | -11.4 | -14.9 | -12.2 | 4.4 |
| 2021 | -4.4 | -36.9 | 19.1 | 7.4 | -3.3 | 21.9 |
| 2020 | 8.9 | -20 | -9.6 | -11.3 | -37.4 | 15.8 |
| रिटर्न हर कैलेंडर वर्ष के लिए कैलकुलेट किए गए हैं | ||||||
HDFC लाइफ़ इंश्योरेंस
भारत की टॉप लाइफ़ इंश्योरेंस कंपनियों में शुमार HDFC लाइफ़ के स्टॉक का प्रदर्शन उसकी ब्रांड वैल्यू से मेल नहीं खाता. भले ही इसका ब्रांड मज़बूत हो और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क डाइवर्सिफ़ाइड हो, लेकिन बीते पांच साल में ये हर साल सेंसेक्स से पीछे रहा है. असल वजह है इसका टर्म इंश्योरेंस बिज़नस, जो लाइफ़ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मुनाफ़े का बड़ा स्रोत है, लेकिन ये उतना बढ़ नहीं पाया. यही कारण है कि टॉपलाइन ग्रोथ (नई पॉलिसियों से पहला प्रीमियम FY21 से FY25 तक दोगुना) के बावजूद मुनाफ़ा उस रफ्तार से नहीं बढ़ा.
इसके अलावा, कम मार्जिन वाले सेविंग्स और एन्युटी प्रोडक्ट्स की ग्रोथ तेज़ रही है, जिससे कुल मार्जिन कम हो गया है. मिसाल के तौर पर, न्यू बिज़नस मार्जिन हाल के वर्षों में स्थिर रहा है, जो कभी 27 प्रतिशत से ऊपर था. साथ ही, एक्साइड लाइफ़ के साथ मर्जर से डिस्ट्रीब्यूशन तो बढ़ गया, लेकिन इंटीग्रेशन कॉस्ट और ऑपरेशनल दिक्कतें भी साथ में आईं. भले ही, तालमेल के फ़ायदे धीरे-धीरे मिल रहे हैं, लेकिन इससे मार्जिन के बढ़ोतरी के तौर पर फ़ायदा नहीं मिला है.
जब तक कंपनी अपने हाई-मार्जिन प्रोडक्ट्स को फिर से मज़बूत नहीं करती और ऑपरेटिंग लीवरेज नहीं हासिल करती, इसका स्टॉक कमज़ोर रह सकता है.
बंधन बैंक
बंधन बैंक की जड़ें कभी उसकी ताकत रही माइक्रोफ़ाइनेंस में हैं, लेकिन अब कमज़ोरी बन गई है. पिछले कुछ सालों में इसका बॉरोअर बेस कोविड की मार और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के चलते ख़ासा कम हुआ है, जिनमें ज़्यादातर कम आय वाली, असंगठित क्षेत्र की महिलाएं हैं. नतीजा, बैंक को लंबे समय तक ख़राब एसेट क्वालिटी की समस्या का सामना करना पड़ा.
भले ही, बंधन ने मॉर्गेज और रिटेल लोन को डाइवर्सिफ़ाइड करने की कोशिश की, लेकिन इसकी लोन बुक का 40 प्रतिशत हिस्सा अभी भी EEB (इमर्जिंग एंटरप्रेन्योर्स बिज़नस) सेगमेंट यानी माइक्रोफ़ाइनेंस से आता है. ग्रॉस NPA लगातार 5 प्रतिशत के आसपास रहा और क्रेडिट कॉस्ट 3 प्रतिशत से ज्यादा है, जो इसके प्रतिस्पर्धियों से अधिक है. बैंक के रिटर्न रेशियो भी प्रभावित हुए हैं-FY18 में स्थापना के पहले साल में रिटर्न ऑन असेट्स (ROA) और रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) क्रमशः 4 और 20 प्रतिशत थे, जो फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में घटकर 1.5 और 12 प्रतिशत रह गए.
इसका मुकाबला करने के लिए बंधन ने मॉर्गेज (होम लोन), SME लेंडिंग और होलसेल बैंकिंग को बढ़ाया है. लेकिन सुधार का रास्ता मुश्किल है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि बंधन अपनी पुरानी जोखिम वाली निर्भरता को कितनी जल्दी कम कर सकता है.
ये भी पढ़ेंः 13.2 अरब डॉलर का फ़ंड मैनेज करते हैं राजीव ठक्कर, जानिए कहां कर रहे हैं निवेश?
बाटा इंडिया
बाटा इंडिया घर-घर में जाना-पहचाना ब्रांड है. ये क़रीब 2,000 स्टोर्स और एक सदी पुरानी विरासत के साथ ये फुटवेयर सेक्टर में बड़ा नाम है. लेकिन स्टॉक परफॉर्मेंस की बात करें तो कहानी कमज़ोर रही है. आखिर इसके मामले में क्या ग़लत हुआ?
पहला, कोविड के बाद इसकी रिकवरी प्रतिस्पर्धी कंपनियों से धीमी रही. कंपनी फ़ाइनेंशियल ईयर 21 और फ़ाइनेंशियल ईयर 22 में डिमांड में उतार-चढ़ाव से जूझती रही, क्योंकि ये फिजिकल रिटेल पर बहुत ज़्यादा निर्भर थी, जबकि ई-कॉमर्स तेज़ी से बढ़ रहा था.
रिटेल के उबरने पर भी कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों और उद्योग में सतर्कता के साथ ख़र्च के कारण मार्जिन पर दबाव बना रहा. दूसरा, प्रीमियम प्रोडक्ट्स और स्नीकर स्टूडियोज की ओर रुझान, भले ही सही कदम था, लेकिन इसे स्केल करने में समय लग रहा है. फ्लोट्ज और हश पपीज ऑफिस स्नीकर्स जैसे प्रीमियम इनोवेशन से अभी तक उम्मीदें हैं, लेकिन इनसे वॉल्यूम या मुनाफ़े में ख़ास बढ़ोतरी नहीं हुई. तीसरा, ग्रोथ की क़ीमत चुकानी पड़ी. सैकड़ों फ्रैंचाइजी स्टोर्स खोलने और मर्चेंडाइजिंग में बदलाव के बावजूद, इन्वेंट्री टर्नओवर 1.9 गुना रहा, जो उद्योग के 3-4 गुना की तुलना में कम है. इससे निष्पादन में कमज़ोरी और कम डिमांड का पता चलता है.
बाटा एक भरोसेमंद ब्रांड है, लेकिन स्टॉक मार्केट में सिर्फ़ यही बात काफ़ी नहीं है. निवेशकों को लगातार, बढ़ती हुई ग्रोथ और मार्जिन में मज़बूती का सबूत चाहिए. बाटा की कहानी ये याद दिलाती है कि मजबूत ब्रांड को उतने ही मज़बूत निष्पादन की ज़रूरत होती है.
एसआईएस (SIS)
भारत की सबसे बड़ी सिक्योरिटी और फैसिलिटी मैनेजमेंट सर्विस कंपनी SIS ने टॉपलाइन ग्रोथ में कोई कमी नहीं छोड़ी- फ़ाइनेंशियल ईयर 17 से फ़ाइनेंशियल ईयर 25 तक रेवेन्यू लगभग तिगुना होकर ₹13,189 करोड़ तक पहुंच गया. लेकिन इसका स्टॉक पीछे रह गया.
इसकी वजह इसका लेबर की ज़्यादा ज़रूरत, कम मार्जिन वाला बिज़नस मॉडल है, जहां 80 प्रतिशत से ज़्यादा रेवेन्यू कर्मचारियों से जुड़े ख़र्चों में चला जाता है. ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और न्यूजीलैंड में विस्तार के बावजूद EBIT मार्जिन सिर्फ़ 3 प्रतिशत के आसपास है. VProtect जैसे टेक-बेस्ड ऑफरिंग्स के बावजूद मार्जिन में ख़ास सुधार नहीं हुआ.
दूसरा, कैपिटल अलोकेशन से शेयरहोल्डर्स को ठोस वैल्यू नहीं मिली. फ़ाइनेंशियल ईयर 17 से अब तक नौ अधिग्रहण पूरे होने के बावजूद रिटर्न निराशाजनक रहे. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में ही ऑस्ट्रेलिया के अधिग्रहणों से ₹306 करोड़ का बोझ पड़ा, जिससे इनऑर्गेनिक ग्रोथ स्ट्रैटेजी पर भरोसा कम हुआ. तीसरा, ₹600 करोड़ के फ़्री कैश फ़्लोऔर कई बायबैक के बावजूद, निवेशक कंपनी की कमाई बढ़ाने या मार्जिन बचाने की क्षमता पर सवाल उठाते दिखे.
SIS की स्टोरी ऑपरेशनल एग्जीक्यूशन का शेयरहोल्डर रिटर्न में न बदलने का अनोखा उदाहरण है, जो इसके कैपिटल के इस्तेमाल और बिज़नस मॉडल की लंबे समय की ग्रोथ पर सवाल उठाता है.
ये भी पढ़ेंः 10 शानदार शेयर जो पैट डोर्सी के प्रॉफ़िटेबिलिटी टेस्ट पर ख़रे उतरते हैं
एंटरटेनमेंट नेटवर्क (ENIL)
आईकॉनिक मिर्ची ब्रांड की ओनर ENIL लंबे समय से प्राइवेट FM रेडियो स्पेस में छाई हुई है. लेकिन इसकी बदलाव की कहानी पर दांव लगाने वाले निवेशक निराश हुए हैं.
ENIL का कोर रेडियो बिज़नस, भले ही अभी भी बड़ा है, लेकिन ढांचागत रूप से कमज़ोर हो रहा है. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में रेवेन्यू अभी भी फ़ाइनेंशियल ईयर 20 के पीक से नीचे है और पारम्परिक ऐड ख़र्च में ख़ास उछाल नहीं आया. नॉन-FCT (नॉन-रेडियो) इवेंट्स, ब्रांड सॉल्यूशंस और डिजिटल ऑडियो ऐड्स (जैसे MPing) में बदलाव की कोशिशें बढ़ी हैं, लेकिन ये उस स्केल पर नहीं हुआ जिससे पुराने बिज़नस के नुक़सान की भरपाई हो सके.
गाना (Gaana) का हालिया अधिग्रहण रणनीतिक इरादा दिखाती है, लेकिन यहां भी मोनेटाइजेशन का रास्ता लंबा है. ENIL ने गाना को प्रीमियम सब्सक्रिप्शन-ओनली सर्विस के रूप में रीपोजिशन किया है- ये साहसिक लेकिन जोखिम भरा कदम है, क्योंकि मार्केट में फ्री ऑप्शंस और बड़े बजट वाले प्रतिस्पर्धी भरे पड़े हैं. फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में कंपनी मुनाफ़े में लौटी (₹33 करोड़ का नेट प्रॉफ़िट), लेकिन रिटर्न रेशियो कमज़ोर हैं और डिजिटल कंटेंट क्रिएशन व प्लेटफ़ॉर्म डेवलपमेंट पर कैश ख़र्च हो रहा है.
ENIL एक पारम्परिक मीडिया बिज़नस का तेज़ी से बदलते इकोसिस्टम में खुद को रीइन्वेंट करने का उदाहरण है. लेकिन निवेशकों के लिए, ट्रांसफॉर्मेशन की कहानियों में सिर्फ गतिविधि नहीं, बल्कि ठोस नतीजा चाहिए. जब तक डिजिटल रेवेन्यू रेडियो रेवेन्यू के नुक़सान की भरपाई नहीं करता, ENIL आधे-अधूरे ट्रांसफॉर्मेशन में फंसी रहेगी.
आखिरी लेकिन ज़रूरी बात
लगातार ख़राब प्रदर्शन कभी संयोग नहीं होता. इससे अक्सर ढांचागत समस्याओं का पता चलता है—चाहे वो कमज़ोर बिज़नस मॉडल हो, ख़राब कैपिटल अलोकेशन हो या घटती प्रासंगिकता. ये पांच कंपनियां हमें याद दिलाती हैं कि अगर फंडामेंटल मज़बूत नहीं होते तो बड़े नाम भी वैल्यू ट्रैप बन सकते हैं.
इसलिए, निवेशकों के लिए ज़रूरी है कि वे कहानियों से आगे बढ़कर लंबी अवधि के प्रदर्शन के ट्रेंड्स पर नज़र रखें. यहीं पर सही टूल्स के साथ-साथ रिसर्च काम आती है. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र पर हम सावधानीपूर्वक चुनी गई स्टॉक रेकमंडेशन देते हैं, जो गहरी रिसर्च और एक्सपर्ट्स के एनालिसिस पर आधारित होते हैं. इससे आप न सिर्फ़ विनर्स को चुन सकते हैं, बल्कि लूज़र्स से भी बच सकते हैं, ताकि आपका लंबे समय के निवेश का सफर सही रास्ते पर रहे.
ये भी पढ़ेंः 5 बेहतरीन स्मॉल-कैप स्टॉक्स जो कम क़ीमत पर मिल रहे हैं
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
शिकायतों के लिए संपर्क करें: [email protected]






