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मार्केट लड़खड़ाए तो SIP का क्या किया जाए?

जब बाज़ार लड़खड़ाते हैं, निवेशक भी डगमगाते हैं और अक्सर अपने ही बुने जाल में फंस जाते हैं

बाजार में गिरावट के दौरान SIP को रोकना आपके रिटर्न को नुकसान क्यों पहुंचाता है?Aditya Roy/AI-Generated Image

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बाज़ार ज़रा सा हिला नहीं कि व्हाट्सऐप मैसेजों की बौछार शुरू हो जाती है, और हर बार यही होता है. “क्या मैं अपनी SIP रोक दूं?” - एक निवेशक ने पूछा-जब ट्रंप के नए टैरिफ़ की धमकी के बाद सेंसेक्स नीचे फिसला. “बाज़ार अनिश्चित है, थोड़ा रुक कर देखना चाहिए?” - एक और सुझाव आया. ये पैटर्न जितना आम है, उतना ही नुक़सानदेह भी: जैसे ही बाज़ार में अस्थिरता आती है, SIP अचानक कुछ लोगों के लिए विकल्प का विषय बन जाती है.

इस हफ़्ते अमेरिकी व्यापार नीति को लेकर फैली घबराहट ये समझने के लिए एक आदर्श केस स्टडी है कि कैसे निवेशक अपनी ही बनाई हुई योजनाओं को नुक़सान पहुंचा देते हैं. ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 25% टैरिफ़ लगाने की घोषणा और आगे पेनल्टी की धमकी ने निवेशकों में ऐसी अनिश्चितता भर दी जिससे वे सब कुछ ‘पॉज़’ करने का मन बना लेते हैं. सेंसेक्स हाल के ऊपरी स्तर से 4,000 अंक गिर चुका है और अचानक ये निवेश गिरावट के और शिकार हो जाने के डर से असुरक्षित लगने लगते हैं.

लेकिन बाज़ार की उथल-पुथल के दौरान SIP रोकने की ये प्रवृत्ति दरअसल इस योजना की मूल समझ का अभाव दिखाती है. सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान की पूरी अवधारणा ही इस सोच पर टिकी है कि आप बाज़ार की चाल नहीं भांप सकते, इसलिए समय के साथ धीरे-धीरे निवेश करते हैं ताकि उतार-चढ़ाव का असर कम हो सके. गिरावट में SIP रोकना आपको नुक़सान से नहीं बचाता - बल्कि ये उस प्रक्रिया को ही त्याग देना है जो अस्थिरता को अवसर में बदलने के लिए बनाई गई थी.

SIP रोकने के पीछे की मनोविज्ञानिक भावना समझ में आती है, लेकिन वो ग़लत दिशा में ले जाती है. कोई भी ये देखना पसंद नहीं करता कि उसका पोर्टफ़ोलियो घट रहा है - भले ही थोड़े समय के लिए. अनिश्चितता के सामने इंसान का स्वभाव होता है कि कुछ न कुछ किया जाए, और SIP रोकना एक ‘कंट्रोल’ लेने जैसा महसूस होता है. लेकिन हक़ीक़त में ये लंबे समय के लिए समझदारी भरी रणनीति को छोड़ कर तात्कालिक भावनात्मक राहत को चुनने जैसा होता है.

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जैसा कि मैंने SIP पर पहले लिखे एक कॉलम में कहा था, SIP का असली मूल्य कैलकुलेशन में नहीं, व्यवहार में छिपा होता है. मैंने लिखा था कि SIP इसीलिए काम करती है क्योंकि ये “आपकी आमदनी की प्रकृति से मेल खाती है और एक बार शुरू हो जाने पर इसे रोकने की संभावना कम होती है.” विडंबना तब और बढ़ जाती है जब आप देखते हैं कि जो लोग मुश्किल समय में SIP रोकते हैं, वे आमतौर पर सही समय पर दोबारा शुरू नहीं करते. वे “स्पष्टता” या “बाज़ार के स्थिर होने” का इंतज़ार करते हैं - जो आमतौर पर तब होता है जब दाम पहले ही ऊपर जा चुके होते हैं और सस्ते दामों पर निवेश का अवसर निकल चुका होता है.

सबसे ज़्यादा खीझ तब होती है जब आप देखते हैं कि SIP रोकने वाले निवेशक दूसरी मासिक ज़िम्मेदारियों - EMI, इंश्योरेंस प्रीमियम, घरेलू ख़र्च, सब कुछ- को बिना किसी सवाल के निभाते रहते हैं. लेकिन वही एक निवेश - जो खासतौर पर बाज़ार की अस्थिरता का फ़ायदा उठाने के लिए बनाया गया है - वो सबसे पहले ‘नेगोशिएबल’ बन जाता है.

मुझे एक पुराने दोस्त की याद आती है, जिसके बारे में मैंने कभी लिखा था. वो पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक किताब बाज़ार ‘नई सड़क’ पर एक बुकशॉप चलाते थे. दोपहर के खाने के बाद वह टहलने निकलते, पोस्ट ऑफ़िस रुकते और अगर उनके पास ₹500 अतिरिक्त होते तो एक इंदिरा विकास पत्र ख़रीद लेते - जो आज के नए निवेशकों के लिए अनसुना शब्द हो सकता है. ये उनके लिए एकदम सही SIP थी क्योंकि “ये उनकी आय और आदतों के अनुकूल था.” असली बात ये है कि कामयाब सिस्टमैटिक इन्वेस्टिंग का राज़ रिटर्न को समय करके बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी आदत बनाना है जो बाहरी हालात के बावजूद चलती रहे. इंदिरा विकास पत्र (IVP) एक बियरर टाइप स्मॉल सेविंग्स सर्टिफ़िकेट था, जिसे पांच साल में डबल होने के लिए डिज़ाइन किया गया था. ये स्कीम 1999 में बंद हो गई थी.

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इसका मतलब ये नहीं कि आप बाज़ार के हालात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करें - बल्कि SIP को इन्हीं हालात के लिए बनाया गया है, ये समझना ज़रूरी है. अगर आप वाक़ई अपने चुने गए फ़ंड की लंबे समय के दौरान संभावनाओं पर भरोसा रखते हैं और आपका निवेश लक्ष्य अब भी वही है, तो थोड़ी बाज़ारी कमज़ोरी आपके मासिक निवेश के लिए मायने नहीं रखनी चाहिए. उल्टे, ये आपके भरोसे को मज़बूत करना चाहिए.

अगर आप वाक़ई मौजूदा बाज़ार स्तरों को लेकर चिंतित हैं, तो SIP पूरी तरह रोकने से बेहतर विकल्प मौजूद हैं. आप चाहें तो SIP की राशि अस्थायी रूप से बढ़ा सकते हैं ताकि कम दामों का फ़ायदा उठाया जा सके या फिर अपने एसेट एलोकेशन की समीक्षा कर सकते हैं कि वह अब भी आपकी रिस्क प्रोफ़ाइल से मेल खा रहा है या नहीं. ये दोनों विकल्प बाज़ार के साथ चलते हैं, उसके विरुद्ध नहीं.

इससे मिलने वाला बड़ा सबक किसी टैरिफ़ की ख़बर या किसी एक बाज़ार घटना से परे है. सफल निवेश की चाभी ये है कि आप अपनी निवेश प्रक्रिया को अपने तात्कालिक भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से अलग रखें. SIP इसीलिए कारगर है क्योंकि ये बार-बार होने वाले टाइमिंग के फ़ैसलों की ज़रूरत को ख़त्म कर देती है. जब आप उन्हें बाज़ार में उथल-पुथल के समय रोकते हैं, तब आप उन इंसानी पूर्वाग्रहों को फिर से आमंत्रित करते हैं जिनसे SIP आपको बचाने के लिए बनाई गई थी.

अगली बार जब किसी मार्केट हेडलाइन से आपको अपनी SIP पर शक़ होने लगे, तो याद रखिए - ऐसे ही पल दरअसल सिस्टमैटिक इन्वेस्टिंग के सबसे ज़्यादा क़ीमती साबित होते हैं. जब बाक़ी लोग रुक जाते हैं, तब भी लगातार निवेश करते रहना - यही वो अनुशासन है जो सफल लंबे समय के निवेशकों को बाक़ियों से अलग करता है.

रुकिए नहीं — चलते रहिए

  • बाज़ार की अस्थिरता कोई गड़बड़ी नहीं, फ़ीचर है. गिरावट में SIP रोकना रुपये की औसत लागत को ख़त्म करता है और भविष्य में महंगी एंट्री की ज़रूरत पैदा करता है.
  • पॉज़ = मंहगी-ख़रीद का ट्रैप. ज़्यादातर निवेशक SIP दोबारा तभी शुरू करते हैं जब बाज़ार रिकवर कर चुका होता है - डर के चलते लिए गए फ़ैसले महंगे साबित होते हैं.
  • EMI की तरह सोचिए. SIP को भी मासिक ज़िम्मेदारी मानिए - आदतें हेडलाइनों से ताक़तवर होती हैं.
  • बदलाव करें, पर छोड़ें नहीं. घबराहट हो तो रीबैलेंस करें या SIP बढ़ाएं - लेकिन इस कंपाउंडिंग मशीन को बंद न करें.

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