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कुछ दिन पहले बजाज कैपिटल के संयुक्त प्रबंध निदेशक संजीव बजाज ने लिंक्डइन पर पारंपरिक बीमा उत्पादों के समर्थन में एक पोस्ट की. उनका तर्क था - टर्म इंश्योरेंस भारत के आम लोगों के लिए सही नहीं है. उनके मुताबिक़, ज़्यादातर भारतीयों के लिए ऐसे बंडल्ड सॉल्यूशंस ज़रूरी हैं जो सुरक्षा और बचत दोनों को एक साथ जोड़ते हों, क्योंकि वे इन्हें अलग-अलग नहीं ख़रीद सकते. बजाज का कहना था कि ULIP और एंडॉवमेंट पॉलिसी जैसे उत्पादों की आलोचना करना भारत के वास्तविक बचत व्यवहार को नज़रअंदाज़ करना है.
मेरे साथ-साथ कई अन्य लोगों ने भी इस विचार से असहमति जताई. लेकिन यह बहस लिंक्डइन तक सीमित नहीं है. सवाल यह है कि क्या हम यह मान लें कि करोड़ों भारतीय परिवारों को अधूरी बीमा सुरक्षा ही मिल सकती है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि बीमा उद्योग के लिए “शुद्ध सुरक्षा” बेचना कम मुनाफ़े वाला सौदा है?
अब बजाज के तर्क को गहराई से देखें. उनका कहना है कि ज़्यादातर भारतीयों के लिए बंडल्ड उत्पाद बेहतर हैं क्योंकि वे सुरक्षा और बचत दोनों की ज़रूरत को साथ पूरा करते हैं. यह सुनने में व्यावहारिक लगता है - लेकिन असलियत कुछ और है. एक सामान्य एंडॉवमेंट पॉलिसी या ULIP औसतन 6–7% वार्षिक रिटर्न देती है, कई बार इससे भी कम. वेल्थ बनाना तो दूर की बात, महंगाई घटाने के बाद यह रिटर्न मुश्किल से आपकी परचेजिंग पावर बनाए रख पाता है. ध्यान रहे, ULIP के “रिटर्न” की बात करते समय कंपनियां आम तौर पर ग्रॉस रिटर्न बताती हैं - यानि पॉलिसी से जुड़े सारे डिडक्शन से पहले का रिटर्न.
दूसरी ओर, इन उत्पादों का बीमा कवरेज भी बेहद सीमित होता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति सालाना ₹25,000 किसी एंडॉवमेंट पॉलिसी में जमा करता है, तो उसे ₹5 लाख से ₹10 लाख का लाइफ़ कवर मिलता है. अगर उसकी मृत्यु हो जाती है, तो परिवार को यही रकम मिलेगी - जो उनके जीवन स्तर बनाए रखने के लिए बेहद कम है. यही ₹25,000 अगर टर्म इंश्योरेंस में लगाएं, तो कोई युवा आसानी से ₹1 करोड़ या उससे ज़्यादा का कवर ले सकता है, जो परिवार को वास्तविक वित्तीय सुरक्षा देता है.
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यानी, बंडल्ड उत्पाद दोनों मोर्चों पर नाकाम हैं - न पर्याप्त सुरक्षा देते हैं, न संतोषजनक रिटर्न. यही वजह है कि हम अक्सर ऐसी कहानियां सुनते हैं जहां बीमा पॉलिसी के बावजूद परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते हैं. असल में उन्हें “बीमा जैसा दिखने वाला” उत्पाद बेचा गया था, जिससे न तो पर्याप्त कवर मिला और न ही रिटर्न.
“टर्म इंश्योरेंस आम लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है” - यह तर्क मुझे सबसे ज़्यादा परेशान करता है. सच्चाई तो इसके उलट है. अमीर लोग शायद कम कवरेज भी झेल सकते हैं क्योंकि उनके पास दूसरी एसेट होती हैं. एक गरीब या मिडिल क्लास परिवार के पास यह सहूलियत नहीं होती. उन्हें कम खर्च में अधिकतम सुरक्षा चाहिए और टर्म इंश्योरेंस से यही सुविधा मिलती है. बजाज कहते हैं कि हमें भारतीय उत्पादों को “पश्चिमी दृष्टिकोण” से नहीं आंकना चाहिए. लेकिन गणित न पश्चिमी है न पूर्वी. बीमा का मूल सिद्धांत हर जगह एक है - बीमा का उद्देश्य सुरक्षा है. जब परिवार का कमाने वाला व्यक्ति चला जाता है, तो उसकी आय की भरपाई करनी होती है - चाहे यह घटना मुंबई में हो या मैनहैटन में.
कई लोग तर्क देते हैं कि LIC ने दशकों में भारी भरोसा कमाया है - और यह सच भी है. लाखों भारतीयों के लिए LIC ही उनकी पहली वित्तीय संस्था रही है. लेकिन भरोसा तभी सार्थक है जब उसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ किया जाए. अगर LIC अपनी विश्वसनीयता का इस्तेमाल - आसान प्रीमियम प्रक्रिया और उच्च कवर के साथ - बड़े पैमाने पर सस्ते और पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस देने में करे तो यह भारतीय परिवारों के लिए कहीं ज़्यादा फायदेमंद होगा, बजाय उन योजनाओं के जो न सुरक्षा देती हैं न अच्छे रिटर्न.
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असल समस्या किसी व्यक्तिगत एजेंट या सलाहकार की नीयत नहीं, बल्कि ढांचागत है. बीमा उद्योग का बिज़नेस मॉडल इस तरह बना है कि ऊंचे शुल्क और कमज़ोर रिटर्न वाले बंडल्ड उत्पाद बेचना, सस्ती और सरल टर्म पॉलिसी बेचने से अधिक फ़ायदेमंद होता है. यही कारण है कि पूरी इंडस्ट्री ग्राहकों को उनकी वास्तविक ज़रूरत - यानी शुद्ध बीमा - से भटकाकर, अपने मुनाफ़े वाले उत्पादों की ओर मोड़ देती है.
किसी भी वित्तीय उत्पाद की असली परीक्षा सरल है - क्या वह कम लागत पर अपना काम ठीक से करता है? बीमा का काम है, ज़रूरत के समय पर्याप्त लाइफ़ कवर देना. इस कसौटी पर टर्म इंश्योरेंस पास होता है, जबकि बंडल्ड उत्पाद बार-बार असफल साबित होते हैं. यह पश्चिमी नज़रिया नहीं, बस ईमानदारी से आकलन है कि कोई उत्पाद अपने उद्देश्य को पूरा करता है या नहीं.
इसका समाधान यही है - सुरक्षा और बचत को अलग कीजिए, जो ज़्यादा मुश्किल भी नहीं है. पहले पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस लें, ताकि परिवार सुरक्षित रहे. इसके बाद बचत और निवेश को ऐसे पारदर्शी, कम-खर्च वाले उत्पादों में करें जो आपके उद्देश्यों के अनुरूप हों. यह तरीक़ा परिवारों के लिए बेहतर नतीजे लाता है. अगर इससे बीमा कंपनियों, उनके शेयरहोल्डर्स या डिस्ट्रीब्यूटर्स के मुनाफ़े घटते हैं - तो यह समस्या ग्राहकों की नहीं है.
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