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कुछ हफ़्ते पहले मेरी एक ऐसे निवेशक से बातचीत हुई, जिसने मेरा एक साथ मनोरंजन भी किया और थोड़ा चिंतित भी. उसने प्रॉपर्टी बेचकर मिले पैसों में से कुछ करोड़ रुपये निवेश करने थे, जो फ़िलहाल उसके सेविंग्स अकाउंट में पड़े थे और नाममात्र का रिटर्न दे रहे थे. जब मैंने सुझाव दिया कि वह इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में SIP के ज़रिये धीरे-धीरे निवेश करे, तो उसकी प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी. उसने मुझे लगभग नाराज़गी भरी नज़र से देखा. उसने कहा, “लेकिन मेरे पास तो रेडी पैसा है.” मानो मैं इस अहम बात को समझ ही नहीं पाया होऊं. उसने कहा, “मुझे SIP करने की ज़रूरत नहीं है.”
मुझे समझने में एक पल लगा कि यहां क्या हुआ है. उसके दिमाग में SIP उन लोगों के लिए थी, जो एक बार में निवेश करने का सामर्थ्य नहीं रखते. करोड़ों रुपये वाले व्यक्ति को SIP सुझाना, उसके लिए वैसा ही था जैसे कोई मर्सिडीज़ शोरूम में आए ग्राहक को ऑल्टो की सलाह दे दे. वह इस विचार का किसी तार्किक वजह से विरोध नहीं कर रहा था. उसे बस यह लगता था कि SIP उसकी वित्तीय हैसियत से नीचे की चीज़ है-कि SIP गरीब लोगों के लिए होती है.
यह भारत में पिछले एक दशक में SIPs के मार्केटिंग के तरीक़े का एक दिलचस्प साइड इफेक्ट है. म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री सही मायनों में निवेश को लोकतांत्रिक बनाना चाहती थी और नए निवेशकों को जोड़ना चाहती थी. संदेश सीधा था-आप सिर्फ़ 500 रुपये महीने से शुरुआत कर सकते हैं. बड़े पैसे इकट्ठा होने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं. जहां हैं, जैसे हैं, वहीं से शुरुआत करें. यह संदेश बेहद सफल रहा. लाखों भारतीय, जिन्होंने पहले कभी इक्विटी निवेश के बारे में नहीं सोचा था, आज नियमित SIP चला रहे हैं और कुल निवेश प्रवाह बहुत बड़ा हो चुका है.
लेकिन इसी सफल मार्केटिंग के दौरान एक अनचाहा भ्रम भी पैदा हो गया. अगर SIP उन लोगों के लिए है, जो सिर्फ़ 500 या 5,000 रुपये महीने ही निवेश कर सकते हैं, तो जिनके पास बड़ा अमाउंट है, उन्हें ज़रूर कुछ “ज़्यादा स्मार्ट” करना चाहिए-ऐसी सोच बन गई. यह इस बात की पूरी तरह गलत समझ है कि SIP असल में करता क्या है और क्यों मौजूद है.
सिस्टमैटिक इन्वेस्टिंग का तर्क आपके कॉर्पस के आकार से बिल्कुल भी जुड़ा नहीं है. चाहे आपके पास हज़ार रुपये हों या कई करोड़, मूल समस्या वही रहती है-कोई नहीं जानता कि बाज़ार कल, अगले महीने या अगले साल क्या करेगा. जब आपके पास एक बड़ा अमाउंट निवेश के लिए होता है, तो असली दुविधा वहीं शुरू होती है. अगर आप सारा पैसा आज लगा दें और अगले महीने बाज़ार 20 प्रतिशत गिर जाए, तो आपको बेहद ख़राब लगेगा. और अगर आप बेहतर एंट्री पॉइंट का इंतज़ार करें, तो हो सकता है आप हमेशा इंतज़ार ही करते रहें और बाज़ार आपसे आगे निकल जाए.
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मैं पहले भी लिख चुका हूं कि बाज़ार गिरावट के दौर में SIP निवेशक तुलनात्मक रूप से शांत क्यों रहते हैं, जबकि ट्रेडर्स और एनालिस्ट हैरान होते हैं कि वे घबराकर बेच क्यों नहीं देते. इसका जवाब मनोविज्ञान में छिपा है. समय के साथ आपकी औसत लागत संतुलित हो जाती है और छोटी अवधि की अस्थिरता का असर कम हो जाता है. जब निवेश की रक़म बड़ी होती है, तो यह मानसिक बढ़त और भी ज़्यादा अहम हो जाती है.
अमीर निवेशकों की SIP के प्रति उपेक्षा एक और दिलचस्प धारणा को उजागर करती है-कि ज़्यादा पैसा होने से बाज़ार को टाइम करने की कोई ख़ास क्षमता मिल जाती है. ऐसा नहीं है. जो अनिश्चितता छोटे निवेशक के लिए SIP को समझदारी भरा बनाती है, वही अनिश्चितता बड़े निवेशक के लिए भी इसे उतना ही उपयुक्त बनाती है.
यहां एक और पहलू भी काम कर रहा है, जिसे मैं अक्सर देखता हूं. अपने कई कॉलम्स में मैंने लिखा है कि जब भी निवेशक आत्मघाती व्यवहार करते हैं, तो अक्सर पर्दे के पीछे कोई बेईमान सेल्सपर्सन मौजूद होता है. यहां भी मामला अलग नहीं है. बैंकों और बड़े डिस्ट्रीब्यूटर्स में बैठे तथाकथित वेल्थ मैनेजर्स के पास अमीर ग्राहकों को तुरंत लमसम (lump sum) निवेश कराने की मज़बूत वजह होती है. उनका कमीशन उसी पल मिल जाता है, जब पैसा अंदर जाता है. वे 12 महीने की SIP को क्यों बढ़ावा देंगे, जब आज ही पूरी फ़ीस बुक की जा सकती है? इससे भी बुरा यह है कि लंबी SIP उनके लिए जोखिम पैदा करती है. हो सकता है कि बीच में कोई और रिलेशनशिप मैनेजर आकर बाक़ी किस्तों को कहीं और डायवर्ट कर दे. वेल्थ मैनेजर के लिए रफ़्तार सबसे अहम है. निवेशक के लिए धैर्य. और ये दोनों हित एक-दूसरे के ठीक उलट हैं.
बेशक, एग्ज़ीक्यूशन के स्तर पर कुछ व्यावहारिक अंतर होते हैं. जिसके पास दो-तीन करोड़ रुपये हैं, वह 10 साल तक 10,000 रुपये महीने की SIP नहीं चलाएगा. लेकिन वह समझदारी से 12 से 18 महीनों में सिस्टमैटिक ट्रांसफर प्लान के ज़रिये निवेश कर सकता है, ताकि अलग-अलग बाज़ार परिस्थितियों में एंट्री फैली रहे. सिद्धांत वही रहता है-सिर्फ़ रकम और समयसीमा अलग होती है.
सबसे अच्छी निवेश रणनीतियां उबाऊ रूप से सार्वभौमिक होती हैं. वे तब भी काम करती हैं, जब आप अपनी पहली बचत निवेश कर रहे हों, और तब भी, जब अचानक बड़ी रकम हाथ लगी हो. जो निवेशक यह मानता है कि SIP सिर्फ़ उन लोगों के लिए है, जो लमसम (lump sum) निवेश नहीं कर सकते, उसने एक मार्केटिंग मैसेज को निवेश सिद्धांत समझ लिया है.
बाज़ार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप मर्सिडीज़ में आए हैं या ऑल्टो में. वह आपके पैसे के साथ दोनों ही हालात में एक-सी बेरुख़ी से पेश आएगा.
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