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अमीरी या गरीबी नहीं तय करती बचत

बचत एक आदत है। अमीरी या गरीबी से इसका कोई लेना देना नहीं है

बचत एक आदत है। अमीरी या गरीबी से इसका कोई लेना देना नहीं है

आप फिजूलखर्च करने वाले हैं या बचत करने वाले, बचत करने वाले हैं या निवेशक, निवेशक हैं या जुआरी। यह सब इस पर निर्भर है कि आप खुद को कितना अमीर या गरीब महसूस करते हैं। ध्यान रखिए, मैंने यह नहीं कहा कि आप असल में कितने अमीर या गरीब हैं। मैंने यह कहा कि आप कैसा महसूस करते हैं। इससे भी मजेदार बात यह है कि निवेश को लेकर अमीर और गरीब के व्यवहार को लेकर हमारी जो सोच है असल में यह उलटा भी हो सकता है। मसलन, जो खुद को गरीब महसूस करता है, वह ज्यादा जोखिम वाले फैसले ले सकता है। इसका किसी एक पैमाने के हिसाब से अमीरी या गरीबी से कोई सरोकार नहीं है। इसका सीधा सरोकार इस बात से है कि आप दूसरों के मुकाबले खुद को क्या और कैसा महसूस करते हैं।

हाल ही में मैंने गरीबी और विषमता के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को लेकर कुछ शोध पढ़े। उन्हें पढ़कर लगा कि बचतकर्ताओं और निवेशकों के जिन तौर तरीकों का मैं बरसों से देखता रहा हूं, वे शोध से हासिल तथ्यों से अलग नहीं हैं। अमेरिका में कुछ अर्थशास्त्रियों ने एक परीक्षण करने का फैसला किया। उन्होंने किसी विभाग के सरकारी कर्मचारियों को दो दलों में बांट दिया। उनमें से एक दल के सरकारी कर्मचारियों को एक ऑनलाइन माध्यम से उनके सहकर्मियों का वेतन बताया, और दूसरे दल को नहीं बताया। बाद में उन्होंने दोनों दलों पर एक अध्ययन किया।

एक-दूसरे की वित्तीय स्थिति का पता चल जाने के बाद कर्मचारियों की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसे लेकर शोध से पहले शोधकर्ताओं के सामने दो विपरीत सिद्धांत थे। शोधकर्ताओं के एक हिस्से का मानना था कि जिन्हें यह पता चलेगा कि उन्हें औरों के मुकाबले कम वेतन मिलता है, वे दुखी हो जाएंगे। दूसरा सिद्धांत यह था कि जब उन्हें पता चलेगा कि उनका वेतन औरों से कम है, तो वे इसे भविष्य में उनके जितना ही कमाने के मौके की तरह लेंगे। ऐसे में उन्हें अपने सहकर्मियों से कम कमाने का दुख नहीं होगा, बल्कि वे भविष्य में और कमाने की बात सोचकर खुश होंगे। मैं जानता हूं कि किसी भी सामान्य व्यक्ति को दूसरा विचार बेवकूफी भरा लगेगा। लेकिन क्या करें। जो है सो यही है। अर्थशास्त्री ऐसा ही सोचते हैं।

जैसा कि स्वाभाविक ही था, अध्ययन में सामने आया कि जिन्हें कम वेतन मिलता था, वे इसका पता चलने के बाद दुखी हो गए। लेकिन एक दूसरी चौंकाने वाली बात सामने आई। वह यह कि जिन्हें ज्यादा वेतन मिल रहा था, वे यह जानकर बहुत ज्यादा खुश नहीं हुए। ऐसा लगा मानो उन्हें इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता हो। वे न तो बहुत खुश थे, न दुखी। सर्वे में यह बात सामने आई कि जिन्हें औसत से कम वेतन दिया जा रहा था, उन्हें औरों के वेतन का पता लगा तो मायूसी हुई। लेकिन जिन्हें औसत से ज्यादा वेतन मिल रहा था, उन्हें यह पता लगने के बाद बहुत ज्यादा खुशी नहीं हुई।

ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि लोग अमूमन यह देखते हैं कि कौन या कितने लोगों का वेतन उनसे ज्यादा है। आसपास बहुत से गरीब लोग हैं, महज यह जानकारी किसी अमीर के लिए बहुत खुश करने वाली बात नहीं हो सकती है। ऐसे में, बचत और निवेश के लिहाज से यह सवाल किस तरह महत्वपूर्ण है? यह इस तरह महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिन्हें लगता है कि वे ज्यादा धनवान नहीं हैं, वे निवेश को लेकर अक्सर गलत निर्णय ले सकते हैं।

मूल लेख में कहा गया है कि जो गरीब होते हैं, वे जुअा जैसी चीजों के चक्‍कर में आसानी से पड़ जाते हैं। लेकिन मैं यहा इस तरह की बात नहीं कर रहा हूं। जिन लोगों की एक तय आय होती है और जो अपेक्षाकृत थोड़े संपन्न हैं, आम तौर पर उनके पास कोई खास बचत नहीं होती है। उनको लगता है कि केवल अमीरों के पास ही बचत की लग्‍जरी होती है। उन्हें यह भी लगता है कि खुद वे इतने धनी नहीं हैं कि बचत कर सकें। कई बार मैंने पाया है कि लोग इस भ्रम का शिकार होते हैं कि भविष्य में उन्हें एकदम से कोई खजाना मिल जाएगा या कुछ ऐसा होगा जिससे वे अमीर हो जाएंगे और उसके बाद बचत शुरू कर देंगे। इस तरह की सोच का उनकी आय या कमाई से दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। हाल ही में मैं एक ऐसे पति पत्‍नी से मिला जो सालाना कुल 14 लाख रुपये कमाते हैं। फिर भी उन्हें लगता है कि वे बचत करने लायक अमीर नहीं हुए हैं। इसके विपरीत मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं, जो उनसे आधा ही कमाते हैं, लेकिन आराम से हर महीने 10,000 रुपये बचत के लिए निकाल लेते हैं।

मुझे कहना होगा कि पहली कैटेगरी के लोगों के मुताबिक निवेश बेहतर रिटर्न हासिल करने के लिए जोखिम लेने का नाम है। उन्हें लगता है कि वे अमीर नहीं हैं, इसलिए उन्हें अपने निवेश को बैंक, पीपीएफ या ऐसे अन्य उपकरणों में रखते हैं जहां जोखिम बिल्कुल न हो और निवेश सुरक्षित रहे। अक्सर तो यही होता है कि उन लोगों की जिंदगी में कमाई और काम आने लायक रिटर्न के मौके बिल्कुल नहीं आते। कई बार इसे निवेशक शिक्षा से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह वैसा मामला नहीं है। यह एक सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक मामला है। इसका समाधान स्वयं के जागने, खुद से सही सवाल पूछते रहने और नई चीजें सीखते रहने से ही हो सकता है।

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