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Sheela Foam: समस्याएं ख़त्म, लेकिन बाज़ार इससे अनजान है

इंटीग्रेशन का तीन साल का दर्द पीछे छूट गया है. मार्जिन वापस आ गए हैं, कर्ज़ घट रहा है - और शेयर की क़ीमत से ऐसा लग रहा है कि कंपनी अभी भी मुसीबत में हो

इंटीग्रेशन का तीन साल का दर्द पीछे छूट गया है. मार्जिन वापस आ गए हैं, कर्ज़ घट रहा है - और शेयर की क़ीमत से ऐसा लग रहा है कि कंपनी अभी भी मुसीबत में होAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः एक कंपनी ने एक बड़ा और उलझा हुआ अधिग्रहण किया, तीन साल उसे सुलझाने में लगाए और अब डबल-डिजिट मार्जिन के साथ वापस आ गई है - कर्ज़ भी कम हो रहा है. लेकिन शेयर की क़ीमत अभी तक इस बदलाव को नहीं पकड़ पाई है. सवाल यह है कि क्या मुनाफ़ा भी इस रफ़्तार को पकड़ेगा.

शेयर 2022 के अपने सबसे ऊंचे स्तर से 70 प्रतिशत गिर चुका है. मुनाफ़ा अभी भी अधिग्रहण से पहले के स्तर से नीचे है. हर दिखने वाला नंबर एक ही बात कहता है: यह एक बुरा अधिग्रहण लगता है.

लेकिन ऐसा है नहीं.

Sheela Foam के लिए यह उलझन अब पीछे छूट गई है. मार्जिन वापस आ गए हैं. कर्ज़ घट रहा है. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 पहला पूरा साल था जब दोहरे अंकों की रेवेन्यू ग्रोथ के साथ-साथ प्रॉफ़िटेबिलिटी भी सामान्य रही. कंपनी वह कर चुकी है जो उसे करना था. जो अभी पीछे रह गई है, वह है शेयर की क़ीमत.

वह अधिग्रहण जो असलियत से ज़्यादा बुरा लगा

Sleepwell की मालिक Sheela Foam - जो भारत की सबसे बड़ी ब्रांडेड मैट्रेस कंपनी है - ने 2023 के मध्य में Kurlon को ₹2,035 करोड़ में ख़रीदा. Kurlon दक्षिण और पूर्व भारत में मज़बूत थी - वे बाज़ार जहां Sleepwell अपने उत्तर और पश्चिम के गढ़ से कभी ठीक से नहीं पहुंच पाई थी. सोच एकदम सही थी. जो Sheela Foam को मिला, वह नहीं था.

Kurlon अपना डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के अपने रीजनल सेंटर्स के ज़रिए चलाती थी जो मल्टी-ब्रांड आउटलेट्स को माल पहुंचाते थे. Sheela Foam का मॉडल डिस्ट्रीब्यूटर-लेड था, जो एक्सक्लूसिव स्टोर्स पर टिका था. दो कंपनियां, दो बिल्कुल अलग-अलग ऑपरेटिंग मॉडल - और दोनों अब एक छत के नीचे.

बैलेंस शीट पर इसका पूरा बोझ पड़ा. फ़िक्स्ड एसेट्स करीब चार गुना हो गए - ₹865 करोड़ से ₹3,129 करोड़ - जिससे ऑपरेटिंग अर्निंग्स में कोई योगदान किए बिना लगाई गई पूंजी बढ़ गई. डेप्रिसिएशन फ़ाइनेंशियल ईयर 23 के ₹90 करोड़ से दोगुने से ज़्यादा होकर फ़ाइनेंशियल ईयर 25 तक ₹183 करोड़ पर पहुंच गया. इसी दौरान क़र्ज़ बढ़ने के साथ, इंटरेस्ट कॉस्ट क़रीब पांच गुनी बढ़कर ₹121 करोड़ हो गई. वहीं, Kurlon ख़ुद कमज़ोर हालत में आ गई और फ़ाइनेंशियल ईयर 24 तक उसका EBITDA मार्जिन 3.6 प्रतिशत तक गिर चुका था.

एक्ज़ीक्यूशन का फ़र्क़ जल्द ही सामने आ गया. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में Sleepwell 22 प्रतिशत बढ़ी. Kurlon महज 6 प्रतिशत बढ़ गई.

नंबर हक़ीक़त बयान करते हैं

Kurlon के अधिग्रहण से Sheela Foam के मार्जिन और प्रॉफ़िटेबिलिटी पर दबाव बढ़ा

 
FY22 FY23 FY24 FY25* FY26
रेवेन्यू (₹ करोड़) 2,866 2,873 2,982 3,439 3,821
EBITDA (₹ करोड़) 315 298 301 250 414
EBITDA मार्जिन (%) 11 10.4 10.1 7.3 10.8
PAT (₹ करोड़) 219 201 195 96 161
PAT यानी प्रॉफ़िट आफ्टर टैक्स | EBITDA यानी अर्निंग्स बिफ़ोर इंटरेस्ट, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमोर्टाइज़ेशन | *फ़ाइनेंशियल ईयर 25 Kurlon कंसॉलिडेशन के बाद का पहला पूरा साल था

सुधार कैसे हुआ

मैनेजमेंट ने उलझन के बीच ग्रोथ का रास्ता नहीं खोजा. पहले उलझन को सुलझाया.

35 से ज़्यादा डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर बंद किए गए. कंपनी के अपने स्टोर लगभग 50 से घटाकर 24 कर दिए गए. छह बेकार प्लांट बंद हुए, जिससे कुल प्लांट की संख्या 18 से घटकर 12 हो गई. Kurlon की चार सुविधाओं से फ़ोमिंग ऑपरेशंस को Sheela Foam के अपने प्लांट में शिफ़्ट किया गया, जो प्रेशर-कंट्रोल्ड प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं और फ़ोम की यील्ड को क़रीब 10 प्रतिशत बेहतर बनाते हैं. संयुक्त एंटिटी के स्केल ने मुख्य कच्चे माल पर बेहतर ख़रीद शर्तें भी दिलाईं.

नतीजे अब दिखने लगे हैं. डील पूरी होने पर Kurlon का EBITDA मार्जिन 3.6 प्रतिशत था. अब दोनों मैट्रेस ब्रांड 10.7 प्रतिशत पर चल रहे हैं. अधिग्रहण के बाद के पीक - ₹1,200 करोड़ से ज़्यादा - से कर्ज़ घटकर फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में ₹712 करोड़ रह गया है. आगे इंटरेस्ट कॉस्ट आधी हो जाएगी. फ़ाइनेंशियल ईयर 27 में डेप्रिसिएशन और कम होने की उम्मीद है.

एक अकाउंटिंग बदलाव पर नज़र रखना ज़रूरी है. कंपनी ने यह कहते हुए कि ये मशीनें व्यवहार में अक्सर दो दशकों से ज़्यादा चलती हैं, फ़ोमिंग मशीनों की उपयोगी उम्र 20 साल से बढ़ाकर 40 साल कर दी है और एक्सेलरेटेड डेप्रिसिएशन मेथड को स्ट्रेट-लाइन मेथड से बदल दिया है, जो लागत को एसेट की पूरी उम्र में बराबर फैलाता है. दोनों बदलाव कागज़ पर डेप्रिसिएशन चार्ज को कम करते हैं - लेकिन कंपनी जो कैश असल में जनरेट करती है, उसमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ये क़दम आक्रामक हैं, और ठीक उस वक़्त आए हैं जब कंपनी को अर्निंग्स रिकवरी दिखानी है. फ़ाइनेंशियल ईयर 27 के प्रॉफ़िट नंबर देखते वक़्त पाठकों को यह ध्यान में रखना चाहिए.

आगे ग्रोथ कहां से आएगी

इंटीग्रेशन का सवाल अब सुलझ गया है. अब सवाल ग्रोथ का है.

प्रोडक्शन कैपेसिटी को 2 से 2.5 गुना बढ़ाया जा सकता है - और इसके लिए कोई बड़ी पूंजी नहीं लगानी होगी. इसलिए मुख्य बात मैन्युफ़ैक्चरिंग नहीं, डिस्ट्रीब्यूशन है. कंबाइंड एंटिटी के पास पहले से 550 शहरों में 6,000 से ज़्यादा एक्सक्लूसिव आउटलेट और 10,000 से ज़्यादा मल्टी-ब्रांड आउटलेट हैं. मैनेजमेंट का प्लान है कि हर स्टोर के लिए करीब ₹6 लाख का सेटअप सपोर्ट देते हुए चार सालों में फ़्रैंचाइज़ मॉडल के ज़रिए एक्सक्लूसिव नेटवर्क को 10,000 स्टोर तक ले जाएं. यह विस्तार डिज़ाइन से ही कैपिटल-लाइट है.

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इस प्लान में वॉल्यूम का सबसे बड़ा कारण ग्रामीण भारत है. कंपनी के ₹10,000 से कम के ब्रांड पारंपरिक कॉटन मैट्रेस के इस्तेमाल करने वालों को पहली बार ब्रांडेड खरीदारों में बदल रहे हैं - और 8,400 से ज़्यादा डीलर्स का नेटवर्क पहले से तैयार है. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में मैट्रेस वॉल्यूम 12 प्रतिशत बढ़ा. वैल्यू ग्रोथ थोड़ी कम - 10 प्रतिशत - रही, क्योंकि ऑनलाइन और ग्रामीण चैनल में मैट्रेस की क़ीमत लगभग ₹10,000 है, जबकि फ़िज़िकल स्टोर में यह ₹15,000 के करीब है - जिससे एवरेज सेलिंग प्राइस नीचे खिंचती है.

यही इस ग्रोथ स्टोरी की मुख्य चिंता है. रेवेन्यू को लगातार बढ़ाने के लिए 10,000 स्टोर का फ़िज़िकल विस्तार रुकना नहीं चाहिए. सिर्फ़ कम क़ीमत वाले चैनलों में वॉल्यूम बढ़ने से काम नहीं चलेगा. मैनेजमेंट का 12-14 प्रतिशत रेवेन्यू ग्रोथ का गाइडेंस और फ़ाइनेंशियल ईयर 28 तक 15 प्रतिशत EBITDA मार्जिन का रास्ता - यह सब तभी संभव है जब ग्रामीण क्षेत्रों पर जोर के साथ-साथ ऊंची वैल्यू वाला फ़िज़िकल चैनल भी बढ़े. कॉस्ट बेस अब काफ़ी हद तक फ़िक्स्ड है, इसलिए अतिरिक्त रेवेन्यू का ज़्यादातर हिस्सा बॉटम लाइन तक पहुंचना चाहिए - लेकिन यह तभी होगा जब दोनों चैनल डिलीवर करें.

बाक़ी कारोबार

बढ़ती हिस्सेदारी

Sheela Foam के रेवेन्यू में फ़ोम और मैट्रेस का दबदबा

रेवेन्यू (₹ करोड़)
FY21 FY22 FY23 FY24 FY25 FY26
मैट्रेस 711 829 874 1,053 1,377 1,497
फ़ोम 944 1,246 1,167 1,190 1,189 1,352
इंटरनेशनल 749 860 833 736 737 813
 

इंडस्ट्रियल फ़ोम का कारोबार - जो मैट्रेस जितना चर्चित नहीं है - ऑटोमोबाइल मैन्युफ़ैक्चरर्स और रेलवे को रिकरिंग कॉन्ट्रैक्ट पर स्पेशलाइज़्ड फ़ोम सप्लाई करता है. यह नए इस्तेमाल के क्षेत्रों में आगे बढ़ी है, जिनमें एविएशन इंसुलेशन, सेरामिक फ़िल्टर, जनरेटर के लिए ऑकूस्टिक सॉल्यूशंस, फुटवेयर इनसोल शामिल हैं. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में B2B वॉल्यूम 18 प्रतिशत बढ़ा क्योंकि ये वर्टिकल्स रफ़्तार पकड़ रहे हैं.

इंटरनेशनल रेवेन्यू सपाट दिखता है, लेकिन यह काफ़ी हद तक क़ीमतों का असर है. कच्चे माल की लागत गिरने से नतीजों पर दबाव बढ़ गया, जबकि वॉल्यूम बढ़ा. ऑस्ट्रेलिया मैच्योर बाज़ार है - वहां ग्रोथ नहीं, कैश मैनेज करना मकसद है. स्पेन सिर्फ़ एक महत्वाकांक्षा है: यूरोप के बड़े बाज़ार में एक छोटा खिलाड़ी, जिसने हाल ही में अपनी क्षमता बढ़ाई है और अब “बेड-इन-अ-बॉक्स” रणनीति के साथ अमेरिकी बाज़ार पर नज़र रखी है. लेकिन इन दोनों में से किसी एक बाज़ार पर ही पूरी ग्रोथ स्टोरी टिकी हुई नहीं है.

शेयर किस क़ीमत को दर्शाता है

जोख़िम असली हैं. कच्चे माल की लागत अस्थिर बनी हुई है. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 की तीसरी तिमाही में GNFC के TDI प्लांट के अचानक बंद होने से Sheela Foam को फ़ेस्टिव सीज़न -सबसे बुरे मौके पर- के दौरान ऊंचे दाम पर कच्चा माल ख़रीदना पड़ा. Wakefit, The Sleep Company और Duroflex की ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा तेज़ बनी हुई है. बाज़ार हिस्सेदारी बचाने के लिए कंपनी ने SleepX ब्रांड के ज़रिए डिस्काउंट-आधारित रणनीति अपनाई थी - वह नाकाम रही. Sleepwell का सीधा डिजिटल पुश शुरुआती संकेत दे रहा है, लेकिन अभी यह शुरुआत ही है.

40 गुनी ट्रेलिंग अर्निंग्स पर शेयर सस्ता नहीं दिखता. लेकिन ट्रेलिंग अर्निंग्स यहां सही पैमाना नहीं है. यह उस बैलेंस शीट पर टिकी है जो अभी भी अधिग्रहण की उन लागतों का बोझ उठाए है जो पहले ही झेल ली गई हैं. कैश EPS - जो नॉन-कैश चार्ज को छोड़कर देखता है - ₹14.6 के मुक़ाबले ₹29.1 है, यानी शेयर उस रक़म के क़रीब 20 गुने पर है जो कारोबार असल में कैश में जनरेट करता है.

पिछले एक दशक में Sheela Foam का रेवेन्यू 9 प्रतिशत सालाना बढ़ा, जबकि मुनाफ़ा सिर्फ़ 4 प्रतिशत. इस अंतर का कुछ हिस्सा स्ट्रक्चरल है - फ़ोम बिज़नेस स्वभाव से सीमित मार्जिन पर चलता है, और रोज़ बदलने वाली इनपुट लागत हमेशा दबाव के दौर लाती रहेगी. लेकिन इस अंतर का एक बड़ा हिस्सा अधिग्रहण था. वह अध्याय बंद हो गया है.

कारोबार उलझन से बाहर आ गया है. मार्जिन वापस आ गए हैं. कर्ज़ घट रहा है. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 इसका सबूत है. यहां रीरेटिंग का तर्क यह नहीं है कि बाज़ार उन्हीं अर्निंग्स पर ऊंचा मल्टीपल दे. बात सीधी है - अर्निंग्स को बस वहां पहुंचना है जहां कारोबार पहले से पहुंच चुका है.

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