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सारांशः Whirlpool of India और KEC International लगभग बराबर गिरे. एक में म्यूचुअल फ़ंड्स ने नया पैसा लगाया, तो दूसरे को बाहर का रास्ता दिखा दिया. अगर फ़ंड मैनेजर गिरावट का साइज़ नहीं देख रहे, तो कुछ और देख रहे हैं. सवाल ये है कि क्या आप भी वही देख रहे हैं?
Whirlpool of India और KEC International, दोनों ही अपने तीन साल के ऊंचे स्तर से क़रीब 70 प्रतिशत टूट चुके हैं. नुक़सान लगभग एक जैसा. फिर भी, जैसे-जैसे क़ीमत फिसली, म्यूचुअल फ़ंड्स चुपचाप Whirlpool में हिस्सेदारी बढ़ाते रहे और KEC से निकलते रहे. गिरावट एक जैसी, लेकिन फ़ैसला बिल्कुल उलटा.
यही फ़र्क़ असल बात है. चार्ट पर क्रैश एक ही चीज़ जैसा दिखता है: सेल पर लगा स्टॉक. लेकिन गिरावट का साइज़ इस बारे में लगभग कुछ नहीं बताता कि कम क़ीमत पर वो बिज़नेस ख़रीदने लायक़ है या नहीं. तो असल में क्या बताता है, ये समझने के लिए हमने देखा कि बाज़ार के सबसे बुरी तरह टूटे स्टॉक्स के साथ फ़ंड्स ने क्या किया, तिमाही दर तिमाही, जैसे-जैसे क़ीमत नीचे आई.
हमने इन्हें कैसे चुना
- हमने शुरुआत ₹5,000 करोड़ से ज़्यादा मार्केट कैप वाली सभी लिस्टेड कंपनियों से की.
- इनमें से हमने वो कंपनियां रखीं जो पिछले तीन साल के अपने सबसे ऊंचे भाव से 66 प्रतिशत या उससे ज़्यादा गिर चुकी थीं, यानी जिनकी वैल्यू का दो-तिहाई या उससे ज़्यादा हिस्सा साफ़ हो चुका था.
- हर कंपनी के लिए हमने वो तिमाही ली जो क़ीमत के पीक पर पहुंचने से ठीक पहले की थी और उस वक़्त की कुल म्यूचुअल फ़ंड हिस्सेदारी की तुलना जून 2026 की हिस्सेदारी से की, जो उपलब्ध सबसे ताज़ा तिमाही है.
- फिर हमने इस बदलाव के आधार पर उनकी रैंकिंग की. फ़ंड हिस्सेदारी में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी वाले पांच स्टॉक पहली लिस्ट में हैं. सबसे ज़्यादा गिरावट वाले पांच दूसरी लिस्ट में.
- इसके अलावा, मंथली स्कीम-लेवल डेटा के ज़रिए हमने गिना कि पीक के वक़्त कितने एक्टिव इक्विटी फ़ंड्स के पास हर स्टॉक था और अगस्त 2026 में कितनों के पास अब भी है.
म्यूचुअल फ़ंड्स के पास अब इन पांचों में गिरावट से पहले के मुक़ाबले ज़्यादा हिस्सेदारी है. Sonata इसकी सबसे साफ़ मिसाल है. गिरावट से पहले फ़ंड्स के पास कंपनी का क़रीब छठा हिस्सा (16.6 प्रतिशत) था और अब लगभग एक-चौथाई (24.0 प्रतिशत) है.
वो स्टॉक, जिनमें फ़ंड्स ने पैसा लगाया
टॉप 5 स्टॉक, जिनमें फ़ंड्स की हिस्सेदारी बढ़ी
| कंपनी | 3 साल के हाई से गिरावट (%) | क्वालिटी स्कोर | म्यूचुअल फ़ंड हिस्सेदारी पहले (%) | म्यूचुअल फ़ंड हिस्सेदारी अब (%) | हिस्सेदारी में बदलाव (%) | तब एक्टिव फ़ंड्स | अब एक्टिव फ़ंड्स |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| Sonata Software | -68.3 | 5 | 16.6 | 24 | 7.5 | 27 | 14 |
| Cohance Lifesciences | -68.3 | 6 | 14.1 | 18.2 | 4.1 | 44 | 33 |
| Whirlpool Of India | -69.9 | 6 | 29 | 31.8 | 2.8 | 59 | 34 |
| Birlasoft | -67.4 | 9 | 18.1 | 20.8 | 2.7 | 44 | 18 |
| KPIT Technologies | -71.2 | 9 | 9.9 | 11.9 | 2 | 43 | 22 |
| फ़ंड हिस्सेदारी में बदलाव, स्टॉक के तीन साल के हाई से पहले वाली तिमाही और जून 2026 की तुलना पर आधारित है. इसमें सिर्फ़ ₹5,000 करोड़ से ज़्यादा मार्केट कैप वाली और हाई से कम से कम 66 प्रतिशत गिरी कंपनियां शामिल हैं. फ़ंड्स की गिनती में सिर्फ़ एक्टिव इक्विटी फ़ंड्स शामिल हैं | |||||||
वो स्टॉक, जिनसे फ़ंड्स ने मुंह मोड़ लिया
टॉप 5 स्टॉक, जिनमें फ़ंड्स ने अपनी हिस्सेदारी घटाई
| कंपनी | 3 साल के हाई से गिरावट (%) | क्वालिटी स्कोर | म्यूचुअल फ़ंड हिस्सेदारी पहले (%) | म्यूचुअल फ़ंड हिस्सेदारी अब (%) | हिस्सेदारी में बदलाव (%) | तब एक्टिव फ़ंड्स | अब एक्टिव फ़ंड्स |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| Zee Entertainment Enterprises | -73.2 | 1 | 32.5 | 3.2 | -29.3 | 68 | 3 |
| KEC International | -69.5 | 1 | 24.3 | 20.7 | -3.5 | 54 | 26 |
| Shakti Pumps (India) | -67 | 5 | 5.1 | 2.3 | -2.8 | 9 | 11 |
| Jyothy Labs | -67.3 | 10 | 13.8 | 12 | -1.7 | 40 | 17 |
| Ircon International | -69 | 1 | 1.7 | 0.3 | -1.4 | 11 | 0 |
| फ़ंड हिस्सेदारी में बदलाव, स्टॉक के तीन साल के हाई से पहले वाली तिमाही और जून 2026 की तुलना पर आधारित है. इसमें सिर्फ़ ₹5,000 करोड़ से ज़्यादा मार्केट कैप वाली और हाई से कम से कम 66 प्रतिशत गिरी कंपनियां शामिल हैं. फ़ंड्स की गिनती में सिर्फ़ एक्टिव इक्विटी फ़ंड्स शामिल हैं | |||||||
Zee Entertainment का मामला सबसे अलग है. फ़ंड्स के पास कंपनी का एक-तिहाई (32.5 प्रतिशत) हिस्सा था. अब उनके पास क़रीब 30वां हिस्सा (3.2 प्रतिशत) बचा है और सिर्फ़ तीन स्कीमों के पास ही ये स्टॉक है. Ircon International अपने तरीक़े से और भी चौंकाने वाला है: लगभग कुछ नहीं बचा और एक भी एक्टिव इक्विटी फ़ंड के पास ये स्टॉक नहीं है.
दोनों कॉलम साथ पढ़िए
फ़ंड्स की गिनती पर नज़र डालिए, तो एक अजीब बात दिखती है. ये गिनती लगभग हर जगह घटी है, उस लिस्ट में भी जहां फ़ंड्स कुल मिलाकर ख़रीदार थे. Sonata के होल्डर 27 से घटकर 14 रह गए. Birlasoft के 44 से 18. Whirlpool के 59 से 34.
यानी ज़्यादातर फ़ंड्स इन स्टॉक्स से भी निकल गए. फ़र्क़ इस बात का है कि जो टिके रहे, या जो नए आए, उन्होंने अपने पैसे के साथ क्या किया.
दोनों बातें एक साथ सच हैं और मिलकर एक काम की बात बताती हैं. ख़रीदारी कम हाथों में सिमटी थी, पर वो हाथ बड़े थे. जाने वाले फ़ंड्स ने जो भी बेचा, टिके रहने वालों या नए आने वालों ने उससे ज़्यादा ख़रीद लिया. घटती तादाद वाले मालिकों का किसी कंपनी में बड़ा हिस्सा लेना, भीड़ के धीरे-धीरे आने से बिल्कुल अलग संकेत है.
दूसरी लिस्ट सीधी है. दोनों आंकड़े एक ही दिशा में चलते हैं. कम फ़ंड्स के पास ये स्टॉक हैं, और जो बचे हैं उनकी हिस्सेदारी भी कम है. Shakti Pumps अकेला अपवाद है: इसे रखने वाले फ़ंड्स की गिनती 9 से बढ़कर 11 हो गई, फिर भी हिस्सेदारी घट गई. फ़ंड्स ज़्यादा, पर हर एक के पास कम.
सबक़ ये है कि फ़ंड्स गिनना और हिस्सेदारी नापना, दो अलग सवालों के जवाब देते हैं. किसी स्टॉक के होल्डर बढ़ सकते हैं और उसी वक़्त उस पर भरोसा घट सकता है.
दोनों ग्रुप कैसे अलग हैं
गिरावट से कुछ पता नहीं चलता. दोनों लिस्ट 67 से 73 प्रतिशत के बीच हैं. असली कहानी बिज़नेस बताते हैं.
Value Research क्वालिटी स्कोर किसी कंपनी को उसके वित्तीय आंकड़ों की मज़बूती और निरंतरता के आधार पर ग्रेड देता है, 1 (सबसे कमज़ोर) से लेकर 10 (सबसे मज़बूत) तक. जिन स्टॉक्स में फ़ंड्स ने पैसा लगाया, उनका आम स्कोर 6 है. जिन्हें छोड़ा, उनका आम स्कोर 1 है और उन पांच में से तीन सबसे निचले ग्रेड पर हैं.
जो एक अपवाद दिखता है, वो भी यही बात साबित करता है. बेचने वाली लिस्ट में Jyothy Labs अकेला मज़बूत बिज़नेस है, 10 के स्कोर के साथ और यही वो स्टॉक है जिसके साथ फ़ंड्स ज़्यादातर टिके रहे: उनके पास अब भी इसकी क़रीब 12 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो पहले की 13.8 प्रतिशत से मामूली ही कम है. थोक में निकासी, जैसे Zee में 3.2 प्रतिशत तक और Ircon में लगभग शून्य तक, सिर्फ़ सबसे निचले ग्रेड वाले नामों में हुई.
बुरी तरह पिटा होना और सस्ता होना, एक बात नहीं है. क़ीमत बस इतना बताती है कि स्टॉक पहले से कम भाव पर मिल रहा है. फ़ंड्स जिस बात को तौलते दिख रहे हैं, वो ये है कि नई क़ीमत पर क्या वो बिज़नेस रखने लायक़ है और इसी सवाल पर दोनों लिस्ट की राहें अलग हो जाती हैं.
आपके लिए सबक़
70 प्रतिशत की गिरावट अपने आप में कोई जानकारी नहीं है. ये बताती है कि क्या हो चुका है, ये नहीं कि अब आपके हाथ में क्या है.
बराबर गिरे दो स्टॉक पूरी तरह अलग सौदे हो सकते हैं, और ये फ़र्क़ चार्ट में नहीं, कंपनी के खातों में छिपा होता है. किसी पिटे हुए स्टॉक को सस्ता मानने से पहले ख़ुद से पूछिए कि क़ीमत आपको क्या नहीं बता सकती. क्या बिज़नेस अपने लगाए गए पैसे पर ठीक-ठाक रिटर्न कमाता है? क्या वो अपने मौजूदा कर्ज़ के साथ दो बुरे साल झेल सकता है? क्या पहले की तेज़ी मुनाफ़े पर टिकी थी या ऑर्डर बुक और एक अच्छी कहानी पर?
अगर कहानी पर टिकी थी, तो ये गिरावट शायद मौक़ा न हो. हो सकता है ये बस हक़ीक़त का सामने आना हो.
अगली बार जब आपकी वॉचलिस्ट का कोई स्टॉक दो-तिहाई गिर जाए, तो उसे सस्ता सौदा मानने से पहले ये टेस्ट ज़रूर कर लीजिए. पहले उसका क्वालिटी स्कोर और पिछले दो साल के खाते देखिए. क़ीमत को बताने दीजिए कि स्टॉक सस्ता हुआ है. बिज़नेस को बताने दीजिए कि ये सस्तापन ख़रीदने लायक़ है या नहीं.
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