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इक्विटी फ़ंडः 2026 में सबसे ज़्यादा नुक़सान में रहीं ये 5 कैटेगरी, क्या यह रिव्यू का समय है?

2026 की गिरावट को देखकर घबराने की ज़रूरत नहीं है

2026 की गिरावट को देखकर घबराने की ज़रूरत नहीं है Abhijeet Pandey/AI Generated Image

सारांशः 2026 की शुरुआत से ही वैश्विक माहौल अस्थिर बना हुआ है. अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव और ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने शेयर बाज़ार पर दबाव बनाया है. इसका असर भारतीय बाज़ार पर भी साफ़ दिख रहा है. निवेशकों को क्या करना चाहिए, जानिए इस स्टोरी में.

सेंसेक्स क़रीब 10% और निफ़्टी लगभग 11% तक गिर चुके हैं. ऐसे माहौल में इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में तेज़ गिरावट देखने को मिली है. हालांकि, ख़ास तौर पर थीमैटिक और सेक्टोरल फ़ंड्स में गिरावट कुछ ज़्यादा ही रही है. हम यहां निवेशकों को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने वाली टॉप 5 कैटेगरी की बात कर रहे हैं.

2026 में सबसे ज़्यादा गिरने वाली कैटेगरीज़

(आंकड़े % में हैं)

कैटेगरी इयर-टू-डेट (2026) 1 साल 3 साल 5 साल 10 साल
           
Equity: Sectoral-Technology -17.42 -0.69 7.77 6.88 14.9
Equity: Thematic-Consumption -13.02 -0.14 12.86 12.22 13.71
Equity: Sectoral-Auto & Transportation -12.85 19.61 23.6 16.88 11.92
Equity: Thematic-ESG -11.6 3.05 11.23 9.61 11.85
Equity: Thematic-Innovation -11.53 7.09 14.12 10.24  
नोटः डेटा 7 अप्रैल, 2024 तक का है.

कैटेगरीज़ को समझना ज़रूरी है

1. सेक्टोरल-टेक्नोलॉजी फ़ंड

टेक्नोलॉजी फ़ंड्स मुख्य रूप से IT और डिजिटल कंपनियों में निवेश करते हैं. ये कैटेगरी ग्लोबल डिमांड और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर काफ़ी निर्भर है. 2026 में IT सेक्टर पर दबाव, डॉलर की चाल और ख़र्च में कमी के कारण इन फ़ंड्स में तेज़ गिरावट आई है. ये फ़ंड्स लंबी अवधि में भले ही अच्छे रिटर्न दे चुके हैं, लेकिन इनमें उतार-चढ़ाव भी ज़्यादा होता है.

2. थीमैटिक-कंज़म्प्शन फ़ंड

कंज़म्प्शन थीम वाले फ़ंड FMCG, रिटेल और कंज़्यूमर डिमांड से जुड़ी कंपनियों में निवेश करते हैं. ये भारत की ग्रोथ स्टोरी पर आधारित होते हैं, लेकिन महंगाई और ख़र्च में कमी का असर इन पर जल्दी दिखता है. 2026 में बढ़ती महंगाई और अनिश्चितता के कारण इन फ़ंड्स पर दबाव बना है, हालांकि लॉन्ग-टर्म में इनकी संभावनाएं बनी रहती हैं.

3. सेक्टोरल-ऑटो और ट्रांसपोर्टेशन

ऑटो सेक्टर से जुड़े फ़ंड्स ने पिछले एक से तीन साल की अवधि में दमदार प्रदर्शन किया था, लेकिन 2026 में इन पर भी दबाव दिखा है. कच्चे माल की क़ीमतें, डिमांड में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन के असर से यह कैटेगरी प्रभावित हुई है. हालांकि EV ट्रेंड और भारत की ग्रोथ स्टोरी के चलते लॉन्ग-टर्म में इसमें अवसर बने रह सकते हैं.

4. थीमैटिक-ESG फ़ंड

ESG (Environmental, Social, Governance) फ़ंड्स उन कंपनियों में निवेश करते हैं जो टिकाऊ और जिम्मेदार बिज़नेस प्रैक्टिस अपनाती हैं. ये थीम लंबी अवधि के लिए मजबूत मानी जाती है, लेकिन शॉर्ट-टर्म में इनका प्रदर्शन बाज़ार के मूड पर निर्भर करता है. 2026 की अस्थिरता में ये फ़ंड्स भी दबाव में दिख रहे हैं.

5. थीमैटिक-इनोवेशन फ़ंड

इनोवेशन फ़ंड्स नई टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप और डिसरप्टिव बिज़नेस मॉडल पर फोकस करते हैं. ये हाई-रिस्क और हाई-रिटर्न वाली कैटेगरी होती है. जब बाज़ार में अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक ऐसे सेक्टर से दूरी बनाते हैं, जिससे इन फ़ंड्स में गिरावट आती है. हालांकि लंबी अवधि में ये बड़े अवसर भी दे सकते हैं.

यह भी पढ़ेंः रेगुलर से डायरेक्ट म्यूचुअल फ़ंड प्लान में कैसे स्विच करें

थीमैटिक फ़ंड्स पर क्या है नज़रिया?

ग़ौर करने की बात यह है कि ये पांचों ही थीमैटिक या सेक्टोरल कैटेगरी हैं. ये कैटेगरी साइक्लिकल होती हैं यानी कम समय में दमदार रिटर्न दे सकती हैं तो कई साल तक इनका प्रदर्शन सपाट बना रह सकता है. ये कैटेगरी आम तौर पर सेक्टर के प्रदर्शन पर निर्भर करती हैं.

वैल्यू रिसर्च का मानना है कि:

  • थीमैटिक फ़ंड्स में निवेश सीमित हिस्से (satellite allocation) के रूप में होना चाहिए.
  • ये फ़ंड्स समय के साथ बहुत अच्छा या बहुत ख़राब-दोनों तरह का प्रदर्शन कर सकते हैं
  • इनके लिए टाइमिंग सही होना बेहद मुश्किल होता है

इसलिए, इन्हें पोर्टफ़ोलियो का मुख्य हिस्सा बनाने से बचना चाहिए.

निवेशकों के लिए सलाह

2026 की गिरावट को देखकर घबराने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन रिव्यू ज़रूर करना चाहिए:

  • क्या आपके पोर्टफ़ोलियो में थीमैटिक फ़ंड्स का हिस्सा ज़्यादा तो नहीं?
  • क्या आपका निवेश आपके लक्ष्यों और जोखिम क्षमता के हिसाब से है?
  • क्या आप SIP के ज़रिए लगातार निवेश कर रहे हैं?

आखिरी बात

2026 की यह गिरावट हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि बाज़ार में उतार-चढ़ाव अस्थायी होते हैं, लेकिन निवेश के फ़ैसले अक्सर स्थायी असर डालते हैं. ख़ास तौर पर थीमैटिक और सेक्टोरल फ़ंड्स में गिरावट तेज़ दिखती है, क्योंकि ये सीमित सेक्टर या थीम पर केंद्रित होते हैं.

ऐसे समय में सबसे बड़ी ग़लती होती है-घबराकर फ़ंड्स से बाहर निकल जाना या सिर्फ़ हालिया प्रदर्शन के आधार पर पोर्टफ़ोलियो बदल देना. अगर आपने किसी थीमैटिक फ़ंड में निवेश किया है, तो पहले यह समझें कि आपने उसमें क्यों निवेश किया था-क्या वह लॉन्ग-टर्म थीम अभी भी सही है या नहीं.

साथ ही, यह भी देखें कि आपके पूरे पोर्टफ़ोलियो में इन फ़ंड्स का हिस्सा कितना है. अगर थीमैटिक एक्सपोज़र ज़रूरत से ज़्यादा हो गया है, तो धीरे-धीरे संतुलन बनाना समझदारी हो सकती है, लेकिन अचानक बड़े बदलाव से बचें.

लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए सबसे बेहतर रणनीति वही रहती है- डाइवर्सिफ़िकेशन, अनुशासन और धैर्य.

  • अपने पोर्टफ़ोलियो का समय-समय पर रिव्यू करें
  • SIP को जारी रखें, ताकि गिरावट में भी निवेश होता रहे
  • और सबसे ज़रूरी-ख़बरों के शोर से दूर रहकर सोच-समझकर फ़ैसले लें

आखिरकार, सफल निवेश वही है जो सही समय पर नहीं, बल्कि सही तरीक़े से किया जाए.

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