स्टॉक वायर

HUL एक बेहतरीन बिज़नेस तो है, लेकिन क्या यह एक बेहतरीन स्टॉक भी है?

प्रॉफ़िट हर साल 11 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन स्टॉक ने कुछ और ही क़ीमत तय कर ली है

प्रॉफ़िट हर साल 11 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन स्टॉक ने कुछ और ही क़ीमत तय कर ली हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः HUL एक ऐसा बिज़नेस है जिस पर हम में से ज़्यादातर लोग बिना सोचे भरोसा कर लेते हैं. लेकिन बिज़नेस पर भरोसा करना और स्टॉक के लिए कोई भी क़ीमत चुका देना, ये दो अलग बातें हैं. HUL के अपने आंकड़ों से यह स्टोरी बताती है कि शेयर की सही क़ीमत क्या सकती है.

अपनी रसोई या बाथरूम में नज़र डालिए और आपको शायद हिंदुस्तान यूनिलीवर का Surf, Lux, Dove, Brooke Bond, Horlicks के रूप में कोई न कोई प्रोडक्ट दिख जाएगा. इस बिज़नेस को समझने के लिए आपको एनुअल रिपोर्ट पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. यह बिल्कुल वैसी ही कंपनी है जिसे खोजने की सलाह पीटर लिंच ने निवेशकों को दी थी.

लेकिन किसी कंपनी को अच्छा जानना काम का सिर्फ़ आधा हिस्सा है. दूसरा आधा हिस्सा यह है कि आप उसके लिए क्या क़ीमत चुका रहे हैं.

एक अच्छा बिज़नेस, और एक चेतावनी

दिग्गज निवेशक राकेश झुनझुनवाला ने एक बार बताया था कि HUL जैसी कंपनियां प्रीमियम पर क्यों ट्रेड करती हैं. ज़्यादा पैसे की मांग करने वाले हैवी-इंडस्ट्री बिज़नेस के उलट ये कंपनियां लगातार बढ़ती हैं, अच्छा रिटर्न कमाती हैं और शेयरधारकों को कैश लौटाती हैं.

बाद में उन्होंने इसी HUL का उदाहरण देकर ठीक इसका उल्टा भी समझाया. इसकी क़ीमत इतनी आगे निकल गई कि करीब एक दशक तक स्टॉक टिका ही रहा, जबकि बिज़नेस अच्छा परफ़ॉर्म करता रहा.

दोनों बातें एक साथ सच थीं. एक अच्छे बिज़नेस को प्रीमियम मिलना चाहिए. लेकिन एक अच्छे बिज़नेस की क़ीमत बहुत ज़्यादा भी हो सकती है.

वह गैप, जिसने सारा खेल किया

HUL की कहानी एक लाइन में यह है: लंबे समय में इसका प्रॉफ़िट क़रीब 11 प्रतिशत सालाना की रफ़्तार से बढ़ा. एक मैच्योर कंज़्यूमर कंपनी के लिए यह ठीक-ठाक है, लेकिन कुछ ख़ास असाधारण नहीं.

अब इसी दौर में स्टॉक ने क्या किया, वह देखिए.

प्रॉफ़िट से ज़्यादा बढ़ गई क़ीमत

HUL का शेयर प्राइस 10 साल में अपने प्रॉफ़िट से तेज़ी से बढ़ा

एक दशक में बढ़ोतरी की रफ़्तार
HUL का प्रॉफ़िट लगभग 11% सालाना
HUL का शेयर प्राइस लगभग 17% सालाना

छह पॉइंट का अंतर सुनने में छोटा लगता है. लेकिन ऐसा है नहीं. 10 साल तक कंपाउंड होने के बाद इन अतिरिक्त छह पॉइंट ने उस रिटर्न को क़रीब दोगुना कर दिया, जो सिर्फ़ बिज़नेस से मिलता. और यह कोई इकलौता वाकया नहीं है; यही गैप तब भी दिखता है जब आप पांच साल या 10 साल का आंकड़ा देखें.

यह अतिरिक्त रिटर्न आया कहां से? क़रीब-क़रीब पूरी तरह इस बात से कि निवेशक HUL के हर एक रुपये के प्रॉफ़िट के लिए ज़्यादा से ज़्यादा क़ीमत चुकाते गए. यह बात एक नंबर में दिखती है: P/E रेशियो, यानी प्रॉफ़िट के एक रुपये के लिए आप जो क़ीमत चुकाते हैं.

वैल्यूएशन आसमान पर

2010 से 2021 के बीच HUL का P/E क़रीब तीन गुना हो गया

साल P/E
2010 लगभग 24 गुना
2020-21 लगभग 70 गुना
2026 लगभग 34 गुना

एक दशक में यह मल्टीपल क़रीब तीन गुना हो गया. बिज़नेस बेहतर हुआ, लेकिन उसकी ग्रोथ तीन गुनी नहीं हुई; तीन गुनी हुई तो सिर्फ़ इसके लिए पैसे चुकाने की निवेशकों की इच्छा. यानी ऊपर जाने में ज़्यादातर काम इस री-रेटिंग ने किया, प्रॉफ़िट ग्रोथ ने नहीं.

प्रीमियम जायज़ क्यों है

10 प्रतिशत की हर ग्रोथ एक जैसी नहीं होती. दो कंपनियों की कल्पना करें, दोनों की प्रॉफ़िट ग्रोथ सालाना 10 प्रतिशत है.

पहली कंपनी को दोबारा निवेश करने की ज़रूरत बहुत कम पड़ती है, इसलिए वह अपना ज़्यादातर प्रॉफ़िट आपको लौटा देती है. दूसरी कंपनी को अपनी रफ़्तार बनाए रखने के लिए क़रीब-क़रीब सब कुछ वापस बिज़नेस में लगाना पड़ता है. कागज़ पर ग्रोथ बराबर है, लेकिन आपकी जेब में वैल्यू बहुत अलग है.

HUL पहली तरह की कंपनी है: मज़बूत ब्रांड, स्थिर डिमांड, कम क़र्ज़ और कैश जो वाक़ई हाथ में आता है. निवेशकों का इसके लिए ज़्यादा चुकाना सही है. असली सवाल यह नहीं है कि प्रीमियम चुकाना चाहिए या नहीं; असली सवाल यह है कि कितना प्रीमियम सही ठहरता है.

जब प्रीमियम ही पूरी कहानी बन गया

मुसीबत तब शुरू होती है जब आपका रिटर्न बिज़नेस से आना बंद हो जाता है और इस बात पर टिक जाता है कि अगला ख़रीदार और भी ज़्यादा क़ीमत चुकाएगा या नहीं.

क़रीब 70 के P/E पर HUL लगभग यहीं पहुंच चुका था. नए निवेशक अब सिर्फ़ बेहतरीन ब्रांड के लिए क़ीमत नहीं चुका रहे थे; वे इस बात पर दांव लगा रहे थे कि आगे कोई और उन्हीं प्रॉफ़िट के लिए और भी ज़्यादा चुकाएगा.

आख़िर में यह दांव काम नहीं आया. पिछले पांच साल में स्टॉक कहीं नहीं पहुंचा. दरअसल प्रॉफ़िट बढ़ता रहा, फिर भी स्टॉक थोड़ा फिसल गया. बिज़नेस में कोई ख़राबी नहीं आई; यह अब भी अच्छा कैश जनरेट करता है. वैल्यूएशन बस नीचे आ गई, क़रीब 70 गुना से घटकर लगभग 34 गुना. जो मैकेनिज़्म ऊपर जाते समय रिटर्न को बढ़ा-चढ़ा दिखा रहा था, वही नीचे आते समय उल्टा असर दिखा गया.

तो ऊंचा P/E कब सही ठहरता है?

HUL से मिलने वाला सबक़ यह नहीं है कि "महंगे स्टॉक से दूर रहें". इससे ज़्यादा काम की बात यह है: प्रीमियम कमाया जा सकता है, लेकिन यह अनलिमिटेड नहीं हो सकता. गलती एक अच्छे बिज़नेस के लिए ज़्यादा चुकाने में नहीं है; गलती यह मान लेने में है कि एक बेहतरीन कंपनी कभी ख़राब क़ीमत पर नहीं मिल सकती.

क्वालिटी के लिए ज़्यादा चुकाने से पहले अपने आप से एक सवाल पूछिए: अगर P/E अब कभी नहीं बढ़ता, तो आपका रिटर्न क्या होगा?

आज के मल्टीपल को फ़िक्स मानकर देखिए कि सिर्फ़ प्रॉफ़िट ग्रोथ और डिविडेंड से आपको कितना मिलेगा. अगर स्टॉक सिर्फ़ इस उम्मीद पर अच्छा लग रहा है कि बाद में कोई और ज़्यादा क़ीमत चुकाएगा, तो आप बिज़नेस में निवेश नहीं कर रहे, बस एक री-रेटिंग की उम्मीद लगा रहे हैं.

कुछ और सवाल जो पूछने लायक हैं: यह ग्रोथ कितने समय तक चल सकती है? इसे हासिल करने के लिए कंपनी को कितना कैश ख़र्च करना पड़ता है? आगे मिलने वाला यह प्रॉफ़िट कितना सुरक्षित है?

इन सवालों का जवाब ईमानदारी से दीजिए और क़ीमत आपसे उतनी ही साफ़ बात करेगी, जितना साफ़ आपकी रसोई में रखे ब्रांड के नाम पहले से बता रहे हैं.

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