Ujjal Das/AI-Generated Image
सारांशः ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि टैक्स भरने की डेडलाइन चूकने का मतलब है बस एक छोटा जुर्माना. जुर्माना लग सकता है, पर वो शायद ही सबसे बड़ी क़ीमत होती है. एक अनदेखा नियम आपके टैक्स पर सालों तक असर डाल सकता है. यह कहानी वो बात समझाती है जो कई लोगों को तब पता चलती है, जब बहुत देर हो चुकी होती है.
31 जुलाई की टैक्स डेडलाइन चूकने का नाम आते ही लोगों के मन में सबसे पहले जुर्माना आता है. पर जुर्माना तो छोटी बात है. असली नुक़सान वो है, जिस पर ज़्यादातर लोगों की नज़र ही नहीं पड़ती. अगर आपने इस साल कोई शेयर या म्यूचुअल फ़ंड घाटे में बेचे हैं, तो एक दिन की भी देरी का मतलब है कि आप उस घाटे को आगे के सालों में अपना टैक्स घटाने के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. जुर्माना शायद ₹1,000 हो. पर देर से भरने पर आप जो गंवाते हैं, उसकी क़ीमत इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है.
यह उन लोगों के लिए है जिनकी डेडलाइन 31 जुलाई 2026 है: नौकरीपेशा लोग, पेंशनधारक, और वो सब जो शेयर, म्यूचुअल फ़ंड या प्रॉपर्टी बेचकर कमाते हैं पर कोई कारोबार नहीं चलाते. टैक्स की भाषा में कहें, तो आप ITR-1 या ITR-2 भरते हैं. और अगर आप कोई कारोबार या पेशा चलाते हैं, यानी ITR-3 या ITR-4 भरते हैं, तो आपकी डेडलाइन बाद में आती है, इसलिए यह लेख आपके लिए नहीं है.
शुरू करने से पहले एक छोटी बात. आपने शायद सुना हो कि एक नया इनकम टैक्स एक्ट, 2025 आ गया है. आप अभी जो रिटर्न भर रहे हैं, उसके लिए इससे कुछ नहीं बदलता. इस साल का रिटर्न अब भी पुराने क़ानून, यानी इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के हिसाब से ही चलेगा, और नीचे बताए गए सारे सेक्शन वहीं से आते हैं.
जुर्माना तो छोटा हिस्सा है
सबसे पहले आता है देर से भरने का शुल्क (सेक्शन 234F). देर से भरिए, तो ₹5,000 देना होता है. और अगर आप साल में ₹5 लाख तक कमाते हैं, तो सिर्फ़ ₹1,000. और अगर आपकी कमाई इतनी कम है कि रिटर्न भरना ज़रूरी ही नहीं, तो कुछ भी नहीं देना पड़ता. बस इतना ही है यह शुल्क.
फिर आता है ब्याज, हर महीने 1%, पर सिर्फ़ उस टैक्स पर जो आपने अभी तक चुकाया नहीं है (सेक्शन 234A). अगर आपकी कंपनी ने आपका टैक्स पहले ही काट लिया है, या सरकार पर आपका रिफ़ंड बनता है, तो कोई ब्याज नहीं लगता. और ज़्यादातर नौकरीपेशा लोगों के साथ यही होता है.
इसके बाद, आप बस एक चीज़ गंवाते हैं, और वो है समय. देर से भरे रिटर्न का सीधा मतलब है कि आपका रिफ़ंड आप तक देर से पहुंचेगा.
टैक्स शून्य हो, तब भी जुर्माना लगता है
यहीं पर लोग चूक जाते हैं. नए टैक्स रिजीम में, ₹12 लाख तक कमाने वाले ज़्यादातर लोगों को कोई टैक्स नहीं देना पड़ता, और नौकरीपेशा लोगों को ₹12.75 लाख तक. यह सेक्शन 87A की छूट की वजह से होता है. इसलिए कई लोग सोचते हैं, "मुझे तो कुछ देना ही नहीं है, तो डेडलाइन चूकने से मेरा क्या बिगड़ेगा."
बिगड़ सकता है. टैक्स न बनना और रिटर्न भरने से छूट मिलना, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं. जैसे ही आपकी कमाई ₹4 लाख के पार जाती है, आपको रिटर्न भरना ही होता है, भले ही आख़िर में आपका टैक्स शून्य निकले. यानी ₹9 लाख कमाने वाला कोई व्यक्ति टैक्स तो कुछ नहीं देता, पर उसे रिटर्न फिर भी भरना होगा, और अगर वो देर से भरता है, तो जुर्माना भी देना होगा.
यह भी पढ़ें: क्या घाटे में शेयर बेचने से बच सकता है टैक्स?
वो नुक़सान, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती
मान लीजिए आपने इस साल कुछ शेयर या म्यूचुअल फ़ंड घाटे में बेचे. क़ानून आपको छूट देता है कि उस घाटे को रिकॉर्ड में रखें, और आगे जिस साल मुनाफ़ा हो, उससे अपना टैक्स घटा लें. यह छूट आठ साल तक चलती है. पर इसकी एक शर्त है. यह हक़ आपके पास तभी रहता है जब आप समय पर रिटर्न भरें. देर से भरिए, और यह घाटा मिट जाता है. उसके बाद आप चाहे कितने भी रिटर्न भरें, वो वापस नहीं आता (सेक्शन 80, सेक्शन 139(3) के साथ).
मान लीजिए इस साल आपका घाटा ₹2 लाख है, और अगले साल आपको उतने ही का मुनाफ़ा होता है. समय पर रिटर्न भरा, तो यह घाटा अगले साल के मुनाफ़े पर लगने वाला टैक्स ख़त्म कर देगा. एक दिन देर से भरा, तो नहीं. अगर उस मुनाफ़े पर 20% की दर से टैक्स लगता, तो देर से भरने की क़ीमत हुई पूरे ₹40,000. एक घाटा ऐसा है जो देर से भरे रिटर्न में भी बचा रहता है, वो है किराए पर दिए मकान का घाटा, सेक्शन 71B के तहत. इस साल के घाटे को आप इस साल की अपनी आमदनी के ख़िलाफ़ अब भी इस्तेमाल कर सकते हैं. सिर्फ़ आगे के सालों वाली बचत ही जाती है.
एक और छोटा नुक़सान भी है, जो सिर्फ़ कुछ लोगों पर पड़ता है. कुछ करदाता आज भी पुराने टैक्स रिजीम में कम टैक्स देते हैं, आमतौर पर वो जिनके पास होम लोन है, किराए का दावा है, और टैक्स बचाने वाले बड़े निवेश हैं. आप पुराना रिजीम तभी चुन सकते हैं जब समय पर रिटर्न भरें. डेडलाइन चूकी, तो आपको उस साल के लिए नए रिजीम में डाल दिया जाता है, चाहे वो आपके लिए सही हो या नहीं (सेक्शन 115BAC). ज़्यादातर लोगों के लिए अब नया रिजीम ही बेहतर सौदा है, इसलिए इससे कुछ नहीं बदलता. पर जिन थोड़े से लोगों के पास बड़ी कटौतियां हैं, उन्हें यह ज़रूर खलता है.
यह भी पढ़ें: ITR Filing: आपको टैक्स रिटर्न के लिए कौन सा फॉर्म भरना होगा?
अगर डेडलाइन चूक जाए
अगर आप डेडलाइन चूक भी जाते हैं, तो भी रिटर्न भर सकते हैं. इसके दो तरीक़ों को लेकर लोग उलझ जाते हैं, इसलिए यहां बताया गया है कि हर एक किस काम का है.
|
तरीक़ा
|
आख़िरी तारीख़ | क़ीमत | पेच |
| बिलेटेड रिटर्न, डेडलाइन के बाद भरा गया (सेक्शन 139(4)) | 31 दिसंबर 2026 | जुर्माना, और टैक्स बकाया हो तो ब्याज भी | आगे के लिए बचाया गया घाटा और पुराना रिजीम, दोनों फिर भी चले जाते हैं |
| रिवाइज़्ड रिटर्न, पहले भरे रिटर्न को सुधारने के लिए (सेक्शन 139(5)) | 31 दिसंबर 2026 तक मुफ़्त; 31 मार्च 2027 तक शुल्क के साथ | 31 दिसंबर 2026 तक मुफ़्त. उसके बाद ₹5,000, या ₹5 लाख तक कमाने पर ₹1,000 (सेक्शन 234I). ब्याज सिर्फ़ उस अतिरिक्त टैक्स पर जो सुधार से बढ़े. | अगर आपने पहले रिटर्न भरा ही नहीं, तो यह किसी काम का नहीं |
अगर 31 जुलाई निकल जाए, तो जितनी जल्दी हो सके बिलेटेड रिटर्न भर दीजिए, और 31 दिसंबर से पहले हर हाल में. इससे ब्याज बढ़ना रुक जाता है और आपका रिकॉर्ड साफ़ रहता है. 31 दिसंबर भी चूक गए, तो एक आख़िरी विकल्प बचता है, अपडेटेड रिटर्न, पर यह आपको सिर्फ़ ज़्यादा टैक्स भरने देता है, कभी कम नहीं. न यह आपको रिफ़ंड दिला सकता है, न खोया हुआ घाटा वापस ला सकता है.
अब क्या करें
अगर आपकी डेडलाइन 31 जुलाई है, तो आख़िरी शाम का इंतज़ार मत कीजिए, अभी भर दीजिए. और अगर इस साल आपको घाटा हुआ है, तो तारीख़ को लेकर ख़ास सावधान रहिए, क्योंकि वो घाटा ही एक ऐसी चीज़ है जिसे आप बाद में वापस नहीं पा सकते.
यह भी पढ़ें: सालाना ₹50 लाख से कम है कमाई, तो जानें कौन सा ITR फॉर्म आपके लिए सही है
ये लेख पहली बार जुलाई 24, 2026 को पब्लिश हुआ.






