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सारांशः सालों तक, वेल्थ वॉल के उस पार मौजूद प्रोडक्ट्स को खरीदने के लिए ₹50 लाख चाहिए होते थे, तब जाकर वो आपकी बात सुनते थे. अब SEBI ने उसी दीवार में ₹10 लाख पर एक दरवाज़ा बना दिया है. एक बार जब आप अंदर झांक सकते हैं, तो यह पूछना लाज़िमी हो जाता है कि आख़िर उस दीवार के पीछे इतना ख़ास था ही क्या.
जब से यह मैगज़ीन छपनी शुरू हुई है, तब से एक ऐसी इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स की क्लास रही है जिसे हमारे ज़्यादातर पाठक कभी ख़रीद ही नहीं पाए. पोर्टफ़ोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज़ (PMS) में एंट्री के लिए ₹50 लाख चाहिए होते थे, तब जाकर वो आपकी बात सुनते थे, और कैटेगरी III अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फ़ंड (AIF) की न्यूनतम रक़म पूरी एक करोड़ रुपये थी. ये प्रोडक्ट्स अमीरों के लिए बनाए गए थे और इनका आकर्षण काफ़ी हद तक इसी बात में था कि हर कोई इन तक नहीं पहुंच सकता था. जो गेट ज़्यादातर लोगों को बाहर रखता है, वो हमारे मन में एक ख़ास तरह का असर छोड़ता है, यह अहसास कि दूसरी तरफ़ कुछ क़ीमती है और जो लोग वहां तक पहुंच गए हैं, वो कुछ ऐसा जानते हैं जो बाक़ी हम नहीं जानते.
इस महीने की कवर स्टोरी स्पेशलाइज़्ड इन्वेस्टमेंट फ़ंड यानी SIF पर है, जिसकी एंट्री SEBI ने ₹10 लाख पर तय की है, यानी ऊपर वाले प्रोडक्ट्स की मांग का 10वां हिस्सा. SIF की ज़्यादातर कवरेज इसे अपने आप में परखती है, जैसा हमारी कवर स्टोरी भी करती है. लेकिन मुझे लगता है कि SIF को पढ़ने का ज़्यादा काम का तरीक़ा यह है कि इसे उस दरवाज़े की तरह देखा जाए जो SEBI ने उस दीवार में बनाया है जहां पहले कोई दरवाज़ा था ही नहीं, क्योंकि एक बार जब आप उस कमरे के अंदर झांक सकते हैं, तो यह पूछना ज़रूरी हो जाता है कि आख़िर उसमें इतना ख़ास क्या था.
असल जवाब यह है कि उसमें उतना कुछ नहीं है जितनी एंट्री की क़ीमत जताती थी. अमीरों के लिए बने प्रोडक्ट्स आमतौर पर ऐसी फ़ीस लेते हैं जिन पर कोई रेगुलेटरी सीमा नहीं होती और अच्छे साल में मुनाफ़े का हिस्सा भी अलग से वसूलते हैं. टैक्स के मामले में भी इन पर सबसे सख़्त बर्ताव होता है, क्योंकि यहां आपको हर बार टैक्स देना पड़ता है जब मैनेजर कुछ करता है, न कि तब जब आप म्यूचुअल फ़ंड की तरह यूनिट बेचते हैं. लीवरेज बढ़ते बाज़ार में इनके ब्रोशर के लिए अच्छा दिखता है, लेकिन गिरते बाज़ार में आपके पोर्टफ़ोलियो अकाउंट के लिए नुक़सानदेह साबित होता है. मेरे लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि इनका रिकॉर्ड, हज़ारों म्यूचुअल फ़ंड NAV की तरह नहीं है जिन्हें कोई भी जांच सकता है, बल्कि यह सिर्फ़ इनके अपने स्टेटमेंट पर टिका होता है, जिसके पीछे कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं होता.
इस प्रोडक्ट को यह कहकर पर्सनलाइज़ेशन के नाम पर बेचा जाता है कि आपके लिए अलग से पोर्टफ़ोलियो बनाया गया है, लेकिन यह सिर्फ़ एक कहानी है. SEBI की अपनी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट भी यही कहती है: एक मैनेजर हर क्लाइंट के लिए अलग पोर्टफ़ोलियो नहीं चला सकता, इसलिए PMS एक मॉडल पोर्टफ़ोलियो बनाकर उसे सभी क्लाइंट्स पर लागू करता है और अलग-अलग अकाउंट में बस मामूली फ़र्क़ होता है. एक और बात जानने लायक़ है, जो किसी मैनुअल से नहीं बल्कि इस बात से पता चलती है कि इन प्रोडक्ट्स को कैसे रेगुलेट किया जाता है: किसी AMC के बेहतर फ़ंड मैनेजर आमतौर पर उसके म्यूचुअल फ़ंड में ही रहते हैं, PMS में नहीं, क्योंकि फ़ंड्स पर सबसे सख़्त डिस्क्लोज़र और सबसे ज़्यादा निगरानी होती है.
हालांकि, मुझे यह सब किसी स्कैंडल जैसा नहीं लगता, क्योंकि यह है भी नहीं. जब किसी चीज़ की कमी को क़ीमत में बदला जा सकता है, तो ऐसा ही होता है. SEBI का कहना है कि हेज्ड और कन्संट्रेटेड स्ट्रैटेजी की मांग निवेशकों को ज़्यादा जोख़िम भरे और कम पारदर्शी विकल्पों की तरफ़ धकेल रही थी और फ़ंड डिसिप्लिन के तहत एक रेगुलेटेड सिस्टम इसे बेहतर तरीक़े से पूरा कर सकता है. यही वो अपवाद है जिसे सामान्य नियम में जगह दी जानी चाहिए. दीवार के पीछे जो असल में क़ीमती चीज़ थी, वो एक्सक्लूसिविटी या लीवरेज नहीं थी, बल्कि सही निगरानी के तहत हेज और शॉर्ट करने की क्षमता थी, और SIF यही देता है.
इससे पाठक के सामने एक साफ़ सवाल रह जाता है, जो मार्केटिंग करने वालों को शायद पसंद न आए. अगर आप इन स्ट्रैटेजी की तरफ़ इसलिए आकर्षित हुए थे क्योंकि वो निवेशकों के किसी ज़्यादा ख़ास तबके से जुड़ी लगती थीं, तो यह इच्छा उस तबके को लेकर थी, रिटर्न को लेकर नहीं. लेकिन अगर आप इनकी तरफ़ इसलिए खिंचे थे क्योंकि आपको किसी हेज्ड, डिसिप्लिन्ड स्ट्रैटेजी की ज़रूरत है जो आपके मौजूदा फ़ंड पूरी नहीं कर पाते, तो अब SIF आपको पुरानी क़ीमत के एक छोटे से हिस्से में वो रास्ता देता है, और यह वाक़ई एक अच्छा बदलाव है. इन दोनों वजहों का फ़र्क़ ही असल में पूरा फ़ैसला है. अब दीवार में दरवाज़ा खुल चुका है और एक बार जब आप दीवार की तारीफ़ करना बंद कर देते हैं, तो उसके पीछे जो कुछ भी है, वो बस एक ऐसा टूल है जिसकी ज़रूरत कुछ पोर्टफ़ोलियो को है, ज़्यादातर को नहीं. निष्कर्ष साफ़ है.
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