Kamal Kant/AI-generated
सारांशः मान लीजिए, आपने अमेरिकी शेयरों में निवेश करने वाला एक ETF ख़रीदा. लेकिन आपने जो क़ीमत चुकाई, उसका पूरा पैसा उन शेयरों की क़ीमत के लिए नहीं है. एक हिस्सा ETF की NAV है और बाक़ी बाज़ार में चल रहा प्रीमियम. ये न कोई फ़ीस है, न स्प्रेड और न ही फ़ंड हाउस का कोई अलग चार्ज. इस फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है, क्योंकि तभी पता चलेगा कि आप असल में किस चीज़ के लिए पैसा दे रहे हैं.
4 सितंबर से 9 सितंबर के बीच Nasdaq Q-50 इंडेक्स क़रीब 2.6 फ़ीसदी गिरा. लेकिन उन्हीं 50 कंपनियों में निवेश करने वाला Motilal Oswal Nasdaq Q50 ETF इस दौरान क़रीब 50 फ़ीसदी चढ़ गया.
अंदर के शेयर नहीं चढ़े. फिर ETF इतना कैसे चढ़ गया?
ETF की दो क़ीमतें होती हैं. पहली NAV, यानी उसकी एक यूनिट के पीछे मौजूद निवेश की असली वैल्यू. दूसरी मार्केट प्राइस, यानी शेयर बाज़ार में उस यूनिट को ख़रीदार कितनी क़ीमत देने को तैयार है. आम तौर पर दोनों क़ीमतें आसपास रहती हैं. अगर मार्केट प्राइस NAV से बहुत ऊपर चला जाए, तो मार्केट मेकर फ़ंड हाउस से NAV के आसपास नई यूनिट लेकर उन्हें बाज़ार में बेच सकते हैं. इससे यूनिट की सप्लाई बढ़ती है और मार्केट प्राइस वापस NAV के क़रीब आने लगता है.
लेकिन Q50 ETF में फ़िलहाल ये रास्ता बंद है. भारतीय म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री विदेशी शेयरों और दूसरी विदेशी सिक्योरिटीज़ में निवेश की $7 अरब की कुल सीमा पहले ही छू चुकी है. इसलिए Motilal Oswal इस ETF की नई यूनिट नहीं बना पा रहा. विदेशी ETF में निवेश के लिए अलग $1 अरब की सीमा भी लगभग भर चुकी है और SEBI ने 1 अप्रैल 2024 से ऐसे निवेश के लिए नई सब्सक्रिप्शन रोकने को कहा था. इसके चलते विदेश में निवेश करने वाले कई फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स में भी नया निवेश बंद है. अब Q50 की पुरानी यूनिट ही बाज़ार में हैं, जबकि ख़रीदार आते जा रहे हैं. ऊपर से लगातार चढ़ती क़ीमत देखकर सिर्फ़ तेज़ी के पीछे भागने वाले ख़रीदार भी जुड़ जाते हैं. यूनिट कम हैं और ख़रीदार ज़्यादा. इसलिए मार्केट प्राइस NAV से ऊपर चला जाता है. इसी फ़र्क़ को प्रीमियम कहते हैं. आसान भाषा में कहें, तो ये रिटर्न नहीं है. ये यूनिट की कमी के लिए चुकाई जा रही अतिरिक्त क़ीमत है.
पिछले एक साल के ज़्यादातर समय में ये प्रीमियम क़रीब 20 फ़ीसदी के आसपास रहा. लेकिन सिर्फ़ तीन दिनों में ये लगभग चार गुना हो गया.
एक नियम, जो अनजाने में सीमा बन गया
पिछले चार साल तक ETF का रोज़ का प्राइस बैंड दो दिन पहले की NAV के आधार पर तय होता था और क़ीमत इससे 20 फ़ीसदी ऊपर या नीचे तक जा सकती थी. Q50 जैसे ETF के लिए ये नियम अनजाने में प्रीमियम पर भी एक सीमा की तरह काम कर रहा था. यानी ETF अपनी असली वैल्यू से बहुत ज़्यादा ऊपर जाकर बंद नहीं हो पाता था. जनवरी से अगस्त के बीच Q50 का प्रीमियम 17 से 23 फ़ीसदी के बीच रहा और इससे बहुत आगे नहीं निकला.
7 सितंबर से SEBI का नया नियम लागू हुआ. अब ETF के प्राइस बैंड का आधार पिछले कारोबारी दिन का क्लोज़िंग प्राइस है. इसे पिछले दिन के आख़िरी 30 मिनट के औसत कारोबारी भाव से तय किया जाता है. इक्विटी ETF के लिए शुरुआत में क़ीमत 10 फ़ीसदी ऊपर या नीचे जा सकती है और कूलिंग-ऑफ़ पीरियड के बाद ये सीमा 20 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है. जिन ETF में नई यूनिट आसानी से बन सकती हैं, वहां इससे बड़ी परेशानी नहीं है. लेकिन Q50 में पिछले दिन की क़ीमत में पहले से प्रीमियम शामिल है. इसलिए अगले दिन की सीमा भी उसी बढ़ी हुई क़ीमत से शुरू होती है. यानी एक दिन का प्रीमियम अगले दिन और बढ़ने की गुंजाइश बना देता है.
और हुआ भी यही. 7 सितंबर को Q50 ETF 15.6 फ़ीसदी चढ़ा. उस दिन अमेरिकी बाज़ार बंद था और उसकी NAV लगभग नहीं बदली. अगले दिन ETF 19.3 फ़ीसदी और फिर 8.8 फ़ीसदी चढ़ा. इस दौरान NAV के ऊपर मिलने वाला प्रीमियम 19.5 फ़ीसदी से बढ़कर 81 फ़ीसदी हो गया.
9 सितंबर को Motilal Oswal और Mirae Asset, दोनों ने इस बारे में नोट जारी किए. Mirae Asset ने निवेशकों को सावधान किया कि पुराने नियम में NAV और मार्केट प्राइस का अंतर क़रीब 20 फ़ीसदी तक सीमित रहता था, जबकि नए नियम में ये अंतर और बढ़ सकता है. इसलिए बहुत ज़्यादा प्रीमियम पर ETF ख़रीदने से बचना चाहिए. Motilal Oswal ने अपने नोट में इसका हिसाब समझाया. पुराने नियम के मुताबिक़, Q50 ETF 7 सितंबर को ₹142.60 और 8 सितंबर को ₹142.48 से ऊपर बंद नहीं हो सकता था. नए नियम में इन दोनों दिनों की ऊपरी सीमा बढ़कर ₹170.32 और ₹196.91 हो गई. ETF दोनों दिन इस सीमा से एक रुपये से भी कम नीचे बंद हुआ. Motilal Oswal के नोट में ये भी बताया गया कि क़ीमत एक दिन में क़रीब 20 फ़ीसदी तक बढ़ सकती है. लेकिन इतनी क़ीमत चुकानी चाहिए या नहीं, इसका जवाब निवेशक को ख़ुद समझना है.
अभी प्रीमियम कितना है
|
ETF
|
NAV (₹) | मार्केट प्राइस (₹) | प्रीमियम (%) | पिछले एक साल का औसत प्रीमियम (%) |
|---|---|---|---|---|
| Motilal Oswal Nasdaq Q50 | 117.43 | 213.01 | 81.4 | 15.1 |
| Mirae Asset S&P 500 Top 50 | 66.71 | 97.01 | 45.4 | 19.6 |
| Mirae Asset NYSE FANG+ | 172.38 | 234.98 | 36.3 | 19.8 |
| Mirae Asset Hang Seng TECH | 18.14 | 23.09 | 27.3 | 19.8 |
| Motilal Oswal NASDAQ 100 | 273.52 | 344.7 | 26 | 11.1 |
| Nippon India Hang Seng BeES | 455.13 | 466.97 | 2.6 | 14.3 |
| प्रीमियम का मतलब है ETF की मार्केट क़ीमत और उसकी सबसे नई जारी NAV के बीच का फ़र्क़. Q50 के लिए 9 सितंबर की मार्केट क़ीमत और 8 सितंबर की NAV ली गई है. बाक़ी ETF के आंकड़े 8 सितंबर के हैं. | ||||
असल में आप क्या ख़रीद रहे हैं
बुधवार को Q50 ETF की एक यूनिट की क़ीमत क़रीब ₹213 थी. लेकिन उस यूनिट के पीछे मौजूद शेयरों की NAV सिर्फ़ ₹117 थी. यानी बाक़ी ₹96 उन शेयरों की क़ीमत नहीं थी. ये पैसा आपने ETF की यूनिट की कमी की वजह से बने प्रीमियम के लिए दिया. और ये कमी हमेशा नहीं रहेगी. विदेशी निवेश की सीमा बढ़ी, तो फ़ंड हाउस फिर NAV के आसपास नई यूनिट बना सकेगा. या किसी दिन ख़रीदारों से ज़्यादा बेचने वाले आ गए, तो प्रीमियम तेज़ी से गिर सकता है. ये ETF आम तौर पर रोज़ क़रीब ₹1.5 करोड़ का कारोबार करता रहा है और नई यूनिट न बन पाने से NAV और मार्केट प्राइस के फ़र्क़ को कम करने वाली सामान्य व्यवस्था भी ठीक से काम नहीं कर पा रही. ऐसे में Nasdaq की उन 50 कंपनियों के शेयर वहीं रहें, फिर भी आपके दिए अतिरिक्त ₹96 का बड़ा हिस्सा ग़ायब हो सकता है.
Nasdaq Q-50 इंडेक्स में कोई दिक़्क़त नहीं है. फ़ंड भी अपना काम कर रहा है. 31 अगस्त 2026 तक Value Research के फ़ंड पेज पर इसका बेस एक्सपेंस रेशियो 0.40 फ़ीसदी था. असली समस्या ये है कि Motilal Oswal नई यूनिट नहीं बना पा रहा और बाज़ार में यूनिट NAV से बहुत ऊपर बिक रही हैं. फ़ंड के दस्तावेज़ में भी पहले से चेतावनी दी गई थी कि नियमों में बदलाव होने पर प्रीमियम बढ़ सकता है.
इसलिए किसी इंटरनेशनल ETF को ख़रीदने से पहले उसकी NAV ज़रूर देखें. अगर मार्केट प्राइस NAV से बहुत ऊपर है, तो समझिए कि आप सिर्फ़ Nasdaq में निवेश नहीं कर रहे हैं. आप ETF की यूनिट की कमी के लिए भी एक बड़ी अतिरिक्त क़ीमत चुका रहे हैं.






