फ़र्स्ट पेज

भारत का ख़र्च कौन उठाता है? ये वो नहीं हैं जो आप सोचते हैं

“2-3 प्रतिशत लोग ही सारा टैक्स देते हैं” वाली बात का हिसाब-किताब ग़लत क्यों है

“2-3 प्रतिशत लोग ही सारा टैक्स देते हैं” वाली बात का हिसाब-किताब ग़लत क्यों हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः यह आम दावा कि भारत का सारा टैक्स का बोझ सैलरीड भारतीयों के एक बहुत छोटे से हिस्से पर है, आंकड़ों की बारीकी से जांच करने पर सही नहीं ठहरता. सरकारी आमदनी, GST और घरों के स्तर पर लगने वाले टैक्स का ब्योरा यह दिखाता है कि आम तौर पर किया जाने वाला 2-3 प्रतिशत का हिसाब क्यों गुमराह करने वाला है.

आपने भी वो पोस्ट या उसके सैकड़ों वर्ज़न देखे होंगे, जिनमें कहा जाता है कि पूरा देश कुछ गिने-चुने ईमानदार सैलरीड लोगों के इनकम टैक्स पर चल रहा है. इस हफ़्ते मैंने असली आंकड़े खंगाले और कहानी कुछ और ही निकली.

कुछ दिन पहले मुझे X पर एक पोस्ट दिखी जिसमें भारत के टैक्स और टैक्सपेयर्स को लेकर वही पुराने मगर हमेशा से लोकप्रिय दावे दोहराए गए थे. पोस्ट में कहा गया था कि हमारा टैक्स-टू-जीडीपी रेशियो क़रीब 20 प्रतिशत है और यह पूरा बोझ सिर्फ़ 2-3 प्रतिशत आबादी, यानी सैलरी पाने वालों पर पड़ता है, जबकि बिज़नेसमैन, किसान और भ्रष्ट लोग बिना कुछ चुकाए बच निकलते हैं, वगैरह-वगैरह. इस पोस्ट को खूब लाइक मिले और उन लोगों का ख़ूब समर्थन मिला जो ख़ुद को देश के आख़िरी बचे-खुचे ईमानदार टैक्सपेयर मानते हैं. मैं बरसों से इस दलील के अलग-अलग रूप सुनता-पढ़ता आया हूं और यह बिल्कुल ग़लत है.

इस दावे को साबित करने के लिए लोग पूरे सरकारी बजट को उठा लेते हैं और यह पूरी तरह काल्पनिक मान लेते हैं कि यह सारा पैसा लोगों के पर्सनल इनकम टैक्स से ही आता है. असली आंकड़े बिल्कुल अलग हैं. पर्सनल इनकम टैक्स केंद्र सरकार की कुल कमाई का सिर्फ़ 21% है. वहीं, कॉर्पोरेशन टैक्स 18%, GST का केंद्र वाला हिस्सा 15%, एक्साइज़ 6%, कस्टम्स 4%, नॉन-टैक्स रेवेन्यू 10% और उधार (बॉरोइंग्स) 24% हैं. SGST, शराब पर एक्साइज़, प्रॉपर्टी पर स्टैंप ड्यूटी जैसे राज्यों के हिस्से में आने वाले, ये सब इसके ऊपर अलग से हैं, और म्युनिसिपल लेवल के टैक्स भी अलग हैं. तो "देश 100% पर्सनल इनकम टैक्स पर चल रहा है" वाला दावा असल में 20% से भी कहीं कम निकलता है.

जब आप यह पूरा हिसाब देखते हैं, तो समझ आता है कि शिक़ायत असल में उल्टी दिशा में है. GST तो हर वो शख़्स चुकाता है जो कुछ भी ख़रीदता है, चाहे वह किसान हो, दिहाड़ी मज़दूर हो, या फुटपाथ पर बैठा वह भिखारी जो चंद सिक्कों से बिस्किट का पैकेट ख़रीदता है. यहां तक कि महंगे फोन, बड़ी SUV और शादियों पर काली कमाई से किया गया ख़र्च भी टैक्स के दायरे में आ जाता है. यही वह जगह है जहां बेहिसाब पैसा भी अक्सर सतह पर आकर टैक्स के घेरे में आ ही जाता है. इसके लिए इकोनॉमिक्स की डिग्री की ज़रूरत नहीं है. बस इतना समझना काफ़ी है कि इनडायरेक्ट टैक्स का बोझ कम कमाने वालों पर ज़्यादा और ज़्यादा कमाने वालों पर कम पड़ता है. जिन लोगों को उस पोस्ट में फ़्रीलोडर कहा गया, उनमें से कई अपनी कमाई का कहीं ज़्यादा हिस्सा टैक्स के तौर पर दे रहे हैं, जितना शिकायत करने वाले सैलरीड लोग देते हैं.

यह तो हुई असली टैक्स की बात, लेकिन इस वायरल दावे में एक और गड़बड़ है, कि सिर्फ़ 2 या 3 प्रतिशत लोग ही इनकम टैक्स चुकाते हैं. पिछले साल क़रीब नौ करोड़ रिटर्न फ़ाइल हुए, जिनमें से दो-तिहाई ज़ीरो टैक्स वाले थे, यानी बाक़ी बचे तीन करोड़ लोग जिन्होंने असल में टैक्स चुकाया. इसे अगर आप 140 करोड़ की आबादी से भाग दें तो आंकड़ा 2 प्रतिशत के आसपास बैठता है. लेकिन रिटर्न एक व्यक्ति फ़ाइल करता है, जबकि टैक्स पूरे घर की कमाई से चुकाया जाता है. ज़रा सोचिए एक सामान्य परिवार के बारे में, जिसमें एक कमाने वाला सदस्य हो, उसका जीवनसाथी और दो बच्चे. यह पूरा परिवार खाता है, सफ़र करता है, कपड़े ख़रीदता है और इन सब पर GST चुकाता है. जो इनकम टैक्स में गिनी जा रही है, वह एक नहीं बल्कि चार लोगों का ख़र्च चलाती है. भारत में क़रीब 30 करोड़ घर हैं, तो सही डिनॉमिनेटर 140 करोड़ भारतीय नहीं बल्कि 30 करोड़ घर होना चाहिए. इस हिसाब से देखें तो 10% घर इनकम टैक्स चुकाते हैं. और चूंकि पर्सनल इनकम टैक्स केंद्र सरकार की कमाई का 21% है, और राज्य व स्थानीय टैक्स जोड़ने पर यह पूरी सरकारी कमाई का शायद क़रीब 14% बैठता है, तो मुझे इसमें कोई बड़ी नाइंसाफ़ी नज़र नहीं आती.

मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा कि भारतीयों पर टैक्स कम है या समाज के कुछ हिस्सों पर ज़्यादा टैक्स नहीं है. यह चर्चा उन मुद्दों की नहीं है. मैं यह भी नहीं कह रहा कि जो पैसा इकट्ठा होता है, वह सही तरीक़े से ख़र्च होता है, क्योंकि साफ़ है कि उसका बड़ा हिस्सा ऐसा नहीं होता. सैलरीड लोगों की यह शिक़ायत भी जायज़ है कि उनका हिस्सा बाक़ी सबकी तुलना में कहीं ज़्यादा दिखता है और उससे बचना मुश्किल है. यह सब सोचने लायक बातें हैं, लेकिन इन पर चर्चा तभी हो सकती है जब लोगों के पास यह काल्पनिक धारणा न हो कि कौन कितना टैक्स चुकाता है. जैसे सेहत से लेकर AI तक बाक़ी कई विषयों में होता है, सोशल मीडिया की बातें असल समझ की जगह नहीं ले सकतीं. कौटिल्य, जिन्होंने शायद हमारे इतिहास में किसी और से ज़्यादा गहराई से टैक्सेशन के बारे में सोचा था, उनके पास इसके लिए एक बेहतरीन उदाहरण था, कि जैसे माली अपने पेड़ों से एक-एक करके पके फल तोड़ता है, वैसे ही राजा को अपने राज्य से टैक्स लेना चाहिए. बाग़ को इस तुड़ाई के बाद भी बचे रहना चाहिए और अगले साल के लिए तैयार होना चाहिए. यह सरकार के लिए एक चेतावनी है कि वह कितना और किससे ले. साथ ही यह भी याद दिलाता है कि हम सब एक ही बाग़ में खड़े हैं, चाहे हम रिटर्न फ़ाइल करें या न करें.

यह भी पढ़ेंः ज़्यादातर दिखावा, कभी-कभार टैक्स

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

Jio Platforms: अगले दौर की ग्रोथ कहां से आएगी?

पढ़ने का समय 7 मिनट•सत्यजीत सेन

6 इंटरनेशनल फ़ंड्स ने अपनी पुरानी SIP बंद कीं, 5 ले रहे हैं नया निवेश

पढ़ने का समय 6 मिनट•आकार रस्तोगी

कुछ इंटरनेशनल फ़ंड निवेश के लिए खुले, लेकिन घरेलू फ़ंड भी दे सकते हैं मौक़ा

पढ़ने का समय 7 मिनट•आकार रस्तोगी

Paras Healthcare IPO: भविष्य के अस्पतालों के लिए क्या इतनी क़ीमत चुकाना सही है?

पढ़ने का समय 7 मिनट•Ananya Khurana

Shadowfax: कमज़ोर लिस्टिंग से 3 गुना तक की छलांग, जानिए क्या बदलाव हुए?

पढ़ने का समय 7 मिनट•अर्पित सूरी

वैल्यू रिसर्च हिंदी पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

जो आपको दिखाई नहीं देता, वही आपको मिलता है

एक राष्ट्रपति की क्रिप्टो वेल्थ और वॉलेट से जुड़ी ग़लत ख़बरें बताती हैं कि छोटे निवेशक को क्या नज़र नहीं आता

दूसरी कैटेगरी