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सबके पास एक जैसे टूल्स हों, तो इससे किसी का भला नहीं होता

निवेशकों के बीच असली फ़र्क़ कभी भी टेक्नोलॉजी की वजह से नहीं था

निवेशकों के बीच असली फ़र्क़ कभी भी टेक्नोलॉजी की वजह से नहीं थाAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः AI टूल्स निवेशकों को डेटा, एनालिसिस और मार्केट की जानकारी तक बेहतर पहुंच दे सकते हैं, लेकिन इनके व्यापक रूप से उपलब्ध होने के कारण ये कोई ख़ास फ़र्क़ पैदा नहीं करते. असली फ़ायदा निवेशक के स्वभाव से ही मिलता है, खासकर तब जब बाज़ार में उतार-चढ़ाव हो.

हर इन्वेस्टर को उन टूल, ऐप और वेबसाइट का काफ़ी अनुभव हो चुका है जो AI से आपको सेवाएं देने का वादा करते हैं. ये सर्विसेज़ दावा करती हैं कि वे अगले मल्टीबैगर के लिए पूरे मार्केट को लगातार खंगालती रहती हैं, आपके लिए परफ़ेक्ट पोर्टफ़ोलियो बनाती हैं, आपकी ख़रीद-बिक्री का सही समय बताती हैं और पता नहीं क्या-क्या. भले ही ये दावे सच हों, और मुझे नहीं लगता कि हैं, कोई भी और इन्हें इस्तेमाल कर सकता है, तो ज़रा सोचिए कि ये आपको कितना फ़ायदा दे सकते हैं.

कुछ दिन पहले मुझे इसी बात की याद HCL टेक के पूर्व CEO विनीत नायर की एक नई किताब से आई. नायर की पहली किताब 'Employees First, Customers Second' थी, ये उन चंद इंडियन 'एयरपोर्ट बुक्स' में से है जिन्होंने मार्केटिंग नहीं बल्कि अपने कंटेंट के दम पर नाम कमाया. अब उन्होंने एक और किताब ‘ह्यूमन्स फर्स्ट, मशीन्स सेकंड’ (Humans First, Machines Second) लिखी है. यह किताब उन बिज़नेस के लिए है जो उस मुश्किल हालात (आप जानते ही हैं, किस बारे में बात हो रही है) से निपटने की कोशिश कर रहे हैं. दिलचस्प बात ये है कि किताब भले ही बिज़नेस के लिए लिखी गई हो, लेकिन इसकी मुख्य दलील ज़िंदगी के कई और क्षेत्रों पर भी लागू होती है. नायर AI को एक 'इक्वलाइज़र' (संतुलन बनाने वाला) मानते हैं: यह ताक़तवर तो है, लेकिन सबके लिए उपलब्ध भी है. अगर यह सबके लिए उपलब्ध है, तो यह कोई डिफ़रेंशिएटर नहीं हो सकता; यह आपको दूसरों से अलग नहीं कर सकता.

बेशक, नायर बिज़नेस के आपस के मुक़ाबले की बात कर रहे हैं, लेकिन यही तर्क इन्वेस्टर्स पर, ख़ासकर छोटे इन्वेस्टर्स पर भी लागू होता है. जब आप, आपके बगल वाला शख़्स और कुछ करोड़ और लोग, सब एक ही मशीन का इस्तेमाल करके एक ही मार्केट से बेहतर नतीजे पाने की कोशिश कर रहे हों, तो वह मशीन किसी के लिए भी फ़ायदेमंद नहीं रह जाती. अगर वह किसी सस्ते स्टॉक को खोज सकती है, तो वह मौक़ा उसी वक़्त सबको दिख जाएगा, यानी वह असल में किसी के लिए भी मौक़ा नहीं रहेगा.

अब आते हैं इस पूरी थ्योरी के सबसे दिलचस्प हिस्से पर: अगर टूल सबके एक जैसे हैं, या जल्द ही हो जाएंगे, तो एक इन्वेस्टर को दूसरे से अलग क्या बनाता है? इसका जवाब AI में नहीं, बल्कि निवेशक के अपने स्वभाव में छिपा है. क्या आप एक समझदार प्लान बना सकते हैं और फिर उस पर टिके रह सकते हैं जब मार्केट 30 प्रतिशत गिर जाए, या आप घबराकर भाग खड़े होंगे? कोई मशीन आपको यह ख़ूबी नहीं दे सकती, क्योंकि यह नॉलेज, डेटा या एनालिसिस जैसी किसी चीज़ की बात ही नहीं है.

यहां मुझे थोड़ा सावधान रहना होगा, क्योंकि मेरी कंपनी ने तीन दशकों से ज़्यादा वक़्त ऐसे टूल बनाने में लगाया है जो इन्वेस्टर्स को नॉलेज, डेटा और एनालिसिस देते हैं, और मैं यह नहीं कहना चाहता कि ये चीज़ें बेकार हैं. अगर सही तरीक़े से इस्तेमाल किए जाएं, तो ये टूल लोगों को अनजानपन और महंगी ग़लतियों से बचाते हैं. मेरी चिंता बस इतनी है कि ये टूल आपको नॉलेज की कमी से बचा सकते हैं, लेकिन उस इन्वेस्टर बनने से नहीं बचा सकते जिसके पास अच्छा प्लान तो है, लेकिन जो असल में डर, लालच और घबराहट से चलता है.

फिर भी, AI टूल की यह नई पीढ़ी हम इन्वेस्टर्स से पुराने नॉन-AI डिजिटल टूल के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सावधानी की मांग करती है. AI टूल (कम से कम अभी तक) आपकी हां में हां मिलाने वाले होते हैं. मुझे यक़ीन है आपने भी यह नोटिस किया होगा. ये ऐसा तब तक करते रहते हैं जब तक आप इन्हें ध्यान से इस खुशामद से दूर न रखें. और जब आपको यह सुनना अच्छा लगता है कि 'आप बिल्कुल सही कह रहे हैं', जो कि AI का सबसे ख़ास जुमला है, तो भला किसे अपनी बात से सहमति मिलना पसंद नहीं होगा? अगर आप किसी ऐसे स्टॉक या फ़ंड के बारे में पूछें जो आपको पसंद है, तो AI आमतौर पर आपकी ही बात को भरोसे और तर्क के साथ दोहरा देगा. पूछिए कि जिस स्टॉक को आप पहले से पसंद करते हैं वह ख़रीदने लायक़ है या नहीं, तो वह आपको इसकी वजहें ढूंढ देगा; बताइए कि गिरावट से आप डरे हुए हैं, तो वह बताएगा कि आपको क्यों बेच देना चाहिए. किसी एडवाइज़र से हमें सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है अपनी सोच को चुनौती देने वाली राय की, न कि हर बात पर हां में हां मिलाने वाले की.

सब कुछ मिलाकर देखें तो मुझे लगता है कि AI का फ़ायदा असली है, लेकिन इसे अच्छे से इस्तेमाल करने के लिए मेहनत चाहिए, और इसे ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल होने से बचाने के लिए उससे भी ज़्यादा मेहनत चाहिए. विनीत नायर की किताब का टाइटल, 'Humans First, Machines Second', उन कंपनियों के लिए एक सलाह है जो हर जगह बेतहाशा AI को घुसाने की कोशिश में लगी हैं, क्योंकि किसी तरह यह मानना फ़ैशन बन गया है कि AI इंसानों से हर काम बेहतर कर सकता है. जैसा मैंने ऊपर दिखाया, इन्वेस्टर्स को भी यही सलाह चाहिए.

यह भी पढ़ेंः अगर सबके पास AI है, तो फ़ायदा किसे होगा?

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