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वो ग्रोथ, जो कहीं नहीं पहुंचाती

हर ग्रोथ कंपनी अपने शेयरहोल्डरों को अमीर नहीं बनाती. आख़िर ऐसा क्यों होता है.

हर ग्रोथ कंपनी अपने शेयरहोल्डरों को अमीर नहीं बनाती. आख़िर ऐसा क्यों होता है.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः किसी कंपनी की तेज़ ग्रोथ उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी लग सकती है, पर वो हमेशा शेयरहोल्डरों की वेल्थ में नहीं बदलती. यह लेख उस फ़र्क़ पर बात करता है, जिस पर कोई ध्यान नहीं देता: कौन सी कंपनियां सच में आगे बढ़ रही हैं, और कौन सी बस साइज़ में बड़ी होती जा रही हैं.

हर दफ़्तर में एक ऐसा शख़्स होता है, जो दिन भर बेहद व्यस्त रहता है, पर काम कुछ नहीं करता. हम सबने ऐसे लोगों को देखा है और हो सकता है हममें से कुछ ख़ुद वही हों! उनका दिन कभी ख़ाली नहीं होता, वो ढेरों मीटिंग में जाते हैं और वक़्त बीतने के साथ और ज़्यादा व्यस्त होते चले जाते हैं. पर जब असल काम की बात आती है, यानी कौन सा प्रोजेक्ट पूरा हुआ और कौन सा लक्ष्य मिला, तो वो लिस्ट हमेशा छोटी ही निकलती है. ऐसे लोग चलते बहुत हैं, पर पहुंचते कहीं नहीं.

दिलचस्प बात यह है कि ऐसा सिर्फ़ लोगों के साथ नहीं होता, कई कंपनियों के साथ भी होता है. और मैं उन कंपनियों की बात नहीं कर रहा जो IPO के लिए कामयाबी का ढोंग करती हैं. मैं उनकी बात कर रहा हूं जो सच में अच्छी हैं. ये वो कंपनियां हैं जो अपनी कमाई और मुनाफ़ा सच में तेज़ी से बढ़ाती हैं, पर अजीब बात यह कि उनके शेयरहोल्डरों के हाथ में कुछ नहीं आता. वजह यह कि उस पूरी बढ़त का ख़र्च उठाने के लिए कंपनी वो पैसा अपने पास रोक लेती है, जो वरना उसके मालिकों तक पहुंचता. और अगर कंपनी के अंदर लगे उस पैसे से जो रिटर्न मिलता है, वो उससे कम हो जो मालिकों को कहीं और मिल जाता, तो वो बढ़त किसी को अमीर नहीं बनाती.

तो मैं यहां बात कर रहा हूं ऐसी तेज़ बढ़त की, जो निवेशक के किसी काम की नहीं. आपमें से ज़्यादातर लोगों को यह बात अजीब लगेगी. कारोबार और निवेश की पूरी दुनिया बढ़त की पूजा करती है, और यहां मैं आपको समझाने बैठा हूं कि बढ़त बुरी भी हो सकती है. आपकी सोच सही है. ज़्यादातर मौक़ों पर, औसतन, जो कंपनियां तेज़ी से बढ़ती हैं वही जीतती हैं, और उनके शेयरधारक ख़ूब पैसा बनाते हैं. पर इस आम बात के पीछे कई अपवाद छिपे रहते हैं. तेज़ बढ़ने वाली कंपनियों में ही कई ऐसी निकलती हैं, जो रफ़्तार में तो बराबर होती हैं, पर शेयरहोल्डरों को घटिया रिटर्न देती हैं. 

बढ़त के पीछे भागने वाले निवेशक एक ही नंबर पर टिके रहते हैं, यानी बढ़त की दर पर. पर उस एक नंबर से इन दोनों तरह की कंपनियों में फ़र्क़ नहीं किया जा सकता. इन दोनों को अलग करने वाली बात यह नहीं है कि वो कितनी तेज़ी से बढ़ती हैं. बात यह है कि उस बढ़त के लिए उन्हें कितना ख़र्च करना पड़ता है. जो कारोबार 50 पैसे लगाकर एक रुपये का मुनाफ़ा जोड़ लेता है, वो अपने शेयरहोल्डरों को अमीर बनाएगा. पर जिसे एक रुपये का मुनाफ़ा जोड़ने के लिए 90 पैसे लगाने पड़ते हैं, वो असल में अपने ही खातों के अंदर पैसा घुमाता रह जाता है, और दौलत कहीं नहीं बनती.

सालों से मेरे लिखने में एक बात लौट-लौटकर आती रही है. वो यह कि जिन बुरे निवेशों में अच्छे निवेश की कुछ निशानियां दिखती हैं, वो सीधे-सीधे बुरे निवेशों से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं. और तेज़ बढ़ने वाली वो कंपनियां, जो शेयरहोल्डरों को रिटर्न नहीं देतीं, इसी दिक़्क़त का सबसे गंभीर उदाहरण हैं. वजह यह कि बढ़त को अच्छे कारोबार की बहुत मज़बूत निशानी माना जाता है और उससे ऐसी सुर्ख़ियां बनती हैं जो सबका ध्यान खींच लेती हैं. वहीं, कोई कंपनी अपनी पूंजी पर कितना कमाती है, यह एक बोरिंग सी बात है. वो रिपोर्ट में कहीं गहरे दबी रहती है और उसे कोई ज़िद्दी एनलिस्ट ही खोदकर निकालता है.

जैसा हमने पहले भी देखा है, अच्छे निवेशक ग्रोथ और वैल्यू को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं, आपस में लड़ने वाली दो सोच नहीं. किसी कारोबार की असल क़ीमत में ग्रोथ तभी जुड़ती है, जब वो कंपनी अपनी पूंजी का इस्तेमाल एक तय स्तर से बेहतर करती हो. यह बात किसी पावर पॉइंट की स्लाइड जैसी किताबी लगती है. पर तब तक, जब तक आपको यह अंदाज़ा न हो जाए कि इसे नज़रअंदाज़ करके कितना पैसा बेकार गया है, और कितना गंवाया गया है.

मैं यह सब बढ़त वाले निवेश के ख़िलाफ़ नहीं कह रहा. बढ़त पर टिका निवेश काम करता है, और ज़्यादातर वक़्त अच्छा ही काम करता है. मेरी बात बस इतनी है कि सिर्फ़ एक नंबर देखकर यह मान लेना कि निवेश की पूरी दलील मिल गई, एक ग़लती है. और यह ग़लती बढ़त के पीछे चलने वाले निवेशक ज़्यादा करते हैं. तेज़ बढ़त एक ऐसा शॉर्टकट बन जाती है, जिसके चक्कर में वो मेहनत छूट जाती है, जो कारोबार को देखने और समझने में लगनी चाहिए.

इस महीने की कवर स्टोरी इन्हीं दो तरह की बढ़त का फ़र्क़ बताती है. एक वो बढ़त जो आपके लिए पैसा बनाएगी. और दूसरी वो, जो किसी कंपनी को बस काम में उलझाए रखती है और आपके लिए कुछ नहीं करती. इस पर बात कम होती है और मुझे भरोसा है कि यह हमारे सभी पाठकों के काम आएगी.

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