Anand Kumar/AI-Generated Image
हाल ही में मुझे एक पोस्टर मिला जिसमें चार्ली मंगर की निवेश सोच को एक ही शीट - उनकी 8 सबसे उपयोगी बातें- में समेटा गया था, जो आम निवेशकों के लिए बहुत काम की हैं. इनमें से कुछ पर मैं पहले भी लिख चुका हूं, जैसे किसी समस्या को उल्टा करके देखना और अपनी समझ के दायरे (सर्कल ऑफ कॉम्पिटेंस) में ही टिके रहना. जो सूची अभी मेरे सामने है, उसमें एक और बात है जो शायद सबसे ज़्यादा काम की है - "कंपाउंडिंग का पहला नियम यह है कि अपनी पूंजी को कभी स्थायी रूप से नुक़सान न पहुंचने दें और अगर आप स्थायी नुक़सान से बच जाते हैं, तो समय और उचित रिटर्न की उम्मीदें बाक़ी काम ख़ुद कर देंगी."
ध्यान दीजिए कि मैंने 'स्थायी' शब्द पर ज़ोर दिया है, क्योंकि यही सबसे ज़रूरी बात है. स्थायी होना ही गिरावट और नुक़सान के बीच का फ़र्क़ है. दशकों के अनुभव से बनी मेरी सबसे पक्की मान्यता यह है कि बाज़ार खुद कभी भी लंबे समय तक डाइवर्सिफ़ाइड निवेश करने वालों से स्थायी रूप से पैसा नहीं छीनता. हर गिरावट, चाहे उस वक्त वह कितनी भी भयानक क्यों न लगी हो, आखिरकार पलट गई है. और सिर्फ पलटी ही नहीं, बल्कि जितना संभव लग रहा था उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से पलटी है. स्थायी नुक़सान - यानी वे नुक़सान जो कभी वापस नहीं आते - हमेशा निवेशक के अपने फ़ैसलों से पैदा होते हैं. और वे हमेशा घबराहट की वजह से बनते हैं, नुक़सान की वजह से नहीं.
जैसा मैंने शुरू में कहा, मंगर की बात को समझने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि गिरावट, नुक़सान नहीं होती. अगर बाज़ार इस महीने 10 प्रतिशत गिर जाए और आपके Value Research Online Portfolio Manager में आंकड़ा लाल दिख रहा हो और आगे माइनस का निशान लगा हो, तो वास्तव में आपने कुछ नहीं खोया है. वह आंकड़ा हक़ीक़त तभी बनेगा और गिरावट तभी नुक़सान में बदलेगी, जब आप उस पर कुछ करने का फ़ैसला लेंगे.
निवेशकों के व्यवहार को देखते हुए, मेरा अनुभव यह है कि गिरावट के नुक़सान में बदलने की सिर्फ दो वजहें होती हैं. पहली, आपको अपने निवेश पर भरोसा नहीं है - आपको यह नहीं पता कि उनकी असली क़ीमत क्या है और आपने उन्हें ख़रीदा ही क्यों था, इसलिए आप घबराकर बेच देते हैं. दूसरी, आपने तेज़ी के दौर में उधार लेकर या ज़रूरत से ज़्यादा निवेश कर दिया, तो जब मंदी आती है, आपके पास सबसे बुरे समय पर बेचने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. दोनों ही मामलों में, नुक़सान बाज़ार ने नहीं बल्कि आपकी प्रतिक्रिया ने पैदा किया.
मैं दशकों से पाठकों के पत्र पढ़ता आ रहा हूं और मुझे आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जिसका पूरा पोर्टफ़ोलियो सिर्फ़ इसलिए बर्बाद हो गया हो क्योंकि उसने समय पर कुछ नहीं किया. बर्बादी हमेशा इसके उल्टे व्यवहार से हुई - लोगों ने मार्च 2008 या अप्रैल 2020 में सब कुछ बेच दिया, फिर नकदी लेकर बैठे रहे जबकि बाज़ार में तेज़ी लौटी और चली भी गई, और इस तरह अपने ही फ़ैसले से गिरावट को स्थायी नुक़सान बना दिया.
इस कहानी का सार, जिस ओर चार्ली मंगर इशारा कर रहे हैं, बहुत सीधा है - यही वजह है कि बहुत कम लोग इसे अमल में ला पाते हैं. बाज़ार की किसी बड़ी गिरावट के दौरान, सबसे क़ीमती काम जो आप कर सकते हैं वह है कुछ न करना, और दूसरा सबसे क़ीमती काम है अपना नियमित निवेश जारी रखना - क्योंकि जल्द ही एक दिन आप खुद अपनी पीठ ठोकेंगे कि आपने शेयर और यूनिट्स तब ख़रीदे जब वे वाकई बहुत सस्ते थे. ऐसा कर पाने के लिए ज़रूरी है कि आपको अपने फ़ैसलों पर भरोसा हो, यह समझ हो कि आपने निवेश क्यों किया था - पर यह भरोसा तो वैसे भी ज़रूरी है. अपनी सूची में मंगर आगाह करते हैं ऐसे कारोबारों से बचने के लिए जिनकी बुनियाद कमज़ोर हो, जिनकी लागत ज़्यादा हो, प्रबंधन कमज़ोर हो, क़र्ज़ बहुत ज़्यादा हो, या जो ऐसी परिस्थितियों पर निर्भर हों जिन्हें आप नियंत्रित नहीं कर सकते. ये निवेश की बुनियादी बातें हैं जिन पर आपको हमेशा ध्यान देना चाहिए. मनोवैज्ञानिक फ़ैक्टर इनके ऊपर एक और परत जोड़ देते हैं और चीज़ों को और मुश्किल बना देते हैं.
यह भी पढ़ेंः पोर्टफ़ोलियो मैनेजर ख़ामियां दिखाता है, फ़ंड एडवाइज़र उनका समाधान करता है






