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भारत में IPO आख़िर कैसे काम करते हैं?

2025 में 59% IPO साल के अंत तक लिस्टिंग क़ीमत से नीचे गए. लिस्टिंग गेन की चाह में अंधाधुंध अप्लाई करने से पहले IPO का पूरा खेल समझिए.

 2025 में 59% IPO साल के अंत तक लिस्टिंग क़ीमत से नीचे गए. लिस्टिंग गेन की चाह में अंधाधुंध अप्लाई करने से पहले IPO का पूरा खेल समझिए.Vinayak Pathak/AI-Generated Image

सारांशः हर हफ़्ते कोई न कोई IPO आता है. लोग अप्लाई कर देते हैं, लिस्टिंग गेन का इंतज़ार करते हैं. लेकिन 2025 में 59% IPO साल के अंत तक लिस्टिंग क़ीमत से नीचे गए. औसत लिस्टिंग गेन सिर्फ़ 3.8% रहा. IPO में समझकर पैसा लगाया जाए तो मौक़ा है, बिना समझे लगाया तो जोखिम है.

IPO आया नहीं कि LinkedIn पर शोर शुरू हो गया. कोई तथाकथित एनालिस्ट पोस्ट करता है "मैंने पहले ही कह दिया था" ऐसी बातों बहुतों को आकर्षक लगती हैं.  जो कल तक crypto बेच रहा था, आज IPO एक्सपर्ट बन गया. Instagram पर कंपनी के बारे में रील बन रही होती है, भले ही किसी को उसका मतलब समझ ना आया हो. ऑफ़िस में GMP की चर्चा हो रही होती.

आप सोचते हैं: "सब लगा रहे हैं, कहीं मैं पीछे न रह जाऊं." और अप्लाई कर देते हैं.

लेकिन रुकिए. क्या आप जानते हैं कि आपका पैसा असल में कहां जाता है? कंपनी को मिलता है या किसी और को? लिस्टिंग गेन होगा या नहीं, यह GMP नहीं बताता, कुछ और बताता है.

2025 में 108 IPO आए. 59% साल के अंत तक अपनी क़ीमत से नीचे गए. LinkedIn वाले तब ग़ायब हो जाते हैं.

तो आइए विस्तार से समझते हैं.

कंपनी शेयर क्यों बेचती है और पैसा किसे मिलता है?

सब कुछ यहां से शुरू होता है. कंपनी को पैसे चाहिए. कारोबार बढ़ाना है, क़र्ज़ चुकाना है या नई योजनाएं लानी हैं. तो वो फ़ैसला करती है: अपने शेयर आम जनता को बेचेंगे.

लेकिन यहां एक ज़रूरी बात जो ज़्यादातर लोग नज़रअंदाज़ करते हैं: हर IPO में दो हिस्से होते हैं.

नए शेयर जारी करना: कंपनी नए शेयर बनाती है और बेचती है. पैसा सीधे कंपनी के खाते में जाता है. यह अच्छा संकेत है.

पुराने शेयर बेचना (OFS): पुराने प्रमोटर या बड़े निवेशक अपने पुराने शेयर बेचते हैं. पैसा उनके पास जाता है, कंपनी को कुछ नहीं मिलता. अगर यह हिस्सा बहुत ज़्यादा हो तो सवाल ज़रूर पूछें: पुराने निवेशक बाहर क्यों निकल रहे हैं?

SEBI मंज़ूरी देता है, तभी IPO आता है

कंपनी अकेले IPO नहीं ला सकती. वो बड़े निवेश बैंकों को काम पर रखती है. ये क़ीमत का दायरा तय करते हैं, काग़ज़ात संभालते हैं और पूरी प्रक्रिया चलाते हैं.

फिर कंपनी एक बड़ा दस्तावेज़ तैयार करती है जिसे DRHP कहते हैं. इसमें कारोबार की पूरी जानकारी, जोख़िम, पैसों का हिसाब और रक़म कहां लगेगी, सब लिखा होता है.

यह SEBI के पास जाता है. SEBI हर बात जांचता है. मंज़ूरी मिलने पर ही IPO खुल सकता है.

दस्तावेज़ में सबसे पहले क्या देखें: पैसा कहां लगेगा? कारोबार बढ़ाने में या क़र्ज़ चुकाने में - यह अच्छा है. "सामान्य कॉर्पोरेट कामों के लिए" लिखा हो तो सतर्क रहें.

क़ीमत का दायरा तय होता है, आप बोली लगाते हैं

SEBI की मंज़ूरी के बाद शेयर की क़ीमत का दायरा तय होता है. जैसे ₹100 से ₹120 प्रति शेयर. यह दायरा कंपनी और बैंक मिलकर तय करते हैं. बहुत ज़्यादा क़ीमत रखी तो लोग नहीं ख़रीदेंगे, बहुत कम रखी तो कंपनी को कम पैसा मिलेगा.

आप इसी दायरे में बोली लगाते हैं. मान लीजिए आपने ₹110 पर बोली लगाई और कंपनी ने फ़ाइनल क़ीमत ₹120 तय की. तो आपका आवेदन रद्द हो जाएगा.

इसीलिए हमेशा सबसे ऊपरी क़ीमत यानी कट-ऑफ़ पर ही अप्लाई करें. इससे जो भी फ़ाइनल क़ीमत हो, आपका आवेदन मान्य रहेगा.

शेयर एक लॉट में मिलते हैं. जैसे एक लॉट में 10 शेयर. तो ₹120 प्रति शेयर पर एक लॉट के लिए ₹1,200 ब्लॉक होंगे. आम निवेशक के लिए एक IPO में अधिकतम ₹2 लाख तक अप्लाई करने की लिमिट होती है.

अप्लाई करें, पैसे कटते नहीं बस रुकते हैं

IPO खुलने पर Zerodha, Groww जैसे ऐप से अप्लाई होता है.

यहां एक ख़ास बात समझिए. पहले ज़माने में IPO में अप्लाई करते ही पैसे कट जाते थे. फिर हफ़्तों इंतज़ार करो. शेयर न मिले तो पैसे वापस आते थे. इस बीच आपका पैसा कहीं और काम नहीं कर पाता था.

अब ASBA प्रक्रिया है. पैसे कटते नहीं, सिर्फ़ रुक जाते हैं. जैसे बैंक ने पैसों पर एक चिट लगा दी: "यह रक़म IPO के लिए रखी है." 

इसके दो फ़ायदे हैं. पहला, जब तक अलॉटमेंट नहीं होता, पैसा आपके खाते में रहता है और उस पर बचत खाते का ब्याज भी मिलता रहता है. दूसरा, शेयर मिले तो उतने पैसे कटते हैं, नहीं मिले तो रोक अपने आप हट जाती है. कोई झंझट नहीं.

कितनी डिमांड, कितने शेयर?

3 से 5 दिन तक बोलियां लगती हैं. तीन तरह के निवेशक होते हैं: आम निवेशक, बड़े अमीर निवेशक और बड़े संस्थागत निवेशक.

10 लाख शेयर हैं और 50 लाख की मांग आई तो IPO 5 गुना ज़्यादा भरा. 2025 में आम निवेशकों की तरफ़ से मांग औसतन 26.99 गुना रही.

लेकिन ध्यान रखें: ज़्यादा मांग का मतलब ज़्यादा लिस्टिंग गेन नहीं होता. VMS TMT 102 गुना भरा था, फिर भी नुकसान में लिस्ट हुआ. PhysicsWallah सिर्फ़ 1.81 गुना भरा था और 31% से ज़्यादा ऊपर लिस्ट हुआ.

IPO खुलने से पहले ग्रे मार्केट प्रीमियम यानी GMP की भी चर्चा होती है. यह अनौपचारिक बाज़ार है, SEBI का कोई कंट्रोल नहीं. इसे एक संकेत की तरह देखें, आख़िरी फ़ैसले की तरह नहीं.

अलॉटमेंट: आम निवेशक के लिए लॉटरी

आम निवेशकों के लिए अलॉटमेंट लॉटरी से होता है. पूरे शेयर मिल सकते हैं, आधे मिल सकते हैं या एक भी नहीं.

चांस बढ़ाने के तरीक़े: परिवार के सदस्यों के अलग-अलग डीमैट खातों से 1-1 लॉट अप्लाई करें. एक ही PAN से बड़े लॉट में अप्लाई करने से आम निवेशक कैटेगरी में चांस नहीं बढ़ते.

IPO खुलने से एक दिन पहले बड़े म्यूचुअल फ़ंड और संस्थान कम से कम ₹10 करोड़ लगाते हैं. इन्हें एंकर इन्वेस्टर कहते हैं. इनके 50% शेयरों पर 30 दिन और बाकी 50% पर 90 दिन की रोक होती है. यह रोक ख़त्म होने पर बाज़ार में अचानक ज़्यादा शेयर आ सकते हैं और क़ीमत पर दबाव पड़ सकता है.

लिस्टिंग और असली खेल

शेयर NSE और BSE पर लिस्ट होते हैं. अब असली ट्रेडिंग शुरू होती है.

लिस्टिंग के दिन क़ीमत तीन तरफ़ जा सकती है: ऊपर यानी फ़ायदा, जहां था वहीं यानी न फ़ायदा न नुकसान, नीचे यानी नुकसान. क़ीमत मांग और बाज़ार की सोच से तय होती है.

छोटी कंपनियों के IPO और बड़ी कंपनियों के IPO में फ़र्क़:

 
बड़ी कंपनियों का IPO छोटी कंपनियों का IPO (SME)
न्यूनतम निवेश ₹14,000-15,000 ₹1,00,000-1,40,000
लिस्टिंग के बाद 1 शेयर भी ख़रीद-बेच सकते हैं पूरी लॉट एक साथ
जोख़िम मीडियम ज़्यादा, बेचना मुश्किल हो सकता है
नए निवेशकों के लिए छोटी कंपनियों के IPO में सतर्कता ज़रूरी है.

IPO में लगाएं या नहीं?

 
2023 2024 2025
कुल IPO 57 93 108
औसत लिस्टिंग गेन 16.50% 15.20% 3.80%
साल के अंत में क़ीमत से नीचे - - 59%
सोर्स: IndMoney, KPMG, Business Standard

IPO में कोई जादू नहीं है. यह डिमांड, मौजूदगी और लोगों की सोच से चलने वाली व्यवस्था है. अगली बार IPO आए तो ये सवाल ज़रूर पूछें: नए शेयर कितने हैं, पुराने कितने? पैसा कहां लगेगा? कंपनी का कारोबार कैसा है?

जवाब पता हों तो आगे बढ़िए. नहीं पता तो थोड़ा रुकिए.

वैल्यू रिसर्च की राय

IPO में लिस्टिंग गेन हो सकता है, लेकिन यह हर बार नहीं होता. लॉन्ग-टर्म वेल्थ बनाने का रास्ता अच्छी कंपनियां समझकर उनमें टिके रहना है. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र कम शेयर, सही अध्ययन और स्पष्ट नज़रिए के साथ काम करता है.

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यह भी पढ़ें: मुनाफ़ा सीधी लाइन में नहीं बढ़ता. असल में ये बातें मायने रखती है

ये लेख पहली बार जून 01, 2026 को पब्लिश हुआ.

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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