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सारांशः वैल्यू रिसर्च का नियम आज भी वही है: किसी फ़ंड पर राय बनाने से पहले तीन साल इंतज़ार कीजिए. लेकिन जब लाखों करोड़ रुपए नए फ़ंड्स में जा ही रहे हैं, तो ये कवर स्टोरी एक चार-टेस्ट वाला तरीक़ा सामने रखती है, जिससे आप इस इंतज़ार के दौरान भी देख सकें कि नया फ़ंड कैसा चल रहा है.
पाठकों के एक ख़ास तरह के सवाल का जवाब देते वक़्त मुझे हमेशा लगता है कि मैं ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त माता-पिता जैसा बर्ताव कर रहा हूं. बच्चे पूछते हैं कि वो कौन-से फ़्लेवर की आइसक्रीम ले सकते हैं, और आप कह देते हैं, "कोई नहीं, आइसक्रीम ही ख़राब चीज़ है."
मैं दरअसल उन फ़ंड्स की बात कर रहा हूं जो बहुत नए हैं. सालों से पाठक लगातार हमसे उन फ़ंड्स पर राय मांगते रहे हैं जिन्हें हमने रेटिंग नहीं दी है. आम तौर पर वो फ़ंड कुछ महीने या साल भर पुराना होता है, उसका प्रदर्शन अच्छा रहा होता है, कोई उसे पाठक को बेचने की कोशिश कर रहा होता है और वो जानना चाहते हैं कि वैल्यू रिसर्च का इस पर क्या कहना है. जवाब हमेशा यही होता है कि फ़ंड के कम-से-कम तीन साल पूरे होने का इंतज़ार कीजिए. बात स्टार रेटिंग की हो या सिर्फ़ एक ओपीनियन की, किसी भी फ़ंड की क्वालिटी पर उसके पहले तीन साल में हम कुछ नहीं कहते.
इस नियम के पीछे साफ़ आंकड़ों वाली वजह है: जब तक 36 महीने का डाटा जमा न हो जाए, हमारे पास फ़ैसला करने लायक़ बड़ा सैंपल साइज़ होता ही नहीं. असल में एक दूसरी, थोड़ी 'सामान्य' वजह भी है. फ़ंड लॉन्च होने के फ़ौरन बाद का दौर AMC के लिए आम तौर पर आसान होता है. लॉन्च की टाइमिंग हमेशा तब होती है जब बाज़ार चढ़ रहा हो, फ़ंड छोटा होता है इसलिए उसे मैनेज करना आसान रहता है और पोर्टफ़ोलियो को उस वक़्त जो भी चीज़ चल रही हो, उसके हिसाब से आसानी से ढाला जा सकता है. जो चीज़ AMC के बस में नहीं होती, वो है बाज़ार के अगले कमज़ोर दौर की टाइमिंग. असली इम्तिहान तभी शुरू होता है. आम तौर पर तीन साल का वक़्त क़िस्मत पलटने के लिए काफ़ी होता है और इसीलिए ये फ़ंड की क्वालिटी की कहीं ज़्यादा ठोस परख भी है.
हालांकि, भारतीय म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री में जो हुआ, उसने कहानी उलझा दी है. पाठकों से इंतज़ार करने को कहना हमेशा सही जवाब था और आज भी है. दिक़्क़त ये है कि हम सही जवाब देते रहे और जो पाठक इंतज़ार नहीं कर सके, उन्होंने नए म्यूचुअल फ़ंड्स में लाखों करोड़ रुपए लगा दिए. सिर्फ़ पिछले तीन साल में ही नए फ़ंड्स में क़रीब ₹2.5 लाख करोड़ का निवेश आया है. हमारी सलाह सही है और हम उस पर क़ायम हैं. लेकिन कुछ निवेशकों ने, जिनमें हमारे कई पाठक भी शामिल हैं, उसे किनारे रख दिया.
हम आसान रास्ता चुन सकते थे और कह सकते थे कि हमारा काम सही बात कहना है, आगे फ़ैसला निवेशक को ही करना है. लेकिन मुझे लगने लगा है कि ये उन बातों से मुंह मोड़ना होगा जिनके लिए हम खड़े हैं. इसका मतलब होता कि हम अपने लिए सहज पोज़िशन लेकर पाठकों को ख़राब निवेश के हवाले कर दें. इससे बेहतर है कि मेहनत वाला काम किया जाए और ये पता लगाया जाए कि छोटे ट्रैक रिकॉर्ड वाले फ़ंड्स को कैसे परखा जाए, जो हमने इस कवर स्टोरी में किया है. मैं ये ज़ोर देकर कहना चाहूंगा कि ये तीन साल के इंतज़ार का विकल्प नहीं है, बल्कि उस पूरे तीन साल के इंतज़ार के दौरान ये अंदाज़ा लगाने का तरीक़ा है कि फ़ंड कैसा चल रहा है. ये पूरा मामला हमारे हाल ही में शुरू किए गए IPO रेटिंग सिस्टम जैसा ही है, पर वो थोड़ी अलग कहानी है.
इस तरीक़े के तहत हमने ऐसे फ़ंड्स को परखने के लिए चार टेस्ट वाली प्रक्रिया तैयार की. एक दिलचस्प बात बताता हूं. एक से तीन साल पुराने 171 एक्टिवली मैनेज्ड इक्विटी और हाइब्रिड फ़ंड्स में से 100 इस अगस्त में चारों टेस्ट पास कर गए. सुनने में ये अच्छा लगता है, पर असली बात ये है: पहले तीन साल में 52 से 73 प्रतिशत फ़ंड्स पास होते हैं, जबकि उम्र बढ़ने पर सिर्फ़ 29 से 64 प्रतिशत. यानी अगर पुराने फ़ंड्स के मुक़ाबले नए फ़ंड्स कहीं ज़्यादा तादाद में पास हो रहे हैं, तो इसका मतलब साफ़ है कि ट्रैक रिकॉर्ड छोटा हो तो पास होना आसान होता है. यही वजह है कि हम आपसे हमेशा इंतज़ार करने को कहते आए हैं.
हमारी कवर स्टोरी आख़िर में आपको 10 फ़ंड देती है, पर साथ ही ये भी कहती है कि ये रेकमंडेशन नहीं है. ये बस इतना कहना है कि इन्होंने अब तक कुछ ग़लत नहीं किया है. शुरुआत में हम इतना भी नहीं कह पाते थे, लेकिन तीन साल से पुराने फ़ंड्स के बारे में हम जो कह सकते हैं, ये उससे काफ़ी कम है, क्योंकि उन्हें हम रेटिंग भी दे सकते हैं और बाक़ी तरीक़ों से परख भी सकते हैं.
