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सारांशः शेयर बाज़ार के ज़्यादातर सौदों से NSE को फ़ीस मिलती है. मगर हर सौदे से बराबर कमाई नहीं होती. सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाले कारोबार में BSE हिस्सेदारी बढ़ा रहा है. इस हफ़्ते खुलने वाले IPO की क़ीमत मानकर चलती है कि ये गिरावट रुकेगी. कारोबार अच्छा है, लेकिन उसकी क़ीमत को सही ठहराना मुश्किल है.
भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ₹22,562 करोड़ का IPO ला रहा है. 17 सितंबर 2026 को खुलने वाला इश्यू पूरी तरह ऑफ़र फ़ॉर सेल है. NSE पर देश के ज़्यादातर सौदे होते हैं, जिनसे उसे फ़ीस मिलती है. हर रुपये के रेवेन्यू पर ब्याज और टैक्स से पहले का मुनाफ़ा क़रीब 65 पैसे है. अच्छा कैश फ़्लो, ऊंचा मार्जिन और बाज़ार में मज़बूत पकड़ इसकी ताक़त हैं. लेकिन BSE सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाले कारोबार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है.
अपर प्राइस बैंड पर NSE का वैल्यूएशन FY26 के एडजस्टेड मुनाफ़े का 48 गुना है. क्या ये क़ीमत सही है, जब कंपनी को सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाले कारोबार में अपनी हिस्सेदारी भी बचानी है?
NSE को कमाई कैसे होती है?
NSE ट्रेडिंग मेंबर्स, यानी ब्रोकर्स से हर सौदे पर ट्रांज़ैक्शन चार्ज लेता है. दूसरी कमाई लिस्टिंग फ़ीस, डेटा सेंटर में सर्वर रखने के किराये (कोलोकेशन), बाज़ार के डेटा का सब्सक्रिप्शन, फ़ंड हाउस से लाइसेंस फ़ीस और सौदों का हिसाब पूरा करने के क्लियरिंग चार्ज से होती है.
कमाई में इसी फ़ीस की बड़ी हिस्सेदारी है. FY26 में ऑपरेटिंग रेवेन्यू का 78.7% ट्रांज़ैक्शन चार्ज से मिला. ऑप्शंस का योगदान 60.2% था. ये ऐसे डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट हैं, जिनसे एसेट ख़रीदे बिना उसकी क़ीमत के उतार-चढ़ाव पर सौदा कर सकते हैं. शेयरों की ख़रीद-बिक्री वाले कैश मार्केट का हिस्सा 9.4% और फ़्यूचर्स का 8.9% था. बाक़ी कमाई कोलोकेशन, कनेक्टिविटी, डेटा फ़ीड, टर्मिनल, लिस्टिंग फ़ीस, क्लियरिंग और सेटलमेंट, इंडेक्स लाइसेंसिंग, कारोबार में लगी रक़म से इनकम और दूसरे स्रोतों से हुई.
इन सौदों की फ़ीस में बड़ा फ़र्क़ है. FY26 में ₹142 लाख करोड़ के ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार से ₹9,998 करोड़ मिले. यानी हर ₹100 पर क़रीब 7 पैसे, या 7 बेसिस पॉइंट. कैश मार्केट में ₹261 लाख करोड़ के कारोबार से ₹1,555 करोड़ मिले. यानी हर ₹100 पर सिर्फ़ 0.6 पैसे, या 0.6 बेसिस पॉइंट.
NSE के पक्ष में क्या है?
#1 ऑप्शंस का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है
दोनों एक्सचेंजों का रोज़ाना कुल ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार FY24 में ₹63,912 करोड़ था. FY26 में ये ₹77,184 करोड़ और FY27 की पहली तिमाही में ₹93,967 करोड़ हुआ. ये बढ़त सालाना 33.1% थी. तब हिस्सेदारी घटने के बावजूद NSE का प्रीमियम कारोबार 15.9% बढ़ा. FY26 में ऑप्शंस की कमाई सिर्फ़ 1.9% घटी थी. पहली तिमाही में ये सालाना 15.6% बढ़कर ₹2,744 करोड़ हुई. यानी हिस्सेदारी घटने का कमाई पर उतना असर नहीं पड़ा, क्योंकि पूरा बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा था.
#2 10 साल पुराने मामलों से राहत मिली
2016 में NSE की लिस्टिंग अटकाने वाले पुराने मामले काफ़ी हद तक सुलझ गए हैं. FY24 से FY26 तक SEBI के साथ मामलों के निपटारे पर ₹2,174 करोड़ का ख़र्च दर्ज हुआ. इसमें कोलोकेशन और डार्क फ़ाइबर मामलों के ₹1,491 करोड़ शामिल हैं. FY26 में ₹1,432 करोड़ का ख़र्च दर्ज होने से EBIT मार्जिन 64.8% रह गया. ये बोझ घटने पर FY27 की पहली तिमाही में ऑपरेटिंग मार्जिन 75% हुआ.
निवेशकों के लिए चिंता की बात क्या है?
#1 हिस्सेदारी अब भी घट रही है
इक्विटी ऑप्शंस के प्रीमियम कारोबार में NSE की हिस्सेदारी हर साल घटी है. FY24 के 96.9% से FY26 में 74.7% और FY27 की पहली तिमाही में 68.5% रह गई. ऑप्शंस में एक्सचेंज की कमाई कैश मार्केट के मुक़ाबले क़रीब 12 गुना है. यानी यहां एक प्रतिशत हिस्सेदारी गंवाना, कहीं और एक प्रतिशत बचाने से कहीं ज़्यादा भारी पड़ता है.
#2 कमाई के दूसरे स्रोत अभी इतने बड़े नहीं हैं
NSE के दूसरे कारोबार अलग तरह से बढ़ते हैं. FY26 के ऑपरेटिंग रेवेन्यू में लिस्टिंग फ़ीस का हिस्सा 2.1%, डेटा फ़ीड का 2.8% और इंडेक्स लाइसेंसिंग का 0.9% था. इनकी कमाई लिस्टिंग, सब्सक्राइबर, एसेट्स और बाज़ार में भागीदारी बढ़ने से बढ़ती है. लेकिन ऑप्शंस में सौदे बढ़ने से कमाई जितनी तेज़ बढ़ती है, यहां वैसी गुंजाइश नहीं है.
NSE IPO की जानकारी
| ब्योरा | जानकारी |
|---|---|
| कुल IPO साइज़ (₹ करोड़) | 22,562 |
| ऑफ़र फ़ॉर सेल (₹ करोड़) | 22,562 |
| फ़्रेश इश्यू (₹ करोड़) | - |
| प्राइस बैंड (₹) | 1700-1785 |
| सब्सक्रिप्शन की तारीख़ें | 17-21 सितंबर, 2026 |
| इश्यू का मक़सद | ऑफ़र फ़ॉर सेल |
IPO के बाद
| ब्योरा | जानकारी |
|---|---|
| मार्केट कैप (₹ करोड़) | 4,41,788 |
| नेटवर्थ (₹ करोड़) | 32,114 |
| प्रमोटर हिस्सेदारी (%) | - |
| P/E (एडजस्टेड मुनाफ़े पर) | 47.9 |
| प्राइस/बुक रेशियो (P/B) | 13.8 |
पिछले सालों के आंकड़े
| मुख्य आंकड़े | 2 साल का CAGR (%) | FY26 | FY25 | FY24 |
|---|---|---|---|---|
| रेवेन्यू (₹ करोड़) | 6 | 16,601 | 17,141 | 14,780 |
| EBIT (₹ करोड़) | 6.1 | 10,749 | 12,259 | 9,543 |
| PAT (₹ करोड़) | 5.9 | 9,228 | 10,978 | 8,224 |
| नेटवर्थ (₹ करोड़) | - | 32,114 | 30,353 | 23,974 |
| कुल क़र्ज़ (₹ करोड़) | - | 412 | 506 | 125 |
| EBIT ब्याज और टैक्स से पहले का मुनाफ़ा है. यहां PAT टैक्स के बाद का मुनाफ़ा है, जिसमें कुछ एकमुश्त फ़ायदे और ख़र्च शामिल नहीं हैं. |
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मुख्य रेशियो
| मुख्य रेशियो | 3 साल का औसत (%) | FY26 | FY25 | FY24 |
|---|---|---|---|---|
| ROE (%) | 35.6 | 29.5 | 40.4 | 37 |
| ROCE (%) | 39.4 | 33.9 | 44.6 | 39.6 |
| EBIT मार्जिन (%) | 66.9 | 64.8 | 71.5 | 64.6 |
| डेट-टू-इक्विटी (गुना) | - | - | - | - |
बाज़ार में हिस्सेदारी
| हिस्सेदारी (%) | FY26 | FY25 | FY24 |
|---|---|---|---|
| कैश मार्केट (टर्नओवर) | 93 | 93.6 | 92.5 |
| इक्विटी फ़्यूचर्स (टर्नओवर) | 99.8 | 99.9 | 99.9 |
| इक्विटी ऑप्शंस (प्रीमियम टर्नओवर) | 74.7 | 87.4 | 96.9 |
क्या IPO की क़ीमत सही है?
ऊपरी प्राइस बैंड पर NSE का वैल्यूएशन एडजस्टेड मुनाफ़े का 48 गुना है. पिछले दो साल में मुनाफ़ा सिर्फ़ 6% सालाना बढ़ा, जबकि पिछले दशक में बढ़त 30% सालाना थी. यानी मुनाफ़े की रफ़्तार धीमी पड़ी है, जबकि क़ीमत में तेज़ बढ़त की उम्मीद है.
अर्निंग्स की तुलना में 54 गुने भाव वाले BSE से NSE सस्ता लगता है. लेकिन BSE की क़ीमत में छोटी शुरुआत से लगातार हिस्सेदारी बढ़ने की उम्मीद है. FY26 में BSE का मुनाफ़ा 88% बढ़ा, जबकि रेवेन्यू NSE के एक-तिहाई से भी कम था.
अच्छे कारोबार की ज़्यादा क़ीमत समझ में आती है. लेकिन इसमें हिस्सेदारी संभलने की उम्मीद भी है, जबकि अभी ऐसा हुआ नहीं है. इसलिए चूक की गुंजाइश कम है. ये भाव मानकर चलता है कि बाज़ार तेज़ी से बढ़ेगा और FY24 से घटती हिस्सेदारी की भरपाई होती रहेगी. हिस्सेदारी संभलने से पहले बाज़ार धीमा पड़ा, तो कमाई पर दोहरा दबाव होगा. निवेशकों के लिए, अगली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि NSE की ऑप्शंस हिस्सेदारी स्थिर होती है या नहीं और ऑप्शंस कारोबार बढ़ता है तो कितनी तेज़ी से.
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