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लाइफ़ इंश्योरेंस के कुल भुगतान में डेथ क्लेम का हिस्सा सिर्फ़ 7%

IRDAI के अपने कंसल्टेशन पेपर से पता चलता है कि सरेंडर पेआउट, डेथ क्लेम से पांच गुना ज़्यादा हैं, यह इंडस्ट्री प्रोटेक्शन नहीं बल्कि एग्ज़िट बेच रही है

IRDAI के अपने कंसल्टेशन पेपर से पता चलता है कि सरेंडर पेआउट, डेथ क्लेम से पांच गुना ज़्यादा हैं, यह इंडस्ट्री प्रोटेक्शन नहीं बल्कि एग्ज़िट बेच रही हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः लाइफ़ इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा दिए गए कुल ₹6.3 लाख करोड़ में से 7% हिस्सा डेथ क्लेम का था और 37% हिस्सा सरेंडर का था. आधे पॉलिसीहोल्डर पांच साल के अंदर ही पॉलिसी छोड़ देते हैं और ज़्यादातर लोगों को इसमें नुकसान होता है. 'प्लेन टर्म इंश्योरेंस' ही एकमात्र ऐसा लाइफ़ इंश्योरेंस प्रोडक्ट है जो असल में लाइफ़ इंश्योरेंस है.

लाइफ़ इंश्योरेंस कंपनियों ने कुल ₹6.3 लाख करोड़ का भुगतान किया, जिसमें डेथ क्लेम का हिस्सा सिर्फ़ 7 प्रतिशत रहा. वहीं सरेंडर पेआउट का हिस्सा 37 प्रतिशत था. इन दोनों आंकड़ों को साथ रखकर देखिए, तो आपको इस इंडस्ट्री की असली तस्वीर दिख जाएगी, और वह भी ख़ुद इसके रेगुलेटर की ज़ुबानी.

ये आंकड़े IRDAI के हालिया कंसल्टेशन पेपर से लिए गए हैं. 120 पन्नों के इस दस्तावेज़ को लोगों ने इन आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि नए कमीशन रेट्स की वजह से पढ़ा. कुल भुगतान में मैच्योरिटी बेनिफ़िट का हिस्सा 35 प्रतिशत रहा और बाक़ी 20 प्रतिशत एन्युटी और पेंशन भुगतान में गया. यानी पॉलिसी बीच में छोड़ने वाले ग्राहकों को लौटाई गई रक़म, उन परिवारों को दी गई रक़म से पांच गुना है जिनके पॉलिसीधारक की मौत हो गई.

यह उस इंडस्ट्री के लिए असहज करने वाली सच्चाई होनी चाहिए, जिसके होने का पूरा तर्क ही यह है कि वह परिवार के कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद परिवार को आर्थिक मुश्किलों से बचाती है. कुल भुगतान के मुक़ाबले डेथ क्लेम की रक़म मामूली सी है. यह इंडस्ट्री असल में चाहे जो भी करती हो, मौत के जोख़िम से सुरक्षा देना उसकी प्राथमिकताओं में बहुत नीचे है.

पेपर में दिया गया एक दूसरा आंकड़ा पहले आंकड़े की वजह बताता है. पूरी इंडस्ट्री में 61वें महीने पॉलिसी बने रहने का आंकड़ा 48 प्रतिशत है, यानी आधे से ज़्यादा पॉलिसीधारक पांच साल पूरे होने से पहले ही प्रीमियम भरना बंद कर देते हैं. कुछ इंश्योरेंस कंपनियों में तो 10वें साल तक चालू रहने वाली पॉलिसी सिर्फ़ 8 प्रतिशत रह जाती हैं. शायद मुझे 'पॉलिसीधारक' की जगह 'पीड़ित' शब्द का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए.

लेकिन यह पेपर इस आंकड़े को बिक्री के ज़रिये के हिसाब से भी अलग-अलग करके दिखाता है. जो पॉलिसी ऑनलाइन, बिना किसी एजेंट के ख़रीदी गईं, उनकी 61वें महीने की पर्सिस्टेंसी 71 प्रतिशत है. जिस ख़रीदार पर बिक्री का कोई दबाव नहीं था और जिसने ख़ुद सोच-समझकर चुना, वह पॉलिसी को बनाए रखता है. 48 और 71 के बीच का यह फ़ासला, ग्राहक के फ़ायदे वाली सलाह और बेचने वाले के फ़ायदे वाली सलाह का फ़र्क़ दिखाता है.

वजह साफ़ है. सेविंग्स से जुड़ी पॉलिसी पर पहले साल का कमीशन प्रीमियम का 25 से 37 प्रतिशत तक होता है और कुछ कंपनियों में पहले साल का कुल डिस्ट्रिब्यूशन ख़र्च 60 से 80 प्रतिशत के चौंकाने वाले स्तर तक पहुंच जाता है. इन्हीं प्रोडक्ट्स पर रिन्यूअल कमीशन सिर्फ़ 0 से 5 प्रतिशत है. जब सेल्स टीम को सारा पैसा पहले ही साल में मिल जाए और बाद में कुछ नहीं, तो उसका ध्यान पॉलिसी चालू रखवाने पर नहीं, बल्कि नई पॉलिसी बेचने पर ही रहेगा. फिर अगर नतीजा ठीक यही निकला है, तो इसमें किसी को हैरानी क्यों होनी चाहिए?

जो लोग पांच साल पर पॉलिसी छोड़ते हैं, उन्हें आमतौर पर अपना चुकाया हुआ प्रीमियम भी पूरा वापस नहीं मिलता. रिटर्न की तो बात ही छोड़िए, उन्हें सीधा नुक़सान होता है. इंडस्ट्री अपने बचाव में कहती है कि ये सेविंग्स प्रोडक्ट हैं और इन्हें सुरक्षा के पैमाने पर परखना ठीक नहीं क्योंकि ग्राहक मैच्योरिटी पर मिलने वाली रक़म के लिए आते हैं. यही दलील असल में बात को साबित कर देती है. एक ऊंचे कमीशन वाला इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट, जिसमें ऊपर से थोड़ा सा इंश्योरेंस जोड़ दिया गया हो और जिसे इंश्योरेंस कंपनी बेचे, अपनी बनावट से ही मिस-सेलिंग है. यह न तो निवेश का काम ठीक से करता है और न ही सुरक्षा का.

अगर आपके पास भी ऐसी कोई पॉलिसी है, तो सरेंडर के ये आंकड़े आपके बारे में ही हैं, और फ़ैसला उतना आसान नहीं जितना ये आंकड़े दिखाते हैं. जो प्रीमियम आप गंवा चुके हैं, वह तो जा चुका है, आप चाहे जो भी करें. सिर्फ़ ग़लत ख़रीदारी मानने से बचने के लिए अगले 15 साल तक प्रीमियम भरते रहना, पांच साल के नुक़सान को 20 साल का नुक़सान बना देता है. यह देखिए कि पॉलिसी यहां से आगे आपको कितना देगी, फिर उसकी तुलना उतने ही सालाना ख़र्च में लिए गए टर्म प्लान और इंडेक्स फ़ंड के कॉम्बिनेशन से कीजिए, और इन्हीं दो आंकड़ों के आधार पर फ़ैसला लीजिए.

इसमें से कुछ भी पॉलिसी बेचने वाले लोगों की आलोचना नहीं है. वे उसी ढांचे और इंसेंटिव के भीतर काम करते हैं जो उनके लिए बनाया गया है. यह पेपर उसी नतीजे की ओर इशारा करता है जिस पर हर समझदार बचत करने वाला पहले ही पहुंच चुका था: सीधा-सादा टर्म इंश्योरेंस हमेशा से, और हमेशा रहेगा, अकेला ऐसा लाइफ़ इंश्योरेंस प्रोडक्ट जो समझ में आता है, क्योंकि सिर्फ़ वही असल में लाइफ़ इंश्योरेंस है.

यह पेपर उसी बात की ओर इशारा करता है, जिसे हर समझदार बचत करने वाला पहले ही समझ चुका है: सादा टर्म इंश्योरेंस ही एक ऐसा लाइफ़ इंश्योरेंस प्रोडक्ट है, जो सही मायने में काम का है. असल में वही लाइफ़ इंश्योरेंस है.

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