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धनतेरस पर सोना ख़रीदना निवेश नहीं है

परंपरा निभाइए, लेकिन गहनों की ख़रीदारी को ख़र्च में गिनिए. मुश्किल वक़्त के लिए रखा सोना ऐसा होना चाहिए जिसे कम ख़र्च में आसानी से बेचा जा सके. हार और चूड़ियां इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते.

परंपरा निभाइए, लेकिन गहनों की ख़रीदारी को ख़र्च में गिनिए. मुश्किल वक़्त के लिए रखा सोना ऐसा होना चाहिए जिसे कम ख़र्च में आसानी से बेचा जा सके. हार और चूड़ियां इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः धनतेरस पर करोड़ों लोग सोना ख़रीदते हैं और इसे निवेश मानते हैं. मगर गहनों के साथ चुकाया गया मेकिंग चार्ज वापस नहीं मिलता. सिक्के लॉकर में रखिए, तो उसका किराया देना पड़ता है. त्योहार की ख़ुशी अपनी जगह है, निवेश का हिसाब अपनी जगह. आर्थिक सुरक्षा के लिए सोना रखना है, तो उसे रखने और बेचने का ख़र्च भी देखना होगा.

हर साल दिवाली के आसपास एक दिलचस्प नज़ारा दिखता है. जिन लोगों ने कभी बैठकर अपने निवेश की योजना नहीं बनाई, वे भी धनतेरस पर सोना ख़रीदने निकल पड़ते हैं. ज्वेलरी की दुकानें देर रात तक खुली रहती हैं. कई दुकानों के बाहर क़तारें लगी होती हैं. लगभग पूरा देश एक ही दिन, एक ही तरह की ख़रीदारी करता है. और ज़्यादातर ख़रीदारों को लगता है कि वे निवेश कर रहे हैं.

यहां मैं अपनी बात ज़रा संभलकर कहना चाहूंगा. ये कॉलम पैसे के बारे में है, हमारी संस्कृति के बारे में नहीं. दिवाली का मौसम ख़ूबसूरत होता है और धनतेरस उसकी ख़ुशियों का एक ख़ास हिस्सा है. दीयों की रोशनी, घर की सफ़ाई, नई शुरुआत का एहसास और अपनों का साथ. इनमें कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं है, ख़ासकर मेरी सलाह पर तो बिल्कुल नहीं. अगर आपका परिवार थोड़ा सोना ख़रीदकर सुख-समृद्धि का स्वागत करता है, तो ख़ुशी से ख़रीदिए. दिक़्क़त इस परंपरा में नहीं है. दिक़्क़त तब होती है, जब हम परंपरा निभाने और निवेश करने को एक ही बात समझ लेते हैं.

गहनों की ख़रीदारी को ख़र्च मानिए

ज़रा देखिए कि धनतेरस पर ज़्यादातर परिवार क्या ख़रीदते हैं. आमतौर पर गहने, जिनकी क़ीमत में मेकिंग चार्ज के नाम पर मोटी रक़म जुड़ी होती है. ये वो पैसा है, जो गहना बेचते वक़्त वापस नहीं मिलेगा. या फिर सोने के सिक्के ख़रीदे जाते हैं, जिन्हें सालों तक बैंक के लॉकर में रखा जाएगा और उसका किराया चुकाया जाएगा. वेल्थ बनाने के नज़रिये से इस ख़रीदारी का हिसाब कमज़ोर है. ये अपने इस्तेमाल और ख़ुशी के लिए किया गया ख़र्च है. और ऐसा ख़र्च करने में कोई बुराई भी नहीं है. लेकिन ख़रीदारी किसी शुभ दिन हुई है, सिर्फ़ इसलिए उसे निवेश नहीं कहा जा सकता.

अब ख़रीदने के इस तरीक़े पर सोचिए. हम किसी दूसरे निवेश के साथ ऐसा नहीं करते. सिर्फ़ शुभ दिन देखकर म्यूचुअल फ़ंड या शेयर ख़रीदने नहीं निकल पड़ते. लेकिन सोने के मामले में करोड़ों लोग ऐसा करते हैं. किसी से कहिए कि आपने एक शेयर ख़रीदने के लिए अमुक दिन चुना है, क्योंकि वो दिन शुभ है. शायद वो तुरंत कहेगा कि ये निवेश का तरीक़ा नहीं है. त्योहार के माहौल में यही बात हमारी नज़र से बच जाती है. जिस तर्क पर किसी और मौक़े पर हम सवाल उठाते, उसे यहां ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेते हैं.

गहने मुश्किल वक़्त में काम आते हैं

गहनों को वेल्थ मानकर सहेजने की परंपरा बेवजह नहीं बनी. इसके पीछे हमारे परिवारों का लंबा अनुभव है. और सच कहें, तो आज भी इनकी अहमियत बनी हुई है. हालांकि, बचत से ज़्यादा ये ज़रूरत पड़ने पर गिरवी रखकर पैसा जुटाने के काम आते हैं. पीढ़ियों से भारतीय परिवारों में जब नक़दी का इंतज़ाम कहीं और से नहीं हो पाता था, तो महिलाओं के गहने आख़िरी सहारा बनते थे. सोना आज भी क़ीमती और भरोसेमंद ज़मानत है. पिछले दो दशकों में इसके बदले क़र्ज़ देने का एक पूरा उद्योग खड़ा हो चुका है.

RBI के आंकड़ों के मुताबिक़, मई 2026 में सिर्फ़ बैंकों का सोने के गहनों के बदले दिया गया बकाया क़र्ज़ लगभग ₹5 लाख करोड़ था. एक साल पहले के मुक़ाबले ये रक़म क़रीब दोगुनी है. NBFC का क़र्ज़ भी जोड़ लें, तो कुल आंकड़ा ₹8 लाख करोड़ से ऊपर चला जाता है. इसके बदले गिरवी रखे सोने की क़ीमत कहीं ज़्यादा होगी. वजह ये है कि क़र्ज़ देने वाले सोने की पूरी क़ीमत के बराबर पैसा नहीं देते. वे उसकी क़ीमत का अधिकतम 75 से 85 प्रतिशत तक क़र्ज़ देते हैं और आमतौर पर इससे भी कम. इस आधार पर गिरवी रखे गहनों की क़ीमत ₹11 लाख करोड़ से काफ़ी ज़्यादा बैठती है. अब इसे एक और आंकड़े के साथ रखकर देखिए. AMFI के मुताबिक़, भारत के इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में ₹37.5 लाख करोड़ हैं. यानी क़र्ज़ देने वालों की तिजोरियों में गिरवी पड़े सोने की क़ीमत इस रक़म के लगभग एक-तिहाई के बराबर है. फिर भी, गहना गिरवी रखकर पैसा जुटाना मुश्किल वक़्त का इंतज़ाम है, निवेश की स्ट्रैटिजी नहीं. धनतेरस पर सोना ख़रीदने की आदत को भी परंपरा का हिस्सा मानना बेहतर होगा, अपनी फ़ाइनेंशियल योजना का नहीं.

सुरक्षा के लिए सोना रखने का तरीक़ा अलग है

मेरे नियमित पाठक जानते हैं कि पिछले कुछ साल में सोने को लेकर मेरी राय बदली है. मैंने कई बार लिखा है कि पोर्टफ़ोलियो का छोटा हिस्सा सोने में रखना ठीक है. दुनिया की मुद्रा व्यवस्था अब पहले जितनी स्थिर और भरोसेमंद नहीं लगती. ऐसे माहौल में सोना मुझे आर्थिक अनिश्चितता के ख़िलाफ़ बीमा जैसा लगता है. अब सोने रखने को मैं उतना ग़ैरज़रूरी नहीं मानता, जितना पहले मानता था. इस राय पर मैं आज भी क़ायम हूं. लेकिन धनतेरस पर गहने ख़रीदना इस सोच से काफ़ी अलग है. सुरक्षा के लिए रखा सोना आपकी पूरी फ़ाइनेंशियल योजना का छोटा हिस्सा होना चाहिए. साथ ही, उसे ज़रूरत पड़ने पर आसानी से बेच सकना चाहिए. इसके उलट, धनतेरस की ख़रीदारी अक्सर त्योहार के उत्साह में होती है. गहनों के रूप में सोना लेने पर ख़र्च ज़्यादा पड़ता है और बेचते वक़्त लगाई गई पूरी रक़म वापस पाना आसान नहीं होता. सोना जोखिम से बचाव का ज़रिया हो सकता है. लेकिन ज्वेलरी की दुकान से सुंदर बैग में घर लाए गए गहनों को उसी भूमिका में रख देना ठीक नहीं है.

तो इस दिवाली क्या करें?

जब चारों तरफ़ त्योहार का उत्साह हो, ज्वेलरी की दुकानें जगमगा रही हों और आसपास हर कोई कुछ ख़रीद रहा हो, तो आप क्या करें? मेरी सलाह है कि परंपरा निभाइए और उसका आनंद लीजिए. धनतेरस पसंद है, तो गहने ख़रीदिए. ख़ुद पहनिए, अपनों को उपहार में दीजिए और उन्हें पहनकर ख़ुश होते देखिए. बस अपने पैसे का हिसाब रखते वक़्त इस ख़रीदारी को ख़र्च वाले कॉलम में लिखिए, निवेश वाले में नहीं. अगर मक़सद अपने पोर्टफ़ोलियो में सोना रखना है, तो ऐसा विकल्प चुनिए जिसे आसानी से बेचा जा सके और जिसे रखने की लागत कम हो. चूड़ियां और हार इस ज़रूरत के लिए सही विकल्प नहीं हैं.

मैं ये कॉलम पूरा ही कर रहा था कि ज़्यादातर बड़े फ़ंड हाउस ने 16 अक्तूबर से अपने गोल्ड फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स में नया निवेश लेना बंद कर दिया. ख़बरों के मुताबिक़, ये कदम SEBI के कहने पर उठाया गया है. रुपया कमज़ोर है और त्योहारों की मांग के चलते सोने का इंपोर्ट बढ़ने वाला है. हालांकि, डीमैट अकाउंट है तो एक्सचेंज पर गोल्ड ETF अब भी ख़रीदे जा सकते हैं. उधर, ज्वेलरी की दुकानें देर रात तक खुली ही हैं.

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