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क्या सोना बेचने का प्लान है? पर हाथ में उतना पैसा नहीं आएगा जितनी उम्मीद है

दाम तो कहीं भी देख सकते हैं. पर बेचने के बाद असल में कितना मिलेगा और तीन बातें उस आंकड़े के ख़िलाफ़ काम कर रही हैं, जो आपके मन में बैठा है.

दाम तो कहीं भी देख सकते हैं. पर बेचने के बाद असल में कितना मिलेगा और तीन बातें उस आंकड़े के ख़िलाफ़ काम कर रही हैं, जो आपके मन में बैठा है.Sakshi/AI-Generated Image

सारांश: Gold रिकॉर्ड स्तर पर है और बेचने का मन करना स्वाभाविक है. पर आपके हाथ में कितना आएगा, यह इस बात पर टिका है कि आपने उसे किस रूप में रखा है. और ₹2 लाख वाला वो नियम, जो बड़े सौदों के लिए बना था, अब सिर्फ़ 14 ग्राम की बिक्री पर भी लागू हो जाता है.

सोना क़रीब ₹1.54 लाख प्रति 10 ग्राम पर चल रहा है, और चांदी ₹2.4 लाख प्रति किलो से ऊपर. पिछले एक साल में दुनिया के बाज़ार में सोना क़रीब 43% चढ़ा है और चांदी क़रीब 50%. यानी घर के लॉकर में पड़े गहने अचानक उससे कहीं ज़्यादा क़ीमती हो गए हैं, जितना किसी ने सोचा था. तो सवाल उठना स्वाभाविक है. क्या बेच देना चाहिए?

दाम तो आप कहीं भी देख सकते हैं. पर बेचने के बाद असल में आपके हाथ में क्या आएगा, यह कहीं नहीं मिलता. और तीन बातें उस नंबर को घटा देती हैं, जो आपके मन में बैठा है.

टैक्स इस पर टिका है कि सोना किस रूप में है

यहीं सबसे ज़्यादा उलझन रहती है. सोना तो एक ही है, पर उस पर लगने वाला टैक्स एक जैसा नहीं होता.

सोना किस रूप में
कितने समय बाद लॉन्ग-टर्म टैक्स की दर उससे पहले बेचने पर
गहने, सिक्के, बिस्किट 24 महीने 12.50% आपके स्लैब की दर
डिजिटल गोल्ड 24 महीने 12.50% आपके स्लैब की दर
गोल्ड म्यूचुअल फ़ंड या FoF 24 महीने 12.50% आपके स्लैब की दर
गोल्ड ETF (लिस्टेड) 12 महीने 12.50% आपके स्लैब की दर

इस टेबल में सबसे काम की बात आख़िरी पंक्ति है. गोल्ड ETF को सिर्फ़ 12 महीने रखना पड़ता है, जबकि बाक़ी सबको 24 महीने.

ऐसा क्यों है? क्योंकि गोल्ड ETF शेयर बाज़ार पर लिस्टेड होता है. और लिस्टेड चीज़ों के लिए टैक्स का नियम 12 महीने का है, ठीक वैसे ही जैसे शेयरों के लिए है. बाक़ी सब, यानी गहने, सिक्के, डिजिटल गोल्ड और गोल्ड म्यूचुअल फ़ंड, लिस्टेड नहीं हैं, इसलिए उन पर 24 महीने वाला आम नियम लगता है. यानी यह फ़र्क़ सोने की वजह से नहीं है. यह इस वजह से है कि आपने उसे किस रास्ते से ख़रीदा.

एक उदाहरण से देखिए. दो लोगों ने 14 महीने पहले सोना ख़रीदा, और आज दोनों ने बराबर मुनाफ़े पर बेच दिया.

जिसके पास गोल्ड ETF था, वो 12.5% टैक्स देगा. और जिसके पास गहने थे, उसका पूरा मुनाफ़ा उसकी आमदनी में जुड़ जाएगा, और उस पर उसके स्लैब की दर लगेगी. अगर वो 30% स्लैब में है, तो एक जैसे मुनाफ़े पर उसका टैक्स दोगुने से भी ज़्यादा बैठेगा.

और एक ग़लतफ़हमी साफ़ कर लीजिए. सोने पर इंडेक्सेशन नहीं मिलता. "12.5% बिना इंडेक्सेशन या 20% इंडेक्सेशन के साथ" वाला विकल्प सिर्फ़ ज़मीन और मकान पर है.

अगर आपके पास सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड हैं

SGB को लंबे समय से "टैक्स-फ़्री सोना" माना जाता रहा है. पर अब वो बात पूरी तरह सही नहीं रही. बजट 2026 के बाद छूट सिर्फ़ उसी को मिलेगी, जिसने वो बॉन्ड RBI के इश्यू में सीधे ख़रीदा था और पूरे 8 साल तक रखा.

अगर आपने वो बॉन्ड बाज़ार में से किसी और से ख़रीदा है, तो छूट नहीं मिलेगी, 12.5% टैक्स लगेगा. और अगर आप 8 साल पूरे होने से पहले निकलते हैं, चाहे 5 साल बाद मिलने वाली उस खिड़की से ही सही, तो भी छूट नहीं मिलेगी.

₹2 लाख से ऊपर कैश नहीं मिलेगा

अब वो नियम, जो बिना बदले ही आपके दरवाज़े तक आ गया है.

इनकम टैक्स सेक्शन 269ST कहती है कि कोई भी शख़्स, किसी एक इंसान से एक दिन में ₹2 लाख या उससे ज़्यादा कैश नहीं ले सकता. और इसे तोड़ने पर जुर्माना, ली गई पूरी रक़म के बराबर लगता है. यानी ₹4 लाख कैश लिया, तो ₹4 लाख का जुर्माना.

अब आज के दाम पर हिसाब लगाइए. गहने आमतौर पर 22 कैरेट के होते हैं, जिनका दाम क़रीब ₹1.41 लाख प्रति 10 ग्राम बैठता है. और बेचते वक़्त आपको इसी हिसाब से पैसा मिलता है.

इस दर पर सिर्फ़ 14 ग्राम गहने ही ₹2 लाख की लकीर पार कर जाते हैं. यानी एक मामूली सी चेन, या एक जोड़ी चूड़ी.

एक साल पहले, जब सोना ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम था, इस लकीर तक पहुंचने में क़रीब 22 ग्राम लगते थे. यह नियम बड़े सौदों के लिए बना था. पर तेज़ी ने आम घरों को चुपचाप इसके दायरे में ला खड़ा किया. क़ानून नहीं बदला, दाम बदल गया.

इससे तीन बातें निकलती हैं.

जुर्माना लेने वाले पर लगता है. यही वजह है कि कोई ढंग का जौहरी आपको ₹2 लाख से ऊपर कैश नहीं देगा. वो अपने बचाव में ऐसा करता है. इसलिए इससे ऊपर का पैसा बैंक के रास्ते से ही आएगा, जैसे NEFT, RTGS, IMPS, UPI या अकाउंट-पेयी चेक.

बांटने से भी कुछ नहीं होगा. यह नियम तीन तरह से लिखा गया है, यानी एक दिन में, एक सौदे में, और एक मौक़े से जुड़े सौदों में. तो एक बिक्री को कई बिलों में तोड़कर या कई दिनों में फैलाकर इससे बचा नहीं जा सकता.

PAN देना पड़ेगा. नियम 114B के तहत ₹2 लाख से ऊपर की बिक्री पर PAN देना ज़रूरी है. जिनके पास PAN नहीं है, वो फ़ॉर्म 97 दे सकते हैं, जो 1 अप्रैल 2026 से पुराने फ़ॉर्म 60 की जगह आया है.

जौहरी आपका PAN उस बिक्री के साथ दर्ज कर लेता है. यानी उस सौदे का निशान पीछे छूट जाता है. और यह तब मायने रखता है, जब वो मुनाफ़ा आपके टैक्स रिटर्न में न दिखे.

गहनों पर एक और नुक़सान

भारत में ज़्यादातर सोना किसी निवेश वाले प्रोडक्ट में नहीं, गहनों में ही पड़ा है. और यहीं तीसरी दिक़्क़त आती है.

जब आपने वो गहने ख़रीदे थे, तो बिल में सिर्फ़ सोने का दाम नहीं था. उसमें मेकिंग चार्ज भी था और 3% GST भी. पर बेचते वक़्त ज़्यादातर जौहरी सिर्फ़ सोने के वज़न और शुद्धता का पैसा देते हैं. मेकिंग चार्ज वापस नहीं आता, और पुराने गहनों पर टूट-फूट के नाम पर कुछ पैसा और काट लिया जाता है.

पर यहां एक राहत है, जो बहुत कम लोग जानते हैं. टैक्स के हिसाब में आपकी ख़रीद लागत पूरे बिल की रक़म मानी जाती है, यानी मेकिंग चार्ज और GST भी उसमें जुड़ जाते हैं. इससे आपकी लागत बढ़ जाती है, और टैक्स वाला मुनाफ़ा घट जाता है.

इसलिए अपने पुराने बिल संभालकर रखिए. उनके बिना अपनी लागत साबित करना मुश्किल हो जाता है, और टैक्स उससे ज़्यादा बैठ सकता है जितना बैठना चाहिए था.

और अगर सोना विरासत में मिला हो

भारतीय परिवारों में बहुत सारा सोना ख़रीदा हुआ नहीं, पीढ़ियों से चला आया होता है. और यहां का नियम आपके हक़ में है.

विरासत में मिले सोने पर पहले मालिक की ख़रीद लागत और उनका रखने का समय, दोनों आपके खाते में आ जाते हैं. यानी आपकी मां ने जो गहने 1990 के दशक में ख़रीदे थे, उन पर आपके पास आते ही 24 महीने की नई गिनती शुरू नहीं होती. वो सारे साल गिने जाते हैं. इसीलिए ऐसी बिक्री लगभग हमेशा 12.5% वाली दर में आ जाती है.

दिक़्क़त सबूत की है. जहां कोई पुराना बिल ही न हो, वहां 1 अप्रैल 2001 की बाज़ार क़ीमत को लागत माना जाता है, बशर्ते वो सोना उस तारीख़ से पहले ख़रीदा गया हो. इसे बेचने के बाद नहीं, पहले ही अपने टैक्स सलाहकार से तय कर लीजिए.

एक उदाहरण से पूरा हिसाब

मान लीजिए आपने मार्च 2022 में ₹3.5 लाख के गहने ख़रीदे थे, जिसमें सोना, मेकिंग चार्ज और GST, तीनों शामिल थे. और आज बेचने पर ₹5.20 लाख मिल रहे हैं. रखने का समय 24 महीने से ज़्यादा है, इसलिए लॉन्ग-टर्म वाला नियम लगेगा.

ख़रीद लागत: ₹3,50,000 (पूरे बिल की रक़म)

मुनाफ़ा: ₹5,20,000 − ₹3,50,000 = ₹1,70,000

अब इस ₹1,70,000 पर 12.5% टैक्स बनेगा, यानी ₹21,250.

और उसके ऊपर 4% सेस लगेगा. सेस का मतलब है टैक्स के ऊपर लगने वाला एक और टैक्स, जो सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए लेती है. यह आपके पूरे मुनाफ़े पर नहीं, सिर्फ़ टैक्स की रक़म पर लगता है. यानी ₹21,250 का 4%, जो ₹850 बैठता है.

तो कुल टैक्स हुआ ₹22,100.

तो ऊपर का दाम चाहे जितना चौंकाने वाला दिखे, आपका असल मुनाफ़ा वही है जो इन सबके बाद बचता है. और ₹2 लाख से ऊपर की रक़म आपके बैंक अकाउंट में आएगी, हाथ में नहीं.

तो बेचना चाहिए या नहीं?

सोना आगे कहां जाएगा, यह हम नहीं बताएंगे, क्योंकि यह कोई नहीं जानता. पर तीन सवाल हैं, जिनसे आपका फ़ैसला ख़ुद हो जाएगा.

  1. आपने वो सोना ख़रीदा क्यों था? अगर वो बेटी की शादी या किसी और तय काम के लिए रखा है, तो बाज़ार का दाम देखने की ज़रूरत ही नहीं. उस सोने का काम पहले से तय है.
  2. आपके पोर्टफ़ोलियो में सोना कितना बड़ा हो गया है? यह सवाल लगभग कोई नहीं पूछता, और यही सबसे अहम है. जिसके निवेश में दो साल पहले 10% सोना था, आज उसका हिस्सा क़रीब दोगुना हो चुका होगा. और वो भी एक ग्राम ख़रीदे बिना. उन्होंने अपना एलोकेशन नहीं बदला, तेज़ी ने उनके लिए बदल दिया. सोना आमतौर पर पोर्टफ़ोलियो का 5% से 10% रखने की सलाह दी जाती है. अगर आपका उससे कहीं आगे निकल गया है, तो उसे वापस उसी तरफ़ लाना सिर्फ़ अनुशासन है. यह बाज़ार का अंदाज़ा लगाना नहीं है. यह उस हिस्से पर लौटना है, जो आपने ठंडे दिमाग़ से ख़ुद तय किया था.
  3. क्या थोड़ा रुकने से टैक्स बच जाएगा? अगर आपके सोने को रखे हुए 24 महीने पूरे होने वाले हैं, या ETF के मामले में 12 महीने, तो कुछ हफ़्तों का सब्र आपको स्लैब की ऊंची दर से 12.5% पर ले आ सकता है. अक्सर यही सबसे बड़ी बचत होती है.

आख़िर में, सोना है किस काम के लिए

आपके पोर्टफ़ोलियो में सोने का काम दौलत बनाना नहीं है. वो इंश्योरेंस की तरह काम करता है. उसकी जगह इसलिए बनती है कि जब बाक़ी सब गिरता है, तब वो टिका रहता है.

और इसीलिए उसे एक छोटा, तय हिस्सा रहना चाहिए. जब वो बहुत आगे निकल जाए तो थोड़ा घटा दीजिए, और जब पीछे रह जाए तो थोड़ा बढ़ा लीजिए.

सालों में यही आदत काम आती है. यह अंदाज़ा लगाना नहीं कि दाम कहां तक जाएंगे.

यह भी पढ़ें: क्या बड़ा कैपिटल गेन हुआ है? ऐसे लग सकता है कम टैक्स

ये लेख पहली बार सितंबर 11, 2026 को पब्लिश हुआ.

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