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आपका फ़ंड नुक़सान में है? इसका मतलब यह नहीं कि फ़ंड ख़राब है

सितंबर और अक्तूबर ने ज़्यादातर पोर्टफ़ोलियो को लाल कर दिया है, पर ये आंकड़ा आपके चुने हुए फ़ंड से ज़्यादा इस बारे में बताता है कि आपने निवेश कब किया

सितंबर और अक्तूबर ने ज़्यादातर पोर्टफ़ोलियो को लाल कर दिया है, पर ये आंकड़ा आपके चुने हुए फ़ंड से ज़्यादा इस बारे में बताता है कि आपने निवेश कब कियाAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः लगातार दो महीने की गिरावट के बाद कई निवेशक अच्छे फ़ंड्स के आगे भी लाल निशान देखकर उनसे निकलना चाहते हैं. लेकिन इंडेक्स में 24% गिरावट के बीच अगर फ़ंड 18% गिरा हो तो इसका मतलब है कि उसने अच्छा प्रदर्शन किया है. नुक़सान टाइमिंग की वजह से है. किसी फ़ंड को उसकी कैटेगरी के दूसरे फ़ंड्स के मुक़ाबले एक साल या उससे ज़्यादा के दौर में परखें, और चिंता तभी करें जब वो एक साल से ज़्यादा समय तक सबसे निचले पायदान के आसपास बना रहे.

मान लीजिए, एक निवेशक बाज़ार के पीक पर पहुंचने से कुछ महीने पहले एक अच्छे इक्विटी फ़ंड में बड़ी रक़म लगाता है. फ़ंड अच्छी तरह मैनेज किया जाता है और इसके बाद आई गिरावट में ये 18% गिरता है, जबकि इंडेक्स 24% नीचे आ जाता है. किसी भी समझदारी भरे पैमाने पर देखें, तो फ़ंड ने अच्छा काम किया है: बाज़ार तेज़ी से गिरा, लेकिन फ़ंड मैनेजर फ़ंड को उससे काफ़ी कम गिरने देने में कामयाब रहा. जब बाज़ार पलटेगा, तो ये बढ़त काम आएगी. फ़ंड को अपनी शुरुआती जगह पर लौटने के लिए क़रीब 22% चढ़ना होगा, जबकि इंडेक्स को क़रीब 32%.

लेकिन हमारे निवेशक को इसमें कोई अच्छी ख़बर नज़र नहीं आती. उसकी स्क्रीन पर इस फ़ंड के आगे एक बड़ा लाल आंकड़ा दिखता है. फ़ंड ने इंडेक्स को पीछे छोड़ दिया, ये बात उसे कोई बेमानी आंकड़ा लगती है.

दो अलग-अलग पैमाने

दिक़्क़त साफ़ है: दो अलग-अलग चीज़ों की तुलना हो रही है. ख़ासकर गिरावट के दौरान, बेंचमार्क के मुक़ाबले देखें तो Value Research समेत कोई भी एनालिस्ट यही कहेगा कि इस फ़ंड ने अच्छा किया. लेकिन निवेशक का पैमाना बेंचमार्क के मुक़ाबले रिटर्न नहीं, बल्कि उसका अपना एब्सल्यूट रिटर्न है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि उसने किस तारीख़ को निवेश किया, एकमुश्त पैसा लगाया या SIP से और सीधे कहें तो वो बाज़ार के साइकिल में किस मोड़ पर दाख़िल हुआ. मेरा अनुभव कहता है कि बेचने का फ़ैसला उसके अपने घाटे से निकलता है, लेकिन उसे सही ठहराने के लिए वो दोष फ़ंड पर डाल देता है. इससे निवेशक उस ज़िम्मेदारी से बच निकलता है जो उसे लेनी चाहिए और उसे फ़ंड मैनेजर के सिर डाल देता है.

कुछ ऐसा ही तब होता है जब कोई फ़ंड, जो दो-एक साल पहले सबसे आगे था, अब साधारण हो जाता है. मान लीजिए, किसी फ़ंड ने पिछले साल 8% रिटर्न दिया, लेकिन उसका 5 साल का सालाना रिटर्न 18% है. इक्विटी फ़ंड्स में इस तरह का उतार-चढ़ाव आम बात है, क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड अलग-अलग तरह के सालों से मिलकर बनता है, जिनमें कुछ साल शानदार, कुछ अच्छे, कुछ ख़राब और कुछ बेहद बुरे होते हैं. जो निवेशक कुछ सालों से टिका हुआ है, उसे कई अच्छे सालों के बीच एक फीका साल दिखता है. वहीं जो तेज़ी के बाद आया है, उसे लगता है कि उसे बहलाकर ऐसा फ़ंड थमा दिया गया जो कभी अच्छा था, लेकिन अब अचानक ख़राब हो गया. फ़ंड वही है, लेकिन दोनों निवेशकों का अनुभव एकदम उलटा है.

जब मनोविज्ञान हिसाब बिगाड़ दे

ये सब इसलिए मायने रखता है और इसीलिए मैं इसे कुछ उबाऊ ढंग से विस्तार में समझा रहा हूं, क्योंकि यहां मनोविज्ञान पूरा हिसाब-किताब बिगाड़ सकता है. आपके पोर्टफ़ोलियो ट्रैकर पर दिखने वाला लाल आंकड़ा तब तक सिर्फ़ काग़ज़ी घाटा है, जब तक आप ख़ुद को बेचने के लिए राज़ी नहीं कर लेते. उसी पल वो असली घाटा बन जाता है. कभी-कभार थोड़े समय के लिए आने वाली ज़बरदस्त तेज़ी को छोड़ दें, तो इक्विटी निवेश सालों के धैर्य और निरंतरता का इनाम देता है, साथ ही उस फ़ंड की क्वालिटी का भी, जिसे आप चुनते हैं. SIP के मामले में तो ये बात और भी सही है, जहां रुक-रुककर निवेश करना आपके रिटर्न को गहरी चोट पहुंचा सकता है.

चिंता कब शुरू करें

लेकिन बेशक, कुछ फ़ंड सचमुच कमज़ोर पड़ जाते हैं. ऊपर मैंने जो कहा, उसका ये मतलब नहीं निकालना चाहिए कि हर फ़ंड को उसके प्रदर्शन की परवाह किए बिना हमेशा के लिए रखे रहें. और मैं मानता हूं कि चिंता कब शुरू की जाए, इसकी कसौटी इतनी आसान नहीं है.

सबसे पहले ये देखें कि फ़ंड अपनी कैटेगरी के दूसरे फ़ंड्स के मुक़ाबले कैसा कर रहा है, और Value Research Online पर ये देखना आसान है. एक साल या उससे लंबे दौर पर नज़र डालें, क्योंकि छोटे दौर में तरह-तरह के बेतरतीब उतार-चढ़ाव होते हैं. जो फ़ंड कुछ समय तक शानदार प्रदर्शन करते हैं, वो परफ़ॉर्मेंस टेबल में खिसककर बीच में आ सकते हैं, जो स्वाभाविक भी है और आम भी. लेकिन जब कोई फ़ंड सबसे नीचे के आसपास पहुंच जाए और एक साल से ज़्यादा वहीं टिका रहे, तो मामला अलग है और उस पर ग़ौर से नज़र डालने की ज़रूरत है. एक और काम की कसौटी है 5 और 7 साल का रिटर्न, जो फ़ंड की हाल की दिक़्क़तों को लंबे संदर्भ में रखता है और दिखाता है कि वो अब भी धैर्य का हक़दार है या नहीं.

यही कसौटियां उलटी स्थिति में भी आपको बचाती हैं: हो सकता है आपने ऐसे फ़ंड में पैसा लगाया हो जो बिगड़ रहा है, लेकिन आपके निवेश की टाइमिंग की वजह से स्क्रीन पर आंकड़ा अब भी हरा दिख रहा हो. इसलिए एक अच्छे निवेशक को ये कसौटियां उन फ़ंड्स पर भी लागू करनी चाहिए जो मुनाफ़ा दिखा रहे हैं. बेशक, हाथ से ये सब करना बहुत मेहनत का काम है और आसानी से ध्यान भटकाने वाली चीज़ बन सकता है. लेकिन Value Research Online और दूसरे पोर्टल्स जो टूल्स देते हैं, उनकी मदद से आप इसे ऑटोमेट करके बैकग्राउंड में चलने दे सकते हैं. आपकी स्क्रीन पर दिखते आंकड़े का रंग आपकी टाइमिंग के बारे में बताता है, आपके फ़ंड के बारे में नहीं.

यह वीडिया देखिएः निवेश की शुरुआत के लिए बेस्ट फ़ंड्स

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