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सारांशः विरासत में मिले पोर्टफ़ोलियो पर टैक्स को विरासत टैक्स (inheritance tax) नहीं कहते. यह मौत के वक़्त नहीं लगता. यह सालों बाद लगता है जब नॉमिनी बेचता है. और अगली पीढ़ी के लिए वेल्थ बनाने वाले ज़्यादातर निवेशकों ने इस बारे में कभी नहीं सोचा होगा.
भारत में कोई विरासत टैक्स नहीं है. लेकिन आपके नॉमिनी को ₹3.5 करोड़ के इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो पर क़रीब ₹39 लाख टैक्स देना पड़ सकता है. और उतने ही मूल्य के NPS अकाउंट पर कोई टैक्स नहीं लगता. विरासत मिलने पर ख़ुद कोई टैक्स नहीं लगता. लेकिन नॉमिनी को पैसा मिलने के बाद क्या होता है, यह हर प्रोडक्ट में बहुत अलग है. और ज़्यादातर रिटायरमेंट पोर्टफ़ोलियो इन फ़र्क़ को ध्यान में रखे बिना बनाए जाते हैं.
म्यूचुअल फ़ंड और शेयरों में क्या होता है
इस मामले में आयकर क़ानून की दो धाराएं नतीजा तय करती हैं.
धारा 49(1) कहती है कि वारिस को मूल ख़रीद क़ीमत मिलती है. धारा 2(42A) कहती है कि वारिस को मूल होल्डिंग पीरियड भी मिलता है. नॉमिनी की घड़ी उस दिन से नहीं चलती जब उसे यूनिट मिलीं. यह उस दिन से चली जब मृतक ने ख़रीदी थीं.
जब नॉमिनी बेचता है तो मूल ख़रीद तारीख़ से पूरी बढ़त पर कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है. इक्विटी फ़ंड के लिए एक वित्त वर्ष में ₹1.25 लाख से ज़्यादा के लॉन्ग-टर्म गेन पर 12.5% टैक्स लगता है.
यही टैक्स की असली मार है. दशकों की कंपाउंडेड ग्रोथ एक ही बार में टैक्स में फंसती है जब नॉमिनी बेचता है. इक्विटी पर कैपिटल गेन्स टैक्स टल जाता है, ख़त्म नहीं हो जाता.
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NPS में क्या होता है
फ़ाइनैंस एक्ट 2016 ने एक साफ़ प्रावधान जोड़ा: सब्सक्राइबर की मृत्यु पर नॉमिनी को दिया गया पूरा NPS कॉर्पस पूरी तरह टैक्स-फ़्री है. कोई आगे चली आई बढ़त नहीं. कोई घड़ी नहीं चलती. पूरी रक़म धारा 80CCD(3) के तहत पास हो जाती है.
इसके पीछे का तर्क सीधा है. NPS “EEE” (Exempt-Exempt-Exempt) कैटेगरी में आता है. कंट्रीब्यूशन, ग्रोथ और निकासी तीनों टैक्स-फ़्री हैं. डेथ बेनेफ़िट को EPF और PPF के साथ एक लाइन में रखा गया है जो दोनों नॉमिनी को टैक्स-फ़्री मिलते हैं.
एक ज़रूरी बात. यह छूट एकमुश्त रक़म पर लागू होती है. अगर नॉमिनी कॉर्पस के हिस्से से एन्युटी ख़रीदे तो बाद में मिलने वाली पेंशन सामान्य आमदनी की तरह टैक्सेबल होगी. ग़ैर-सरकारी सब्सक्राइबरों के लिए नॉमिनी पूरा कॉर्पस एकमुश्त ले सकता है और टैक्स नहीं लगेगा.
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आंकड़े क्या कहते हैं?
30 साल तक इक्विटी फ़ंड में ₹10,000 की मंथली SIP कीजिए. कुल निवेश: क़रीब ₹36 लाख. 12% सालाना रिटर्न पर 30 साल बाद कॉर्पस क़रीब ₹3.5 करोड़ होगा.
नॉमिनी के हाथ में अनरियलाइज़्ड लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन: क़रीब ₹3.14 करोड़. ₹1.25 लाख की सालाना छूट के बाद 12.5% की दर से टैक्स क़रीब ₹39 लाख बनता है. यह नॉमिनी जब भी बेचे तब देना होगा.
वही ₹3.5 करोड़ NPS में हो तो नॉमिनी की एकमुश्त निकासी पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.
इससे निवेश की प्लानिंग पर क्या असर पड़ता है
यह सब कुछ NPS में शिफ़्ट करने की बात नहीं है. NPS में Tier-I का 60 साल तक लॉक-इन है, इक्विटी एक्सपोज़र पर सीमा लागू है और आंशिक निकासी पर पाबंदियां हैं. म्यूचुअल फ़ंड और डायरेक्ट इक्विटी वो देते हैं जो NPS नहीं दे सकता: पूरी इक्विटी भागीदारी, पूरी लिक्विडिटी और शॉर्ट-टर्म फ़्लेक्सिबिलिटी.
तर्क सीमित हैं. अगली पीढ़ी को दी जाने वाली वेल्थ के लिए NPS वो भूमिका निभाता है जो कोई आम इक्विटी प्रोडक्ट नहीं निभा सकता. यह एकमात्र ऐसा इक्विटी-निवेश से जुड़ा भारतीय प्रोडक्ट है जो नॉमिनी को बिना किसी टैक्स के मिलता है. PPF और EPF फ़िक्स्ड-इनकम हिस्से के लिए यही काम करते हैं.
NPS का मामला आमतौर पर धारा 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 के डिडक्शन के आधार पर पेश किया जाता है. यह छोटी दलील है. बड़ी दलील यह है कि जिस दिन आपका नॉमिनी बेचे, उस दिन क्या होता है.
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ये लेख पहली बार मई 20, 2026 को पब्लिश हुआ.
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