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क्‍या आपको भी है फंड बेचने की जल्‍दी

निवेशक जब दबाव में होते हैं तो अक्‍सर सबसे खराब फैसले करते हैं

निवेशक जब दबाव में होते हैं तो अक्‍सर सबसे खराब फैसले करते हैं

एक बार 'अंडरकवर इकोनॉमिस्ट' नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक टिम हारफोर्ड की एक किताब पढ़ते वक्‍त मेरे सामने ताश की पत्तियों के एक खेल पोकर का उदाहरण आया। यह उदाहरण इस बारे में था कि लोग हारने या जीतने पर किस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं। इसके लिए लेखक ने पोकर के अध्ययन में कुछ महीने बिताएं। असल में पोकर का खेल ताश के अन्य खेलों के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यवस्थित और तार्किक होता है। लेखक ने दुनिया में जुए की राजधानी कहे जाने वाले शहर लास वेगास (अमेरिका) में वर्ल्ड सीरीज ऑफ पोकर भी देखी और कुछ बेहद तार्किक खिलाड़ियों की तकनीकों का अध्ययन किया। उन्हीं खिलाड़ियों में एक क्रिस फर्ग्युसन भी हैं जिन्होंने खेल के सिद्धांतों के क्षेत्र में पीएचडी की हुई है और एक वक्‍त विश्व चैंपियन रहे हैं।

ताश के किसी भी अन्य खेल और पोकर में एक बड़ा फर्क है। पोकर में खेल के उच्च स्तर तक तार्किक विश्लेषण किया जा सकता है। लेकिन जब असल खेल की बात आती है, तो यह ऐसा खेल है जिसमें भाव और मनोविज्ञान बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पोकर खिलाड़ियों ने हारफोर्ड को बताया कि खेल के दौरान एक ऐसा विशिष्ट क्षण आता है, जब किसी खिलाड़ी के भावावेश में बहने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। यही भावावेश उसे कई बार गलत फैसले लेने को मजबूर करता है। ऐसे खास क्षणों की बात करें, तो यह भावावेश तब पैदा होता है, जब खिलाड़ी बड़ा नुकसान झेल चुका होता है| यही वो वक्‍त होता है जब वह खिलाड़ी अनाप-शनाप और ऐसे दांव लगाता है, जिसके पीछे तर्क का कोई वास्ता नहीं होता। इस तरह का भावावेश तब भी होता है जब खिलाड़ी को लगता है कि असल में उसे जीतना चाहिए था, लेकिन कोई मामूली चूक से वह जीत नहीं पाया। इन सभी परिस्थितियों में खिलाड़ी को करना यह चाहिए, था कि वह नुकसान को स्वीकार करता और रणनीति में उचित बदलाव के साथ जो भी कदम उठाना चाहिए था, उठाता।

बहरहाल, असल में यह होता है कि ज्यादातर खिलाड़ी मानसिक तौर पर हार को स्वीकार नहीं कर पाते। हारने की सूरत में वे जीत हासिल करने के लिए ज्यादा आक्रामक और जोखिम भरी रणनीतियां बनाते हैं। वे वह पूरी रकम जीत लेना चाहते हैं जिस पर वे अपना अधिकार समझते थे। लेकिन असल में ऐसा फिर भी नहीं हो पाता। उन्हें यह समझना चाहिए होता है कि क्या हो रहा है, यह समझने और उसके हिसाब से रणनीति बनाने का वक्‍त आ गया है।

क्या किसी को लगता है कि निवेश में भी करीब-करीब ऐसा ही होता है? बिल्कुल होता है। इक्विटी निवेशक यही तो करते हैं। उनके व्यवहार का हर पहलू उसी पोकर खिलाड़ी की तरह होता
है। निवेश की दुनिया के दो बुनियादी कौशल होते हैं। पहला, घाटा होने की संभावना वाली परिस्थितियों को पहचान लेना। दूसरा, इसे संभालने के लिए हीरो बनने की कोशिश नहीं करना | म्यूचुअल फंड निवेशकों के निवेश व्यवहार में जुए वाला दांव-पेच रत्तीभर भी नहीं होना चाहिए। लेकिन मैं देखता हूं कि वे भी इसी तरह की सोच पाले रहते हैं कि घाटे वाला कोई मौका आया नहीं कि अनाप-शनाप दांव लगाएं या हीरो बनकर परिस्थिति को संभाल लें।

असल में बेहद मंझे म्यूचुअल फंड निवेशकों में भी ऐसा तबका है, जिसक सोच में एक बड़ा “ब्लाइंड स्पॉट' (मोटे तौर पर समझ से बाहर की चीज) होता है। कहें तो फंड को बेच लेना जिसकी सोच में बना रहता है। असल में निवेश को लेकर हो रही बातों में निवेश बेचने की बातें ही सबसे ज्‍यादा होती हैं। लेकिन सही मौके पर निवेश बेच पाने की काबिलियत बहुत कम लोगों में होती है।

निवेश को बेच लेने के कई कारण हो सकते हैं। लेकिन सब के सब अच्छे हों, ऐसा कतई जरूरी नहीं होता। हालांकि इसके भी अपवाद हो सकते हैं। लेकिन इसके जो अच्छे कारण हैं, वे निवेशक से जुड़े लगते हैं और बुरे कारण फंड से। चलिए, इसे ठीक से समझाता हूं। जरूरत से ज्‍यादा एक्टिव निवेशक किसी भी फंड निवेश से निकल जाने के तीन कारण बताते हैं। पहला, या तो उन्हें फायदा हुआ, या नुकसान हुआ, या कुछ नहीं हुआ। यह लतीफा लगता है, लेकिन है नहीं। कोई निवेशक कहता है, “मेरा निवेश एक ऊंचाई तक पहुंच गया है, तो क्या मैं मुनाफा कमाने के लिए इसे बेच दूं?' दूसरा निवेशक कहता है, 'फलां निवेश में हाल ही में मुझे थोड़ा नुकसान हुआ है। क्यों न मैं इसे बेच दूं?' तीसरा तर्क यह होता है, 'मेरे निवेश में अब तक नफा-नुकसान तो कुछ हुआ नहीं। तो क्यों न मैं इससे पीछा छुड़ा लूं?' मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि अगर निवेशक ने मन बना लिया है, तो उसे कारण की जरूरत नहीं, वह कोई न कोई बहाना बना ही लेगा। और फिर किसी फंड निवेश को बेचने का सही कारण क्या होना चाहिए ? कम से कम ऊपर के तीनों में से तो अनिवार्य रूप से कोई नहीं । वे तीनों ही निवेश बेचने के सही कारण नहीं हैं।

तो फिर किसी निवेशक को निवेश कब बेचना चाहिए। इसका सही जवाब यही है कि यह आपके निवेश लक्ष्य के हिसाब से होना चाहिए। आप अपने फंड को तभी बेचिए जब आपको रकम की जरूरत हो। आपके निवेश का प्राथमिक लक्ष्य बेचने के लिए निवेश करना नहीं, बल्कि आपके वित्तीय लक्ष्य हासिल करना होना चाहिए।

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