
भारतीय बचतकर्ता और निवेशक टैक्स बचाने के नए तौर तरीके अपना रहे हैं। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि अब इंडीविजुअल निवेशक हर माह 8,000 करोड़ रुपए से अधिक रकम एसआईपी में निवेश कर रहे हैं। ताजे निवेश का यह प्रवाह काफी स्थिर है और एनपीएस और ईपीएफओ की रकम को भी जोड़ लें तो यह भारतीय इक्विटी मार्केट का मजबूत आधार बन गया है।
निवेशक जहां महंगाई दर से अधिक रिटर्न देने वाले और लंबी अवधि के निवेश की नई दुनिया में जा रहे हैं, वहीं कैपिटल गेन्स टैक्स को लेकर हमारा कानून अब भी पुरानी सोच में उलझा हुआ है। भारत में इक्विटी पर कैपिटल गेन्स टैक्स का स्ट्रक्चर बढ़ती अर्थव्यवस्था के बजाए काफी हद 70 के दशक की अमीर विरोधी विचार पर खड़ा है। इसके अलावा यह ऐसे निवेशकों के हितों के खिलाफ काम कर रहा है जो अपने रिटर्न को बढ़ाना चाहते हैं और बड़ी रकम जुटाना चाहते हैं।
इस समस्या की मूल वजह यह है कि टैक्स कानून कैपिटल गेन्स यानी पूंजीगत लाभ होने को ट्रांजैक्शन मानता है। म्युचुअल फंड निवेश में जब भी निवेशक फंड की यूनिट बेचता है तो उसको होने वाला मुनाफा या गेन्स को टैक्स कानून के तहत कैपिटल गेन्स माना जाता है। अगर फंड में निवेश बनाए रखने की अवधि एक साल से कम है तो यह शार्ट टर्म कैपिटल गेन्स है और निवेश बनाए रखने की अवधि 1 साल से अधिक है तो यह लॉंग टर्म कैपिटल गेन्स है। इक्विटी फंड में लॉंग टर्म कैपिटल गेन्स 2005 में खत्म कर दिया गया था और 2018 तक यह शून्य था।
टैक्स कानून कुछ इस तरह का है कि वह लंबी अवधि के निवेशकों को दंडित करता है जबकि यह लंबी अवधि के निवेशकों को प्रोत्साहित करने वाला होना चाहिए। लंबी अवधि के निवेश जैसे सालों या दशकों में एक ऐसा समय आता है जब निवेशक को लगता है कि उसने जिस म्युचुअल फंड में निवेश किया हुआ है उसका बेहतर विकल्प आ गया है। ऐसे में अगर निवेशक उस फंड में निवेश बेच कर रकम दूसरे फंड में लगाता है तो उसे पहले फंड से मिलने वाले मुनाफे पर कैपिटल गेन्स टैक्स देना होगा। तो इससे या तो उसका रिटर्न कम होता है या निवेशक टैक्स देने से बचने के लिए कम रिटर्न के साथ ही समझौता करे। निवेशक अपने निवेश का पूरा फायदा उठा सके इसके लिए जरूरी है कि इक्विटी म्चुचअल फंड का निवेश बेच कर दूसरे इक्विटी फंड में निवेश करने को ट्रांजैक्शन न माना जाए।
यह मांग लंबे समय से की जा रही है। एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड ऑफ इंडिया (एएमएफआई) ने भी वित्त्त मंत्री के सामने इस मांग को रखा था। 2018 के पहले लोग इस मांग को लेकर ज्यादा मुखर नहीं थे क्योंकि लॉग टर्म कैपिटल गेन्स पर टैक्स शून्य था। हालांकि मैं यहां शून्य टैक्स से अलग बात कर रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि अगर कोई अपना निवेश रकम को खर्च करने के लिए भुनाता है तो उस पर कैपिटल गेन्स टैक्स लगना चाहिए। लेकिन लंबी अवधि के निवेश को भुना कर दूसरे फंड में निवेश करने पर टैक्स नहीं लगना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ इसी तरह का प्रावधान टैक्स कानून में पहले से है। सेक्शन 54 में प्रावधान है कि लॉंग टर्म कैपिटल गेन्स को अगर कम अवधि में आवासीय प्रॉपर्टी खरीदने में लगाया जाए तो टैक्स नहीं लगेगा।
हालांकि अजीब बात यह है कि टैक्स कानून में आवासीय प्रॉपर्टी को ऐसा असेट टाइप माना गया है जिसमें रकम को लगाया जाना चाहिए। सेक्शन 54 के तहत आप लंबी अवधि के निवेश को बेच कर मिलने वाली रकम से एक घर खरीद सकते हैं और अगर आप इस घर को तीन साल से अधिक समय तक रखते हैं तो आपको टैक्स नहीं देना होगा। यह विशेष सुविधा किसी और तरह के निवेश पर उपलबध नहीं है।
यह नियम पहले के समय के लिहाज से ठीक था। उस समय घर ही लंबी अवधि का निवेश माना जाता था और लोग बड़ी मुश्किल से घर बना या खरीद पाते थे। बड़ी रकम वाले वित्तीय निवेश बहुत कम होते थे। लेकिन अब कोई बचतकर्ता अपने पर्सनल फाइनेंस को इस तरह से नहीं देखता है। चाहे इस बजट में किया जाए या बाद में सेक्शन 54 का फायदा दूसरी तरह की बचत और असेट्स को भी मिलना चाहिए जिसमें लोग पैसा लगा रहे हैं।
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