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एक लंबा सफर

यह मान लेना सही नहीं है कि कोविड संकट से पैदा हुए हालात अपवाद हैं और निवेश से जुड़े बेसिक, लंबे समय में खुद को साबित कर चुके बचत और निवेश के नियमों ने काम करना बंद कर दिया है

यह मान लेना सही नहीं है कि कोविड संकट से पैदा हुए हालात अपवाद हैं और निवेश से जुड़े बेसिक, लंबे समय में खुद को साबित कर चुके बचत और निवेश के नियमों ने काम करना बंद कर दिया है

मेन स्‍ट्रीम मीडिया यानी अखबार, न्‍यूज चैनल और पत्रिका बहुत सुस्‍त रफ्तार से आगे बढ़ रही मगर उथल पुथल से भरी घटनाओं पर प्र‍तिक्रिया देने में सक्षम नहीं है। इस लिहाज से कोविड महामारी असामान्‍य समस्‍या साबित हो रही है। यह समस्‍या चीन एक ऐसे शहर से शुरू हुई जिसे ज्‍यादातर नहीं जानते होंगे और अब ये मानव जीवन की एक बड़ी समस्‍या के तौर पर देखी जा रही है। हालांकि एक दिन पहले के कोरोना केस के बारे में बड़ी बड़ी हेडलाइन बनाई जा रही हैं लेकिन वास्‍तव में घटनाएं इतनी सुस्‍त रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं कि ऐसा लगता है कि महीनों से कुछ बदला ही नहीं है।

या आपको लगता है कि कुछ बदला है ? यह आर्टिकल लिखते हुए जब मैंने यूरोप के अखबर का पेज खोला तो साफ हो गया कि कोविड के बाद वाली दुनिया को लेकर बदलाव इतना अचानक था जितना कोविड से पहले की दुनिया ने कोविड संकट में फंसी थी। अखबार में मेडिकल से जुड़े आर्टिकल थे और कंपनियां व अर्थव्‍यवस्‍था से किस तरह से बुरे दौर से गुजरने जा रहीं है यह बताया गया था। लेकिन इनमें ऐसा कुछ नहीं था कि आसमान गिरने जा रहा है। जैसा माहौल बना गया था और लोग जिसकी उम्‍मीद भी कर रहे थे। इटली, स्‍पेन और जर्मनी जैसे देशों में डर और शोक जा चुका है। और आगे का रास्‍ता एकदम साफ है।

चीन से लेकर ताइवान और जापान से लेकर अमेरिका और लगभग पूरा यूरोप और काफी हद तक अमेरिका कोविड को लेकर सबसे खराब दौर को पीछे छोड़ चुके हैं। अगर वायरस से स्‍वास्‍थ्‍य पर असर पड़ने की बात करें तो यहां लोगों को इससे उबरने का रास्‍ता दिख रहा है। इन देशों में लॉकडाउन खत्‍म हो चुका है अर्थव्‍यवस्‍था खुल रही है और यहां वहां ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि बहुत बड़ी बाधा जैसा कुछ नहीं है। भारत अभी स्थिति से दूर है लेकिन ये देश भी कई सप्‍ताह पहले उसी तरह के हालात में थे जैसे हालात आजकल भारत में हैं। अब यह बात तो साफ हो गई है कि किसी भी सूरत में यह महामारी अपने आप में स्‍थाई आपदा या लंबी अवधि तक रहने वाली आपदा जैसी तो नहीं है। जैसा कुछ समय पहले बताया जा रहा था।

ये बात हमें यह बताती है कि निवेश के तौर पर हमें किस बात की चिंता करनी चाहिए। वैल्‍यू रिसर्च के प्रकाशनों और मेरे आर्टिकल के पाठक के तौर पर आपने इस बात पर गौर किया होगा कि हमारी हमेशा से राय रही है कि यह भी गुजर जाएगा। इतना ही नहीं है हमने इस बात को जोर देकर कहा था कि कोविड महामारी निवेश के बेसिक नियमों को न तो निलंबित कर सकती है और न ही इसे बदल सकती है। वास्‍तव में कोविड बीमारी निवेश के बेसिक नियमों को और मजबूती देती है। जब अच्‍छा समय चल रहा हो और बाजार में तेजी का दौर हो तो आप कुछ गलत फैसले करके भी बच सकते हैं। लेकिन मुश्किल हालात में कुछ गलत फैसले बहुत ज्‍यादा नुकसान कर सकते हैं।

मैं वह बात फिर से दोहराने जा रहा हूं जो कुछ माह पहले इकोनॉमिक टाइम्‍स में लिखी थी। मेरे कुछ पाठक कहते हैं कि कोविड संकट शुरू होने के बाद से मैं एक मंत्र कुछ ज्‍यादा दोहरा रहा हूं। यह मंत्र है बेसिक पर अड़े रहो। लेकिन वे पूरी तरह से गलत हैं। मैं यह मंत्र पिछले 25 साल से दोहरा रहा हूं। इसका कोविड संकट से कोई लेना देना नहीं है। मुझे उम्‍मीद है कि आने वाले दशकों तक मैं यह करता रहूंगा। सबसे अहम बा उम्‍मीद करता हूं कि आप निवेश में भी इसे अमल में लाते रहेंगे।

कड़वा सच यही है कि हम आज ऐसी स्थिति में हैं जहां पर कोई अनुमान लगाना मुश्किल है। हालांकि हालात उतने मुश्किल नहीं है जितने कुछ माह पहले थे। हमारे साथ बार बार खरे साबित हुए निवेश के कुछ नियम और सिद्धांत हैं और हम क्‍या कदम उठाते हैं यह हमारे हाथ में है। कम अवधि में यह मध्‍यम अवधि में क्‍या होगा इसके बारे में किसी को नहीं पता। हमें अपने कदमों पर फोकस करना चाहिए। हमको अपनी वित्‍तीय जरूरतों और सीमाओं का विश्‍लेषण करते हुए ऐसा रास्‍ता तलाशने का प्रयास करना चाहिए जिससे हम अपनी वित्‍तीय स्थिति को अच्‍छी बनाए रखते हुए इस संकट से बाहर निकल पाएं।

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