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मल्‍टी कैप फंड बन जाएंगे फ्लेक्‍सी कैप फंड

मल्‍टी कैप फंड फ्लेक्‍सी कैप फंड बन जाएंगे लेकिन जो निवेशक छोटी कंपनियों में निवेश करना चाहते हैं उनको ज्‍यादा प्रयास करना होगा

मल्‍टी कैप फंड फ्लेक्‍सी कैप फंड बन जाएंगे लेकिन जो निवेशक छोटी कंपनियों में निवेश करना चाहते हैं उनको ज्‍यादा प्रयास करना होगा

सेबी ने फ्लेक्‍सी कैप फंड के नाम से म्‍युचुअल फंड की नई कैटेगरी पेश की है। फ्लेक्‍सी कैप टर्म म्‍युचुअल फंड निवेशकों के लिए नया नहीं है क्‍योंकि इस टर्म के नाम से फंड बहुत सालों से रहे हैं। अब मल्‍टीकैप कैटैगरी में आने वाले लगभग सभी फंड नई कैटेगरी में शिफ्ट हो जाएंगे। उन निवेशकों के लिए इस मल्‍टी कैप और फ्लेक्‍सी कैप कहानी को समझना जरूरी है जो यह जानना चाहते हैं कि उनके इन्‍वेस्‍टमेंट पोर्टफोलियो में क्‍या हो रहा है।

जानकार फंड निवेशकों को याद होगा कि सितंबर में सेबी ने नया नियम बनाया था जिससे पूरी मल्‍टीकैप कैटैगरी के खत्‍म होने का खतरा पैदा हो गया था। नया नियम मल्‍टी कैप फंड को निवेशकों की रकम का बड़ा हिस्‍सा समाल कैप और मिड कैप कंपनियों में निवेश के लिए मजबूर करता है। 31 जनवरी 2021 तक मल्‍टी कैप फंड को अपनी असेट का कम से कम 25 फीसदी लार्ज, मिड और स्‍माल कैप स्‍टॉक्‍स में निवेश करना था, जिससे कि मल्‍टी कैप फंड सही मायने में मल्‍टी कैप फंड बन जाएं।

मौजूदा समय में ज्‍यादातर मल्‍टी कैप फंड खास तौर पर बड़े मल्‍टी कैप फंड ने कुल रकम का बड़ा हिस्‍सा लार्ज कैप स्‍टॉक्‍स में निवेश किया हुआ है। वास्‍तव में ये एक तरह से लार्ज कैप फंड के ही समान है। सेबी का कहना है कि मल्‍टीकैप का मतलब है कि पूरी रकम को लार्ज, मिड और स्‍माल कैप में समान रूप से निवेश किया जाए। इसलिए सेबी कम से कम 25 फीसदी रकम निवेश करने का नियम लेकर आया।

लेकिन इसके साथ कुछ दिक्‍कतें हैं। कुछ दिक्‍कतें सैद्धांतिक हैं और कुछ व्‍यावहारिक। लार्ज, मिड और स्‍माल कैप की सेबी की ही परिभाषा पर गौर करें तो पता चलता है कि 25 फीसदी की सीमा लागू करने से मल्‍टी कैप फंड में मिड और स्‍माल कंपनियों का बहुत ज्‍यादा प्रतिनिधित्‍व हो जाएगा। अगर आप इक्विटी मार्केट के लिए सेबी की ही परिभाषा लागू करें तो मार्केट की कुल वैल्‍यू का 74.1 फीसदी लार्ज कैप में, 15.6 फीसदी मल्‍टी कैप में और बाकी 11.3 फीसदी स्‍माल कैप में है। अगर कोई मल्‍टी कैप फंड सही मायने में मल्‍टी कैप फंड है तो निवेश की सीमा इन्‍ही वैल्‍यू के आस-पास होनी चाहिए।

हालांकि, यहां एक बड़ी व्‍यावहारिक समस्‍या है। भारतीय इक्विटी मार्केट मिडकैप और स्‍मालकैप के लिए बहुत छोटा है। यह बात गुणवत्‍ता और मात्रा दोनों लिहाज से लागू होती है। यहां गुणवत्‍ता से मेरा मतलब ट्रेडिंग के लिए मार्केट में उपलब्‍ध स्‍टॉक से है। यानी लिक्विडिटी।

तमाम पहलू देखने और फंड कंपनियों से बातचीत करने के बाद सेबी ने नई फ्लेक्‍सी कैटेगरी बनाई है। नाम से ही पता चलता है कि नई कैटेगरी रकम निवेश करने के लिहाज से फंड मैनेजर्स को पूरी आजादी देती है। इसमें सिर्फ न्‍यूनतम 25 फीसदी इक्विटी में निवेश करने की बाध्‍यता है और इसके बाद पूरी आजादी है। यानी मल्‍टी कैप फ्लेक्‍सी कैप बन गया है। जो पहले मल्‍टी कैप फंड हुआ करते थे उनको अब खुद को फ्लेक्‍सी कैप कैटेगरी में लाना होगा।

तो क्‍या यह अच्‍छी बात है ? नहीं। मैंने जिस व्‍यावहारिक समस्‍या की बात ऊपर की है वह अब भी बनी हुई है। सेबी का 25:25:25 का अनुपात बाजार के लिहाज से शायद सही न हो लेकिन जिस सैंद्धांतिक बात पर सेबी ने यह कदम उठाया था वह निश्चित तोर पर सही था। एक जानकार निवेशक जो लार्ज, मिड और स्‍माल कैप में संतुलित निवेश चाहता है वह मल्‍टी कैप फंड में निवेश करेगा लेकिन उसे वास्‍तव में लार्ज कैप फंड मिलेगा। ऐसा इसलिए नहीं होगा क्‍योंकि यह निवेश की सही रणनीति है बल्कि यह इसलिए होगा क्‍योंकि फंड स्‍माल और मिड कैप स्‍टॉक खरीदने के लिहाज से बहुत बड़ा होगा।

नाम बदलने से समस्‍या का समाधान नहीं होता है। वास्‍तव में इस समस्‍या का समाधान करने का कोई तरीका नहीं है। भारत में मिड और स्‍माल कैप मार्केट बहुत छोटा है। अच्‍छा प्रदर्शन करने वाला फंड बड़ा बन जाता है और एक बड़ा फंड अपनी असेट का का एक बड़ा हिस्‍सा मिड और स्‍माल कैप स्‍टॉक्‍स में नहीं रख सकता। तो इसका कोई समाधान नहीं है और आगे भी लंबे समय तक इसका कोई समाधान नहीं होगा।

तो सवाल उठता है कि जो निवेशक अच्‍छे स्‍माल और मिड कैप स्‍टॉक्‍स में निवेश करना चाहते हैं उनको क्‍या करना चाहिए। ऐसा करने का दो तरीका है। पहला तरीका यह है कि आप खुद में विशेषज्ञता विकसित करें और ऐसे स्‍टॉक्‍स सीधे खरीदने के लिए रिसर्च करें। निवेश के लिए म्‍युचुअल फंड का इस्‍तेमाल न करें। बाहरी मदद के लिए वैल्‍यू रिसर्च स्‍टॉक एडवाइजर जैसी सेवाओं का उपयोग करें।

निश्चित तौर पर बहुत से लोगों के लिए ऐसा करना संभव नहीं होगा और उनको म्‍युचुअल फंड के जरिए निवेश करने का तरीका अपनाना होगा। ऐसे लोगों को अपेक्षाकृत छोटे फंड चुनने चाहिए जो स्‍माल और मिड कैप स्‍टॉक्‍स में विशेषज्ञता रखते हैं। बड़े मल्‍टी और फ्लेक्‍सी कैप फंड आम तौर पर लार्ज कैप फंड होते हैं लेकिन यही बात उन फंडों के लिए सही नहीं है जो छोटी कंपनियों के मामले में विशेषज्ञता रखते हैं।

निवेशकों को इस बात को स्‍वीकार करना होगा कि भारतीय इक्विटी मार्केट का नेचर ही कुछ ऐसा है कि यहां छोटी कंपनियों में अच्‍छी तरह से निवेश करने के लिए काफी प्रयास करना पड़ता है। हालांकि निवेशकों को इसका पुरस्‍कार भी मिलता है।

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