वैल्यू रिसर्च से पूछें

क्या गिरावट में ख़रीदारी सच में मंथली SIP से बेहतर है?

बाज़ार का सही वक़्त का अनुमान लगाने और हर महीने एक तय रक़म लगाने के बीच का फ़र्क़ उतना ज़्यादा नहीं है जितना ज़्यादातर निवेशक सोचते हैं.

बाज़ार का सही वक़्त का अनुमान लगाने और हर महीने एक तय रक़म लगाने के बीच का फ़र्क़ उतना ज़्यादा नहीं है जितना ज़्यादातर निवेशक सोचते हैं. Vinayak Pathak/AI-Generated Image

पाठक का सवाल: क्या साल में 12 या उससे ज़्यादा बार गिरावट पर एकमुश्त पैसा लगाना मासिक SIP करने जैसा ही है? इन दोनों तरीक़ों के अपने-अपने फ़ायदे क्या हैं? - सुमंत भाटिया

साल में कई बार गिरावट पर एकमुश्त पैसा लगाना ऊपर से देखने पर SIP जैसा ही लगता है. दोनों में आपका पैसा समय के साथ अलग-अलग क़ीमत पर बंटता है. लेकिन समानता बस यहीं तक है.

असली फ़र्क़ इस बात का नहीं है कि आप कितनी बार पैसा लगाते हैं. फ़र्क़ कंट्रोल का है. SIP में फ़ैसला आपके हाथ में रहता ही नहीं. हर महीने एक तय रक़म अपने आप लग जाती है, चाहे बाज़ार ऊपर हो, नीचे हो या एक जगह टिका हो. गिरावट पर ख़रीदने में आपको ख़ुद क़ीमतों पर नज़र रखनी पड़ती है, यह तय करना पड़ता है कि गिरावट काफ़ी है या नहीं और तभी पैसा लगाना पड़ता है. यह सुनने में आसान लगता है, पर ऐसा होता नहीं है.

बाज़ार पहले से नहीं बताता कि वो सबसे नीचे कब जाएगा. आज जो 5% की गिरावट लगती है, वो अगले महीने तक 20% की बड़ी गिरावट बन सकती है. सही मौक़े का इंतज़ार करने का मतलब अक्सर यह होता है कि पैसा यूं ही पड़ा रहता है. और पड़े हुए पैसे की भी एक क़ीमत होती है. 

ज़रा कल्पना कीजिए कि आपके पास भविष्य देखने वाला एक जादुई गोला है. 30 साल तक, हर महीने आपको पहले से पता होता कि बाज़ार सबसे नीचे कब जाएगा, और आप ठीक उसी पल ख़रीद लेते. अब सोचिए, उस इंसान के मुक़ाबले आप कितने आगे होते जिसने बिना कुछ सोचे, बस हर महीने एक ही तारीख़ पर पैसा लगाया?

जवाब है: साल में सिर्फ़ क़रीब 0.2% पॉइंट आगे.

और जिस निवेशक ने तीस साल तक हर बार बाज़ार के सबसे ऊंचे स्तर पर ख़रीदा, यानी सबसे ख़राब वक़्त पर, वो भी आम निवेशक से सालाना सिर्फ़ 0.3% पॉइंट पीछे रहा.

यानी सही वक़्त पकड़ने और वक़्त बिल्कुल न देखने के बीच का फ़र्क़ इतना कम है जितना शायद ही कोई सोचता है. इसका सीधा मतलब यह है कि बाज़ार पर नज़र रखने, गिरावट का इंतज़ार करने और सही पल खोजने की जो मेहनत है, वो आपको लगभग कुछ नहीं देती. जो एक आसान सी मासिक SIP वैसे भी दे देती है.

बाज़ार में बने रहना सही मौक़ा खोजने से कहीं ज़्यादा मायने रखता है.

गिरावट पर ख़रीदना काग़ज़ पर बहुत अच्छा लगता है. लेकिन हक़ीक़त कहीं ज़्यादा उलझी हुई है. बाज़ार गिरता है और फिर गिरता ही चला जाता है. जिस गिरावट पर आपने ख़रीदा, वो एक महीने बाद और बड़ी गिरावट बन जाती है. ज़्यादातर निवेशक यहीं ठिठक जाते हैं, थोड़ा और भरोसा होने का इंतज़ार करते हैं, और आख़िर में सोचे से कहीं ज़्यादा देर तक पैसा यूं ही पड़ा रहने देते हैं. SIP इस पूरी झंझट को जड़ से ख़त्म कर देती है.

यह भी पढ़ें: ऐसे ही पड़े हैं ₹1 लाख, तो सेविंग अकाउंट से बेहतर है यह विकल्प

ये लेख पहली बार जून 25, 2026 को पब्लिश हुआ.

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

जाना-पहचाना भटकाव

पढ़ने का समय 4 मिनटधीरेंद्र कुमार

क्या बड़ा कैपिटल गेन हुआ है? ऐसे लग सकता है कम टैक्स

पढ़ने का समय 5 मिनटआकार रस्तोगी

सबसे ज़्यादा लोकप्रिय ग्लोबल फ़ंड्स में सबसे ज़्यादा रिस्क है

पढ़ने का समय 5 मिनटआकार रस्तोगी

क्यों PPFAS के CIO को FII की बिक़वाली की चिंता नहीं है?

पढ़ने का समय 7 मिनटLekisha Katyal

क्या फ़्लैट ख़रीदकर उसके किराए से EMI चुकाई जा सकती है?

पढ़ने का समय 5 मिनटउदयप्रकाश

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

SEBI का नया नियम ग़लत लोगों की मदद करता है

SEBI का नया नियम ग़लत लोगों की मदद करता है

जिन लोगों को थर्ड-पार्टी SIPs से सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता, यह नियम उन लोगों के लिए नहीं बनाया गया है

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी