
आजकल म्युचुअल फंड निवेशक काफी चिंतित हैं। चिंता की वजह इस साल बाजार में तेज उतार चढ़ाव का दौर नहीं। उतार-चढ़ाव की चिंता तो कुछ समय के लिए है। उनकी चिंता लंबी अवधि को लेकर है और अब इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि इक्विटी म्युचुअल फंड के रिटर्न में तेज गिरावट आई है। अपने अनुभव के आधार पर निवेशक इसे उस फंड की असफलता के तौर पर लेते हैं
जिसमें उन्होंने निवेश किया है। और किसी भी समय कुछ फंड ऐसे होते हैं जिनका प्रदर्शन अच्छा रहता है। तो ऐसे में यह कहना आसान होता है कि मेरा फंड अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है। इसके अलावा बहुत से ऐसे निवेशक हैं जो आंकड़ों पर रिसर्च कर सकते हैं या वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर अपनी पोर्टफोलियो ट्रैक कर बेंचमार्क सूचकांक से तुलना कर सकते हैं वे आम तौर पर अपने फंड के प्रदर्शन से नाखुश हो सकते हैं।
हम लोगों में से जिन लोगों को बड़े पैमाने पर निवेशकों की राय मिलती है वे एक बड़ी तस्वीर देख सकते हैं। और यह तस्वीर बताती है कि निवेशक खुश नहीं हैं। इक्विटी म्युचुअल फंड के प्रदर्शन को लेकर असंतुष्टि का भाव काफी व्यापक है। और यहां एक दिलचस्त बात दिखती है कि ऐसे निवेशक जो 10-15 साल या इससे अधिक समय से निवेश कर रहे हैं उनमें असंतुष्टि का भाव ज्यादा गहरा है। इसके दो कारण हैं। इन निवेशकों ने नए निवेशकों की तुलना में बड़ी रकम निवेश की हुई है। ऐसे में उनकी निराशा ज्यादा बड़ी है। आम तौर पर ये पुराने निवेशक हैं और समय के साथ उनका निवेश बढ़ कर बड़ी रकम में तब्दील हो गया है।
हालांकि यहां एक तीसरा फैक्टर भी है जो जिसकी वजह से उनकी निराशा ज्यादा गहरी है। लंबे समय से निवेश्ा कर रहे निवेशक यानी पुराने निवेशकों ने इक्विटी फंड निवेशक के तौर पर बहुत अच्छा समय देखा है। 1999 से 2012 की शुरूआत तक का समय कुछ बड़ी बाधाओं के बावजूद इक्विटी म्युचुअल फंड के लिए शानदार था। यहां तक कि जिन लोगों ने अपेक्षाकृत कमजोर फंडों में निवेश किया था उन लोगों ने भी बहुत अच्छा रिटर्न हासिल किया था। और जिन लोगों ने बेहतर फंड में निवेश किया था उन लोगों ने तो इस तरह से मुनाफा कमाया जैसे नोट छाप रहे हों। आजकल लोग फिक्स्ड इनकम रिटर्न और महंगाई दर से इक्विटी फंड रिटर्न की तुलना करके कोई बात साबित करने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन उस समय जो अंतर था वह एकतरफा था।
आप उस सुनहरे दौर के सालाना औसत रिटर्न पर गौर करिए। 80.1, 78.7. 15.5. 42.9, 50.6, 47.3, 79.5, 18.8, 28.5, 32.1 । सुनहरे दौर में बीच बीच में गिरावट की घटनाएं भी हुईं लेकिन यह समय इतना अच्छा था कि यह ज्यादा मायने नहीं रखता है। इसके अलावा 2004 से 2013 के बीच पांच साल के सालाना औसत रिटर्न पर गौर करें। 18.1,23.3, 17.1, 29.8, 40.3, 30.7, 30.9 , 31.4, 20.4, 16.7। इस बीच बड़ी गिरावट के दौर भी आए। लेकिन अगर आपने पांच साल या इससे अधिक समय तक निवेश बनाए रखा तो यह आपका अनुभव था। इस बात में कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस अवधि में जिन निवेशकों ने निवेश किया था आज वे रिटर्न को लेकर निराश हैं।
मैं चाहता हूं कि मैं इस समय कुछ अच्छी खबर दूं। जैसे कुछ तर्क कि वैसा सुनहरा दौर बस आने ही वाला है। अगर आप इस तरह का आशावाद चाहते हैं तो आपको किसी सेल्सपर्सन से बात करनी चाहिए। मैं आपको ऐसी कोई उम्मीद नहीं दे सकता। वे सुनहरे दिन अब बीत चुके हैं। कुछ पुराने निवेशकों को लगता है कि वे दिन सामान्य थे आज का समय एक अपवाद है। माफ करिए लेकिन हो सकता है कि इसका उलटा सच हो। आने वाले समय में भी ऐसा हो सकता है कि कभी कभी आपको पुराने सुनहरे दौर की तरह रिटर्न मिल जाए लेकिन सच बात तो यह है कि उस दौर में मिला रिटर्न बहुज ज्यादा था और एक तरह से यह वाजिब नहीं था और आने वाले समय में आपको उस तरह के रिटर्न की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
कुछ भी हो अभी तो हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। अभी भी इक्विटी म्युचुअल फंड का रिटर्न महंगाई दर से ज्यादा होगा। इस बात पर भरोसा किया जा सकता है। पैसिव फंड का समय आ रहा है और एक तरह से ये पहले से ही हैं। कभी कभी फंड इंडस्ट्री को भी कम लागत वाली पैसिव इन्वेस्टिंग को लेकर गंभीर होना होगा। हो सकता है कि ऐसा नियामक की पहल पर हो।
पांरपरिक निवेश से जुड़ी बुनियादी बातें जैसे फंड सावधानी से चुनना, असेट अलॉकेशन और असेट रीबैलेंसिंग की अहमियत काफी अधिक है। पुराने सुनहरे दिनों में आप इन सब बातों को नजरअंदाज कर सकते थे और इसके बावजूद अच्छा रिटर्न हासिल कर सकते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।

