
मैं ये कहानी अक्सर सुनाता हूं जो मैक्स प्लैंक (Max Planck) के बारे में है कि कैसे नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद, वो पूरे जर्मनी में घूम-घूम कर क्वांटम मकैनिक्स के बारे में एक स्टैंडर्ड लेक्चर दे रहे थे. उन्होंने बताया, बार-बार सुनने से उनके ड्राइवर को उनका लेक्चर याद हो गया और बोला, “आपको बुरा तो नहीं लगेगा, प्रोफ़ेसर प्लैंक, क्योंकि इस रुटीन को बनाए रखना बेहद बोरिंग है. (क्या हो) अगर मैं म्यूनिख़ में लेक्चर दूं और आप मेरी ड्राइवर वाली हैट पहन कर आगे की सीट पर बैठ कर सुनें?” प्लैंक ने कहा, “क्यों नहीं?” फिर ड्राइवर उठा और उसने क्वांटम मकैनिक्स पर एक लंबा सा भाषण दिया. भाषण के बाद फ़िज़िक्स के एक प्रोफ़ेसर खड़े हुए और उन्होंने एक मुश्किल सा सवाल पूछ लिया. सवाल सुनने के बाद स्पीकर ने कहा, “मुझे आश्चर्य है कि म्यूनिख़ जैसे आधुनिक शहर में मुझसे इतना बुनियादी सा सवाल किया गया है. इसके जवाब के लिए मैं अपने ड्राइवर को बुलाता हूं.”
अब, सच हो या नहीं पर ये एक मज़ेदार कहानी है. और, मज़ाक को एक तरफ़ रख भी दें, तो इसमें एक गहरी बात छुपी थी और हां, ड्राइवर की हाज़िरजवाबी तो है ही. मैंने ये कहानी एक क़िताब से ली है जिसका नाम है 'Poor Charlie's Almanack: The Wit and Wisdom of Charles T. Munger'. ये क़िताब कुछ महंगी है, पर इसकी बातें इसके दाम से कहीं ज़्यादा क़ीमती है. दूसरे शब्दों में, इसकी क़ीमत ज़्यादा भले हो, पर ये वाजिब है, जो कि होना चाहिए.
जहां तक इस कहानी के मर्म की बात है, उस पर ख़ुद चार्ली मंगर ने कहा है: इस दुनिया में हमारे पास दो तरह के ज्ञान होते हैं. पहला प्लैंक का ज्ञान, ये उन लोगों के पास होता है जो सच में कुछ जानते हैं. उन्होंने तपस्या की होती है, उनमें इस विषय की क़ाबिलियत होती है. और फिर हमारा ड्राइवर वाला ज्ञान होता है, जिसमें बातें कहना सीख लिया गया होता है.
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निवेश में, हम सभी ड्राइवर वाले ज्ञान के साथ ही शुरुआत करते हैं, हममें से कुछ ही लोग क़िस्मत वाले होते हैं जो किसी तरह से प्लैंक स्तर पर पहुंच पाते हैं. जब हम पहले-पहल निवेश शुरू करते हैं, तो हम अपने आसपास की बातों पर ध्यान देना शुरू करते हैं, हम वो सुनते हैं जो ज्ञान और अनुभव की तरह लगता है और उसी के कुछ हिस्सों की नकल करने लगते हैं. ये तरीक़ा कुछ समय तक काम करता है और अगर हम क़िस्मत वाले हैं, तो ये काफ़ी समय तक चलता रहता है. हालांकि, देर-सबेर, असलियत सामने आती है और सवाल पूछे जाते हैं जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं होता. आखिर, अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता.
इन दिनों, तमाम ऐसे इक्विटी निवेशक हैं, जो मार्केट की तरफ से सवाल उठने पर बगलें झांकने लगते हैं. थ्योरी में, हम सभी को पता होता है कि कभी न कभी ये मुश्किल सवाल सामने आएगा ही. मगर फिर भी असली अनुभव के अलावा हमें दूसरी कोई भी चीज़ इस सवाल का सामना करने के लिए तैयार नहीं कर सकती, सिवाए अपने ख़ुद के असली अनुभव के.
आप कुछ सालों से SIP के ज़रिए निवेश कर रहे हैं, शायद एक-दो फ़ंड्स में हर महीने क़रीब ₹10,000 हज़ार लगा रहे हैं. मुनाफ़ा काफ़ी आसान रहा और आपके निवेश की वैल्यू बढ़ कर क़रीब ₹8 लाख हो गई है. अब आप ने तय कर लिया है कि अपनी SIP कई साल तक आगे जारी रखेंगे. आपके इस सफ़र में कुछ उतार-चढ़ाव आए हैं जब कई बार, वैल्यू शायद 5-10 प्रतिशत नीचे गई है, मगर फिर अच्छी तरह से रिकवर भी कर गई है.
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अब इसके बाद आ जाता है कोविड. अब, कुछ ही दिनों के भीतर ₹8 लाख घट कर ₹5.5 लाख हो जाते हैं. फिर ये कुछ रिकवरी होती है, फिर रुक जाती है, फिर कुछ और रिकवर करता है, फिर बहुत कोई ज़्यादा हलचल नहीं होती, फिर बड़ी मज़बूती से रिकवरी हो जाती है, और आपका निवेश वापस पिछले स्तर पर पहुंच जाता है, मगर ये फिर से ऊपर-नीचे होने लगता है. अब आप नहीं जानते कि क्या करें. मेरा मतलब है कि आपको पता है कि थ्योरी में क्या करना है. जो भी इन कॉलम को पढ़ता रहा है वो जानता है कि क्या करना है. मगर मुश्किल तब होती है जब ये पहली-पहली बार होता है, तब आपके पास एक ड्राइवर का ज्ञान होता है, प्लैंक वाला ज्ञान नहीं. जब तक आपने किसी चीज़ को जिया नहीं है, और सही सलामत, दूसरी तरफ़ बाहर नहीं निकले हैं, ये असल में एक मुश्किल काम है.
तो मैं ये आपको क्यों बता रहा हूं? क्योंकि अगर आप बिना घबराए इस अनुभव से गुज़र जाते हैं, तो आपने अपनी बचत को बिना गंवाए कुछ अनुभव बटोर लिया है. हालांकि, फिर भी आपको मुश्किल वक़्त से गुज़रने की बात सीखनी होगी, पर वो सीखना सबसे अच्छे तरीक़े से होगा – आप अपनी नहीं, दूसरों की ग़लतियों के अनुभवों से सीखेंगे.
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