Anand Kumar
मार्केट गिर क्यों नहीं रहा? आखिर कब गिरेगा ये लगातार चढता हुआ मार्केट? यही सवाल हर तरफ़ छाया है। हालांकि हर कोई, इस सवाल को इतनी सादगी से नहीं पूछ रहा। एक्सपर्ट्स की सधी हुई ज़बान में इसी सवाल को कुछ घुमा-फिरा कर दागा जा रहा है - कभी वैल्युएशन के नज़रिए से, कभी रिकवरी की रफ़्तार के हवाले से, या फिर किसी दूसरे किस्म की टेक्निकल बाज़ीगरी में लपेट कर भी। मगर बुनियादी तौर पर ये सवाल और ये खयाल, एक ही है। हर किसी का मानना है, कि इस लगातार ऊंचे उठते मार्केट-ग्राफ़ के पीछे, कहीं कोई ट्रिक या धोखा, या फिर कोई-न-कोई ढका-छुपा कारण ज़रूर है। ठीक सिंड्रैला की कहानी की तरह। जिसमें घड़ी में 12 बजते ही सबकुछ गायब हो गया था। माना जा रहा है कि बाज़ार की ये दौड़ भी - घोड़ों, कोचवान और बग्घी की तरह ही गायब हो जाएगी।
पर आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? मेरे खयाल में इसकी दो वजह हैं। पहली तो ये, कि इक्विटी में निवेश करने वाले बहुत सारे भारतीयों की ज़िंदगी में कई बार ऐसा बुल-रन आया होगा, जो एक घोखा ही निकला। किसी एक घटना की वजह से सारी बढ़त भरभरा कर ढह गयी। चाहे वो दशकों पहले, का हर्षद मेहता का खेल हो, डॉटकॉम बूम हो, या फिर 2007-08 की ग्लोबल-मंदी। ये भारतीय बाज़ार की त्रासदी रही, कि लंबे बुल-रन का अंत अक्सर ऐसे ही किसी कारण से हुआ है, न की बाज़ार की किसी सतत प्रक्रिया में बदलाव के चलते।
पिछले साल मार्च में चाइनीज़ वायरस, एक ऐसी ही घटना थी। मगर जब मार्केट फिर भी नहीं गिरा, तो कई लोगों ने मान लिया कि क्रैश, फ़िलहाल के लिए टल गया है। ये बात सही लगती है कि कोरोना का आर्थिक असर काफ़ी बुरा रहा है, और इसीलिए इसका असर स्टॉक मार्केट में भी झलकना चाहिए था। आखिर सच तो सामने आता ही है। पर सच तो ये है कि अभी तक तो ये सच कहीं नज़र नहीं आया है।
अब तक, मार्केट का गिरना किसी हादसे की घबराहट भरी आशंका जैसा था। मगर अब व्यापारियों, निवेशकों और एक्सपर्ट्स की मनःस्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि वो अक्सर कहते पाए जाएंगे कि ‘ये मार्केट ज़्यादा नहीं टिकेगा’। सच ये भी है कि ये एक्सपर्ट्स ही हैं, जो बड़ी बेसब्री से इस गिरावट का इंतज़ार करते दिख रहे हैं। अब ये बात ठीक लगे या न लगे, मगर न्यूज़-बिज़नस और एक्सपर्ट्स की राय, बुनियादी तौर पर बुरी ख़बर देने का बिज़नस है, और इस महामारी के दौरान भी हमने यही पाया है।
अब सवाल ये है कि क्या ये सिंड्रैला मार्केट है? और अगर है, तो इसकी आधी रात कब होगी? वैसे अगर आप पैनिक और बुरी ख़बरों के बिज़नस में ही हैं, तो मेरे पास आपके लिए भी एक बुरी ख़बर है। इक्विटी मार्केट की बढ़त का बने रहना कोई दूध का उबाल नहीं है, जो ऊपर आ गया है। इसके मज़बूत होने के कुछ गहरे कारण हैं जिनकी वजह से इक्विटी मार्केट में ये लगातार बढ़त हमें देखने को मिल रही है।
सबसे बड़ा और भरोसेमंद कारण तो ये है कि भारतीय इक्विटी की प्रकृति में ही एक बुनियादी बदलाव आया है। ये बदलाव तीन खंभों पर टिका है, और उन तीन शब्दों का सूप कुछ इस तरह हैं: एन.पी.एस, ई.पी.एफ़.ओ, और एस.आई.पी.। आज से कुछ साल पहले तक, जब भारतीय इक्विटी मार्केट पूरी तरह से एफ़.आई.आई. निवेश का गुलाम हुआ करता था, तब ये तीनों विकल्प मौजूद ही नहीं थे। निवेश के इन्हीं तीन तरीकों के बीच, भारत के मार्केट में लगने वाली पूंजी करीब 1.5 लाख करोड़ है। हालांकि इस निवेश की क्वालिटी से कहीं ज़ादा महत्वपूर्ण इसकी क्वांटिटी है। पूंजी निवेश के इस बहाव की दो ख़ासियतें हैं, पहली - ये लगातार होने वाला निवेश है, और दूसरी ख़ास बात है, इसका लंबी-अवधि का होना। अब ई.पी.एफ़.ओ. और एन.पी.एस. के केस को ले लीजिए, ये निवेश न सिर्फ़ लगातार बना रहेगा, बल्कि सच तो ये है कि ये एक निश्चित दर से बढ़ता भी रहेगा। और हां, ये कभी भी (ये अतिश्योक्ति लगेगा, पर गलत नहीं) मार्केट से बाहर निकलने वाला नहीं है। ये बातें विदेशी बाज़ारों में तो आम हैं, पर भारत के लिए बिल्कुल नई हैं। ‘म्यूचुअल फ़ंड सही है’ कैंपेन ने भी एस.आई.पी. इक्विटी निवेश के स्तर को करीब 10,000 करोड़ महीने की दर से बढ़ाया है। ये पैसा न तो आसानी से रुकने वाला है, और न ही आसानी से बाहर जाएगा। देखा जाए तो, निवेश के इन तीन स्रोतों ने, भारत में इक्विटी-निवेश की प्रकृति को गहरे तौर पर लोकतांत्रिक बना दिया है, और बदलाव की ये प्रक्रिया अभी शुरु ही हुई है।
इसके अलावा कुछ दूसरे बुनियादी कारण भी अपना रोल अदा कर रहे हैं। कई वजहों से चायनीज़ वायरस का कॉर्पोरेट जगत की कमाई पर उतना गहरा और स्थाई असर नहीं हुआ है, जितने बड़े असर का डर था। इसके अलावा, छोटे और मझोले बिज़नस पिछले कुछ साल में फ़ॉर्मल अर्थव्यवस्था के दायरे में आए, इनपर लॉकडाउन का काफ़ी बुरा असर भी रहा। पर क्योंकि इक्विटी मार्केट में इनका कोई बड़ा प्रतिनिधित्व नहीं है तो इसका असर बाज़ार पर उतना नहीं हुआ।
मगर मैं स्वीकार करता हूं कि ये सारी बातें मेरे उस सवाल का जवाब नहीं हैं, जिस सवाल से मैंने इस कॉलम की शुरुआत की थी। क्योंकि उन सवालों का जवाब है ही नहीं। इस बारे में आप, और मैं भी सिर्फ़ अंदाज़ा लगा सकते हैं। दरअसल हमारे अलावा बाकी जितने भी लोग हैं, वो भी यही कर रहे हैं। हालांकि इनमें से कुछ लोगों का अंदाज़ा सही ज़रूर साबित होंगा, पर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। ऐसे सवालों पर अंदाज़ा लगाने से, इन्हें नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर है।

