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बढ़ रही है महंगाई ? बांड हो सकता है जवाब

कई बार ऐसा होता है जब ब्‍याज दरों में इजाफा नहीं किया जा सकता है तो महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए गवर्नमेंट बांड जारी किए जाते हैं

कई बार ऐसा होता है जब ब्‍याज दरों में इजाफा नहीं किया जा सकता है तो महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए गवर्नमेंट बांड जारी किए जाते हैं

काफी लंबे समय से जरूरत से ज्‍यादा लिक्विडिटी को खराब माना जाता रहा है। लेकिन क्‍यों ? ज्‍यादा लिक्‍िविडिटी का मतलब है कि इकोनॉमी में जरूरत से ज्‍यादा रकम है। और वास्‍तव में ज्‍यादा लिक्‍ि‍वडिटी का असर पड़ता है। ज्‍यादा रकम उपलब्‍ध है इसलिए लोग ज्‍यादा चीजों की मांग कर रहे हैं और कंपनियां इस मांग को पूरा नहीं कर पा रही है। इसे डिमांड पुल इनफ्लेशन यानी मांग की वजह से बढ़ने वाली महंगाई।

काफी लंबे समय से महंगाई और इकोनॉमी में सर्कुलेशन को नियंत्रित करने के लिए ब्‍याज दरें अहम टूल रही हैं। केंद्रीय बैंक जब भी बाजार में ज्‍यादा लिक्विडिटी देखता है तो वह रेपो रेट और अन्‍य स्‍टैचुरी रिजर्व रेशियो बढ़ा देता है। इससे कमर्शियल बैंक द्वारा दिया जाने वाला कर्ज कम हो जाता है और बैंकों से कर्ज पर ब्‍याज दरों को भी बढ़ाने को कहा जाता है। इससे लिक्विडिटी या इकोनॉमी में रकम का प्रवाह कम हो जाता है।

लेकिन महामारी जैसे मुश्किल समय में सरकार महंगाई पर कैसे अंकुश लगा सकती है ? इसका जवाब है बांड। आज इस लेख में हम इस पर बात करेंगे कि सरकार इकोनॉमी में रकम का प्रवाह कम करने के लिए बांड का इस्‍तेमाल कैसे करती है।

जब भी सरकार और केंद्रीय बैंक महसूस करते हैं कि इकोनॉमी में जरूरत से ज्‍यादा लिक्विडिटी है और संभावना है कि महंगाई दर ऊपर जाएगी तो भारतीय रिजर्व बैंक जरूरत से ज्‍यादा लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के लिए बांड जारी करता है। यह कैसे काम करता है ? मैं इसके बारे में बहुत सरल शब्‍दों में चीजों को स्‍पष्‍ट कर रहा हूं।

इकोनॉमी में जब भी ज्‍यादा रकम हो जाती है तो सरकार आकर्षक ब्‍याज दरों वाले बांड जारी करेगी। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बांड को टैक्‍स फ्री स्‍टेटस भी दिया जाता है। ब्‍याज दरें आकर्षक हैं और गवर्नमेंट बांड में निवेश करना सुरक्षित समझा जाता है, ऐस में बड़े पैमाने पर निवेशक इन बांड में निवेश करते हैं।

जब बांड जारी किए जाते हैं तो इकोनॉमी में मौजूद रकम का एक हिस्‍सा बांड खींच लेता है और इसका नतीजा यह होता है कि लिक्विडिटी और ब्‍याज दरों में गिरावट आती है। इस तरह से सरकार महंगाई पर अंकुश लगाती है और निवेशकों को भी एक सुरक्षित विकल्‍प में निवेश करने का मौका मिलता है। कुल मिला कर यह सबसे के लिए अच्‍छी स्थिति है। इस प्रक्रिया को मार्केट स्‍टैबलाइजेशन स्‍कीम यानी (MSS) और बांड को मार्केट स्‍टैबलाइजेशन बांड यानी MSB कहा जाता है।

लेकिन सरकार इसका इस्‍तेमाल ज्‍यादा क्‍यों नहीं करती ? ऐसा इसलिए है क्‍योंकि बुनियादी तौर पर बांड जारी करने का मतलब है कर्ज के जरिए रकम जुटाना। जब भी केंद्रीय बैंक MSB जारी करते हैं, तो सरकारों की कर्ज की देनदारी बढ़ जाती है। इस वजह से महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए MSS का इस्‍तेमाल ज्‍यादा नहीं किया जाता है। सरकार इस रकम को खर्च भी नहीं कर सकती, उसे यह रकम केंद्रीय बैंक के पास जमा रखना होता है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने 2016 में डिमोनेटाइजेशन के दौरान लिक्विडिटी घटाने के लिए MSS का इस्‍तेमाल किया था। 500 रुपए ओर 1,000 रुपए के डिमोनेटाइजेशन की वजह बैंकों के पास 500 रुपए और 1,000 रुपए के नोट आए, इस तरह से लिक्विडिटी में इजाफा हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक ने शुरूआती दौर में बैंकों से कैश रिजर्व रेशियो का ऊंचा स्‍तर बनाए रखने को कहा लेकिन इससे उनकी लागत बढ़ गई क्‍योंकि उनको इस पर ब्‍याज का भुगतान करना पड़ रहा था। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक ने लिक्विडिटी कम करने के लिए MSB जारी की।

भारत में MSS का सबसे उल्‍लेखनीय इस्‍तेमाल 2002 में किया गया, जब इसे पेश किया गया था। इस अवधि में भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी आई और महंगाई दर बढ़ कर 9 फीसदी हो गई। भारतीय रिजर्व बैंक के पास MSB जारी करने के अलावा कोई और विकल्‍प नहीं था। इस तरीके से भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ वर्षों में इकोनॉमी में 2.5 लाख करोड़ का सर्कुलेशन कम कर दिया और इसका असर महंगाई दर भी हुआ और यह घट कर 7 फीसदी पर आ गई।

जब भी सरकार बाजार में बांड जारी करने का प्रयास कर रही हो या बांड को लेकर उत्‍साहित हो तो याद रखें कि महंगाई अधिक है और सरकार बांड का इस्‍तेमाल महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए कर रही है।


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ये लेख पहली बार फ़रवरी 14, 2022 को पब्लिश हुआ.

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